नई दिल्ली: भारत में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन के साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा एक नए चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ब्रिक्स देशों के लिए चीन की अगुवाई में ओपन-सोर्स एआई समुदाय और पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने का प्रस्ताव रखा है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि एआई की वैश्विक दौड़ में अमेरिका फिलहाल चीन से आगे है। दोनों देशों के रुख से संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में एआई सिर्फ तकनीकी विकास का विषय नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक कूटनीति और रणनीतिक शक्ति का अहम हिस्सा बन सकता है।
ब्रिक्स में चीन का ओपन-सोर्स एआई प्रस्ताव
13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स के समापन सत्र को संबोधित करते हुए शी चिनफिंग ने कहा कि चीन ब्रिक्स देशों के लिए ओपन-सोर्स एआई समुदाय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाने को तैयार है। उन्होंने बड़े भाषा मॉडल (एलएलएम) के विकास और इस्तेमाल में सहयोग, विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम और व्यापक एआई इकोसिस्टम तैयार करने की पेशकश की।
चीन का यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब उसकी कई तकनीकी कंपनियां ओपन-सोर्स एआई मॉडल पर जोर दे रही हैं। इसके मुकाबले अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां अधिक शक्तिशाली और नियंत्रित ‘फ्रंटियर मॉडल’ विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में चीन का ओपन-सोर्स मॉडल विकासशील देशों को एआई तकनीक तक अपेक्षाकृत व्यापक पहुंच देने के विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है।
ट्रंप का दावा- एआई में अमेरिका आगे
चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को एआई की दौड़ में आगे बताया है। उनका रुख यह संकेत देता है कि वाशिंगटन एआई को केवल कारोबारी या तकनीकी क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति और वैश्विक प्रभाव के साधन के तौर पर देख रहा है। अमेरिका ने हाल के महीनों में अत्याधुनिक चिप्स, सेमीकंडक्टर उपकरण, क्लाउड कंप्यूटिंग क्षमता और कुछ उन्नत एआई मॉडल से जुड़ी तकनीकों के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा किया है। इन तकनीकों की उपलब्धता को चुनिंदा ‘भरोसेमंद साझेदारों’ तक सीमित रखने की रणनीति भी सामने आई है। इससे एआई के साथ-साथ सेमीकंडक्टर और कंप्यूटिंग क्षमता भी वैश्विक शक्ति-संतुलन का हिस्सा बन गई है।
चीन ने 29 देशों के साथ बढ़ाया दायरा
अमेरिकी रणनीति के समानांतर चीन भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना तकनीकी नेटवर्क मजबूत करने में जुटा है। जुलाई 2026 में शंघाई मुख्यालय वाले वर्ल्ड एआई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन के गठन के लिए चीन ने 29 देशों के साथ समझौता किया। इसमें पाकिस्तान, रूस, मलेशिया, केन्या, क्यूबा, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे देश शामिल बताए गए हैं। ब्रिक्स के मंच पर ओपन-सोर्स एआई की पेशकश को इसी व्यापक रणनीति की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। चीन विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच ऐसी तकनीकी साझेदारी को बढ़ावा देना चाहता है, जिसमें एआई संसाधनों और मॉडल तक ज्यादा देशों की पहुंच हो।
भारत ने दोनों महाशक्तियों को दिया संदेश
अमेरिका और चीन की इस प्रतिस्पर्धा के बीच भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ब्रिक्स समापन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेतावनी दी कि तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स को हथियार बनाना साझा वैश्विक प्रगति में बाधा डाल सकता है। भारत का यह रुख संकेत देता है कि वह एआई को केवल अमेरिका और चीन के बीच प्रभुत्व की लड़ाई के रूप में नहीं देखता। नई दिल्ली की प्राथमिकता यह भी है कि ग्लोबल साउथ के देशों को उन्नत तकनीक, कंप्यूटिंग संसाधनों और एआई के लाभों तक पर्याप्त पहुंच मिले। यही वजह है कि भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी तकनीकी कंपनियों के साथ सहयोग करता है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स जैसे मंचों पर विकासशील देशों की तकनीकी भागीदारी की वकालत करता है।
चिप्स से रेयर अर्थ तक बढ़ी तकनीकी प्रतिस्पर्धा
एआई की होड़ अब केवल सॉफ्टवेयर और मॉडल तक सीमित नहीं रह गई है। इसके लिए जरूरी चिप्स, सेमीकंडक्टर उपकरण, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और रेयर अर्थ मिनरल्स भी रणनीतिक संसाधन बन चुके हैं। चीन द्वारा रेयर अर्थ के निर्यात पर नियंत्रण और अमेरिका द्वारा उन्नत चिप्स व तकनीक के निर्यात पर प्रतिबंध इसी व्यापक प्रतिस्पर्धा के उदाहरण हैं। अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका समूह की जून 2026 में हुई अंतिम बैठक में 34 देशों ने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए थे। भारत भी इस समूह का हिस्सा है। दूसरी तरफ चीन अपने अलग तकनीकी सहयोग नेटवर्क को विस्तार देने में लगा है।
यूरोप ने बाजार को बनाया नियमन का हथियार
यूरोपीय संघ ने भी एआई की वैश्विक राजनीति में अपना रास्ता चुना है। एआई एक्ट के जरिए उसने अपने बाजार में काम करने वाली कंपनियों के लिए नियामकीय शर्तें तय की हैं। यानी किसी देश की एआई कंपनी यूरोपीय बाजार में प्रवेश करती है तो उसे ईयू के निर्धारित नियमों का पालन करना होगा। इस तरह अमेरिका तकनीक और चिप्स की पहुंच के जरिए, चीन ओपन-सोर्स सहयोग के जरिए और यूरोप नियमन के जरिए एआई के वैश्विक ढांचे को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।
ट्रंप-शी मुलाकात में एआई पर नजर
राष्ट्रपति ट्रंप का यह कहना कि एआई में जो आगे रहेगा, वही व्यापक अर्थों में बढ़त बनाएगा, इस प्रतिस्पर्धा की गंभीरता को दर्शाता है। ऐसे में इस महीने प्रस्तावित ट्रंप-शी मुलाकात पर भी नजर रहेगी। माना जा रहा है कि एआई गवर्नेंस, सेमीकंडक्टर, तकनीकी निर्यात और एआई मॉडल तक पहुंच जैसे मुद्दे दोनों नेताओं के बीच बातचीत में अहम हो सकते हैं। कुल मिलाकर, ब्रिक्स सम्मेलन के बाद एआई की प्रतिस्पर्धा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले वर्षों में तकनीकी क्षमता ही आर्थिक और रणनीतिक ताकत का बड़ा आधार होगी।