होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से 10 प्रतिशत महंगा हुआ कच्चा तेल, जानें क्‍या होगा भारत पर असर

रविवार को ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 10 प्रतिशत उछलकर लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। चूंकि रविवार को वायदा बाजार बंद रहता है, इसलिए यह तेजी मुख्य रूप से ओटीसी सौदों में दर्ज की गई।

Update: 2026-03-01 21:33 GMT
लंदन/नई दिल्‍ली। Crude Oil Prices Increased: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में जबरदस्त हलचल देखी जा रही है। रविवार को ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 10 प्रतिशत उछलकर लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। चूंकि रविवार को वायदा बाजार बंद रहता है, इसलिए यह तेजी मुख्य रूप से ओटीसी सौदों में दर्ज की गई। विश्लेषकों का कहना है कि यदि हालात नहीं सुधरे और होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बाधित रही, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू सकती हैं या उससे आगे भी जा सकती हैं।

ओवर-द-काउंटर (OTC) कारोबार क्या है?

ओवर-द-काउंटर यानी ओटीसी ट्रेडिंग वह व्यवस्था है जिसमें खरीदार और विक्रेता किसी केंद्रीय एक्सचेंज जैसे एमसीएक्स या एनवाईएमईएक्स के बजाय सीधे आपस में सौदा करते हैं। यह एक विकेंद्रीकृत बाजार है, जहां कीमत, डिलीवरी की तारीख और तेल की मात्रा जैसे शर्तें दोनों पक्षों की सहमति से तय होती हैं। रविवार को फ्यूचर्स मार्केट बंद रहने के कारण ओटीसी सौदों में जो भी संकेत मिले, वे आगामी सप्ताह के लिए संभावित रुझान का संकेत माने जा रहे हैं। अनुमान है कि हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और अन्य ईंधन इसी मार्ग से वैश्विक बाजार तक पहुंचता है। ऐसे में यदि आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना प्रमुख चिंता

आईसीआईएस में ऊर्जा और रिफाइनिंग के निदेशक अजय परमार के अनुसार, मौजूदा तेजी केवल सैन्य हमलों की वजह से नहीं, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य के संभावित बंद होने की आशंका के कारण है। परमार ने कहा, सैन्य घटनाएं तेल की कीमतों को ऊपर धकेल रही हैं, लेकिन असली उछाल होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने की आशंका से आया है। यदि वहां लंबे समय तक रुकावट रही, तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब खुल सकती हैं और उससे ऊपर भी जा सकती हैं।” ईरान द्वारा जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने के खिलाफ चेतावनी दिए जाने के बाद कई टैंकर मालिकों, बड़ी तेल कंपनियों और ट्रेडिंग हाउस ने कच्चे तेल, फ्यूल और एलएनजी की शिपमेंट अस्थायी रूप से रोक दी है।

जहाजों को रेडियो पर चेतावनी

यूरोपीय संघ के नौसैनिक मिशन ‘एस्पाइड्स’ के एक अधिकारी ने बताया कि क्षेत्र में संचालित जहाजों को ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की ओर से वीएचएफ रेडियो संदेश मिल रहे हैं। इन संदेशों में कथित तौर पर चेतावनी दी गई है कि किसी भी जहाज को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं है। हालांकि, तेहरान ने औपचारिक रूप से इस तरह का कोई आदेश जारी करने की पुष्टि नहीं की है। ईरान पहले भी कह चुका है कि यदि उस पर हमला होता है तो वह इस संकरे समुद्री मार्ग को बंद करने पर विचार कर सकता है।

क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी के प्रवेश द्वार पर स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है। इसके उत्तर में ईरान और दक्षिण में संयुक्त अरब अमीरात व ओमान स्थित हैं। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवन रेखा माना जाता है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसके अलावा सऊदी अरब, ईरान, यूएई, कुवैत और इराक जैसे प्रमुख ओपेक सदस्य एशियाई बाजारों तक पहुंचने के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। कतर अपनी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का निर्यात मुख्य रूप से इसी रास्ते से करता है। वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इस जलमार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का व्यवधान पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है।

120 से 150 डॉलर तक जा सकती हैं कीमतें?

केप्लर लिमिटेड के विश्लेषकों के मुताबिक, यदि ईरान एक दिन के लिए भी इस मार्ग को अवरुद्ध करता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। तुलना के लिए, इस वर्ष 20 फरवरी तक ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य करीब 66 डॉलर प्रति बैरल था। मौजूदा स्थिति में यदि आपूर्ति बाधित होती है, तो यह उछाल वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है और कई अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाल सकता है। आरबीसी की विश्लेषक हेलिमा क्राफ्ट ने भी चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया के नेताओं ने वाशिंगटन को आगाह किया है कि ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं।

क्या ईरान वास्तव में मार्ग बंद कर सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद करना आसान नहीं होगा।

कारण स्पष्ट हैं-

ईरान खुद अपने तेल निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर है। इसे बंद करने से उसकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। चीन, जो ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है, के साथ उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं। पश्चिमी नौसेनाएं कड़ी प्रतिक्रिया दे सकती हैं। हालांकि, ईरान छोटे पैमाने पर व्यवधान पैदा कर सकता है-जैसे छोटी गश्ती नौकाओं, समुद्री बारूदी सुरंगों, ड्रोन हमलों या जीपीएस हस्तक्षेप के जरिए व्यावसायिक जहाजों के लिए खतरा बढ़ाना।

ओपेक+ की सीमित उत्पादन बढ़ोतरी

रविवार को ओपेक+ समूह ने अप्रैल से उत्पादन में 2,06,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि पर सहमति जताई। यह वृद्धि वैश्विक मांग का 0.2 प्रतिशत से भी कम है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बाजार की चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

भारत पर क्या होगा असर?

भारतीय अधिकारियों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के अल्पकालिक बंद होने से भारत को तत्काल आपूर्ति संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।भारत के पास टैंक और पारगमन में मिलाकर 10 से 15 दिन का कच्चे तेल का भंडार है। इसके अलावा, ईंधन टैंकों में 7 से 10 दिन की जरूरतों को पूरा करने लायक स्टॉक उपलब्ध है। एक अधिकारी ने कहा, कम अवधि के व्यवधान से भारत पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन कीमतों में तेजी का प्रभाव जरूर दिखाई देगा। ब्रेंट क्रूड हाल में सात महीने के उच्च स्तर, करीब 73 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था। यदि आपूर्ति बाधित होती है, तो कीमतें 80 डॉलर या उससे अधिक की ओर बढ़ सकती हैं।

आयात के वैकल्पिक स्रोत

भारत आवश्यकता पड़ने पर रूस, वेनेजुएला, ब्राजील और अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ा सकता है। हालांकि, एलएनजी के मामले में विकल्प सीमित हैं, क्योंकि इसके अनुबंध और हाजिर बाजार की उपलब्धता कच्चे तेल की तुलना में कम लचीली होती है। एक अधिकारी ने बताया कि एलएनजी के लंबे समय तक बाधित रहने पर स्थिति जटिल हो सकती है, क्योंकि हाजिर बाजार में इसकी उपलब्धता सीमित है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबी अवधि तक बाधा बनी रहती है, तो इसके व्यापक आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं। ईंधन महंगा होगा, जिससे परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ेगी। मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ेगा। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के चालू खाते पर असर पड़ सकता है। शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। फिलहाल बाजार की नजर आने वाले दिनों पर टिकी है। क्या यह तनाव अस्थायी साबित होगा या ऊर्जा बाजार के लिए एक बड़े संकट में बदल जाएगा, इसका जवाब पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति तय करेगी।

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