ईरान युद्ध में बढ़ा अमेरिकी दबाव: मिडिल ईस्ट में 50 हजार से अधिक सैनिक तैनात, खार्ग द्वीप और होर्मुज जलडमरूमध्य पर फोकस
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय मध्य पूर्व में 50 हजार से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो सामान्य समय के मुकाबले लगभग 10 हजार अधिक हैं। हाल ही में 2500 मरीन और 2500 नौसैनिकों की अतिरिक्त तैनाती के बाद अमेरिका ने अपनी सैन्य घेराबंदी और मजबूत कर ली है।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका-ईरान के बीच जारी युद्ध अब और निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। एक महीने से जारी इस संघर्ष में न तो तेहरान झुकने के संकेत दे रहा है और न ही वॉशिंगटन अपने रुख में नरमी दिखा रहा है। इस बीच, मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी तेजी से बढ़ गई है, जिससे क्षेत्र में तनाव और गहरा गया है।
अमेरिकी सैन्य जमावड़ा बढ़ा
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय मध्य पूर्व में 50 हजार से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो सामान्य समय के मुकाबले लगभग 10 हजार अधिक हैं। हाल ही में 2500 मरीन और 2500 नौसैनिकों की अतिरिक्त तैनाती के बाद अमेरिका ने अपनी सैन्य घेराबंदी और मजबूत कर ली है। इसके अलावा, 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के करीब 2000 पैराट्रूपर्स को भी ऐसे स्थानों पर तैनात किया गया है, जहां से वे किसी भी समय ऑपरेशन के लिए तैयार रह सकते हैं। यह तैनाती इस बात का संकेत मानी जा रही है कि अमेरिका आने वाले दिनों में बड़े सैन्य कदम उठा सकता है।
रणनीतिक द्वीपों पर कब्जे की योजना?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ईरान के कुछ रणनीतिक द्वीपों पर कब्जा करने जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है। इनमें सबसे अहम नाम खार्ग द्वीप का है, जो ईरान के तेल निर्यात का मुख्य केंद्र है। फारस की खाड़ी में स्थित इस द्वीप से ईरान का लगभग 90 प्रतिशत तेल निर्यात होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस द्वीप पर नियंत्रण स्थापित करने से ईरान की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।
ट्रंप का बयान: ‘ईरान का तेल लेना चाहता हूं’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि वह ईरान के तेल संसाधनों पर नियंत्रण चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास इसके लिए कई विकल्प मौजूद हैं और खार्ग द्वीप पर कब्जा करना भी उनमें से एक हो सकता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि इस द्वीप की सुरक्षा बहुत मजबूत नहीं है और अमेरिका इसे आसानी से अपने नियंत्रण में ले सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि युद्ध खत्म करने के लिए समझौते की संभावना बनी हुई है, लेकिन यदि ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव नहीं माना तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
90 से ज्यादा ठिकानों पर हमले
अमेरिकी सेना अब तक ईरान के 90 से अधिक सैन्य और सामरिक ठिकानों को निशाना बना चुकी है। इन हमलों में खास तौर पर तेल निर्यात से जुड़े ठिकानों और सैन्य प्रतिष्ठानों को टारगेट किया गया है। खार्ग द्वीप पर भी बमबारी की खबरें सामने आई हैं, जिससे ईरान के ऊर्जा ढांचे पर दबाव बढ़ा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना बड़ा मुद्दा
दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। ईरानी हमलों के चलते यह मार्ग काफी हद तक बाधित हो गया है, जिससे वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। अमेरिका इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को फिर से सुरक्षित करने के लिए सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहा है। 31वीं मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट को ऐसे ऑपरेशन्स के लिए तैयार रखा गया है, जो कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकती है।
विशेष बलों की तैनाती, ऑपरेशन की तैयारी
पेंटागन ने हाल ही में 2000 पैराट्रूपर्स को मिडिल ईस्ट भेजा है, जिनकी सटीक लोकेशन सार्वजनिक नहीं की गई है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इन सैनिकों का इस्तेमाल खार्ग द्वीप जैसे अहम ठिकानों पर कब्जा करने के लिए किया जा सकता है। मरीन यूनिट्स के साथ मिलकर ये पैराट्रूपर्स जमीनी ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं।
सैन्य विशेषज्ञों की चेतावनी
हालांकि, कई रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान जैसे बड़े और शक्तिशाली देश के खिलाफ किसी भी व्यापक जमीनी अभियान के लिए 50 हजार सैनिक पर्याप्त नहीं होंगे। उनके अनुसार, ऐसा कोई भी कदम लंबे और जटिल युद्ध में बदल सकता है, जिसके वैश्विक प्रभाव भी गंभीर हो सकते हैं।
कूटनीतिक प्रयास जारी
पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देशों के जरिए बैकचैनल कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन अब तक अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीधी बातचीत नहीं हुई है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा है कि मौजूदा सैन्य तैयारियां नियमित प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इसका मतलब यह नहीं है कि कोई अंतिम निर्णय ले लिया गया है।
टकराव के बीच अनिश्चितता बरकरार
मध्य पूर्व में बढ़ती अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और रणनीतिक ठिकानों पर नजर इस बात का संकेत है कि स्थिति और गंभीर हो सकती है। हालांकि, कूटनीतिक रास्ते अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह संघर्ष और बढ़ता है या किसी समझौते की दिशा में आगे बढ़ता है।