ईरान पर हमले को उचित ठहराने के लिए ट्रंप के दावे, जानें तथ्यों की कसौटी पर कितने सही?
ट्रंप का दावा था कि ईरान न केवल अतीत के आतंकी हमलों में शामिल रहा है, बल्कि उसने परमाणु कार्यक्रम और लंबी दूरी की मिसाइलों के जरिए अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ा खतरा पैदा किया है।
वाशिंगटन : US Iran Conflicts:अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराते हुए इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने ईरान के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए। ट्रंप का दावा था कि ईरान न केवल अतीत के आतंकी हमलों में शामिल रहा है, बल्कि उसने परमाणु कार्यक्रम और लंबी दूरी की मिसाइलों के जरिए अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ा खतरा पैदा किया है। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों, न्यायिक फैसलों और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टों की पड़ताल से पता चलता है कि उनके कई दावे बढ़ाचढ़ाकर किए गए या विवादित हैं। आइए क्रमवार समझते हैं कि ट्रंप ने क्या कहा और तथ्यों से क्या सामने आता है।
दावा 1: यूएसएस कोल हमले में ईरान की भूमिका
ट्रंप का दावा
ट्रंप ने कहा कि साल 2000 में अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस कोल पर हुए हमले के बारे में ईरान सरकार जानती थी और संभवतः उसमें शामिल भी थी।
तथ्य क्या कहते हैं?
अक्टूबर 2000 में यमन के अदन बंदरगाह पर अमेरिकी विध्वंसक पोत यूएसएस कोल पर आत्मघाती हमला हुआ था, जिसमें 17 अमेरिकी नौसैनिक मारे गए थे। इस हमले की जिम्मेदारी अल-कायदा ने ली थी और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने भी इसकी पुष्टि की थी। एफबीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध विवरण में अल-कायदा आतंकियों द्वारा इस हमले की साजिश और क्रियान्वयन का उल्लेख है, लेकिन उसमें ईरान का सीधा जिक्र नहीं है। हालांकि, बाद के वर्षों में कुछ अमेरिकी संघीय अदालतों ने दीवानी मामलों में यह माना कि ईरान ने अल-कायदा को वित्तीय या सामग्री सहायता देकर अप्रत्यक्ष रूप से हमले में “सहयोग” किया। 2015 में एक संघीय न्यायाधीश ने फैसला दिया कि ईरान के समर्थन के कारण अल-कायदा हमले को अंजाम दे सका। 2024 में एक अन्य दीवानी मामले में भी अदालत ने इसी तरह का निर्णय दिया और पीड़ित परिवारों को हर्जाना देने का आदेश दिया।
यह ध्यान देने योग्य है कि ये फैसले दीवानी मुकदमों में दिए गए थे, जिनमें ईरान और सूडान ने अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष नहीं रखा। आपराधिक जांच एजेंसियों ने ईरान की सीधी भागीदारी का कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया है। इसलिए ट्रंप का यह दावा कि ईरान सीधे तौर पर शामिल था, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं होता।
दावा 2: ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ में परमाणु केंद्र पूरी तरह नष्ट
ट्रंप का दावा
ट्रंप ने कहा कि पिछले साल ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत फोर्डो, नतांज और इस्फहान स्थित ईरान के परमाणु केंद्रों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया था।
तथ्य क्या कहते हैं?
पिछले वर्ष जून में अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। लेकिन हमलों के बाद सामने आई सरकारी रिपोर्टों और स्वतंत्र आकलनों में “पूर्ण विनाश” की बात नहीं कही गई। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में प्रारंभिक आकलन का हवाला देते हुए कहा गया कि भूमिगत संरचनाएं पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई थीं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रासी ने सीबीएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि हमलों से “गंभीर क्षति” हुई है, लेकिन इसे “पूर्ण विनाश” नहीं कहा जा सकता। पेंटागन के एक प्रवक्ता ने भी पिछले अगस्त में कहा था कि हमलों ने ईरान की परमाणु क्षमता को काफी हद तक कमजोर किया है, परंतु इसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया। नवंबर में जारी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज में भी यही कहा गया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को “काफी कमजोर” किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि ट्रंप द्वारा “पूरी तरह नष्ट” किए जाने का दावा अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होता है।
दावा 3: ईरान का परमाणु बम और लंबी दूरी की मिसाइल खतरा
ट्रंप का दावा
ट्रंप ने कहा कि ईरान ने परमाणु कार्यक्रम फिर शुरू करने और लंबी दूरी की मिसाइलें बनाने का प्रयास किया है, जो यूरोप, विदेशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों और अंततः अमेरिका तक पहुंच सकती हैं।
तथ्य क्या कहते हैं?
खुफिया अधिकारियों के अनुसार, ईरान के मिसाइल कार्यक्रम से जुड़े खतरों को लेकर ट्रंप ने खतरे की गंभीरता को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया। रक्षा खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के पास वर्तमान में ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) नहीं हैं जो सीधे अमेरिका तक पहुंच सकें। हालांकि अनुमान है कि 2035 तक वह ऐसी लगभग 60 मिसाइलें विकसित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की मौजूदा मिसाइल क्षमता से यूरोप के कुछ हिस्सों और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को खतरा हो सकता है, लेकिन अमेरिका मुख्य भूमि तक पहुंचने की क्षमता अभी उसके पास नहीं है।
जहां तक परमाणु हथियार कार्यक्रम का सवाल है, आईएईए प्रमुख राफेल ग्रासी ने हाल ही में फ्रांसीसी समाचार नेटवर्क को बताया कि उनकी एजेंसी को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला है कि ईरान सक्रिय रूप से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि जून के हमलों के बाद से ईरान ने कोई नया परमाणु अड्डा स्थापित नहीं किया है, हालांकि मौजूदा सुविधाओं पर कुछ गतिविधियां देखी गई हैं।
राजनीतिक बयानबाजी बनाम दस्तावेजी साक्ष्य
ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के लिए ट्रंप द्वारा किए गए दावों में कुछ तत्व ऐसे हैं जिनका आंशिक आधार न्यायिक या खुफिया आकलनों में मिलता है, लेकिन कई मामलों में उनके बयान उपलब्ध तथ्यों से अधिक व्यापक या निर्णायक रूप में प्रस्तुत किए गए। यूएसएस कोल हमले में ईरान की सीधी भूमिका निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हुई है। परमाणु ठिकानों के “पूर्ण विनाश” का दावा आधिकारिक आकलनों से मेल नहीं खाता। वहीं, लंबी दूरी की मिसाइलों और परमाणु बम कार्यक्रम को लेकर भी खतरे की तस्वीर उतनी स्पष्ट नहीं है जितनी ट्रंप ने पेश की। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी और आधिकारिक खुफिया निष्कर्षों के बीच अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि इससे न केवल विदेश नीति बल्कि वैश्विक सुरक्षा संतुलन भी प्रभावित होता है।