डेनमार्क के साथ तनाव के बीच ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बयान जारी किया

राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह कहते आ रहे हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए बेहद अहम है। हाल के बयानों में उन्होंने यहां तक कहा कि वह इस आर्कटिक द्वीप को हासिल करने के लिए सैन्य बल सहित सभी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।

Update: 2026-01-14 07:28 GMT
वॉशिंगटन/कोपेनहेगन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने या उसे अलग होने के लिए मजबूर करने की मांग ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ने इस दिशा में आक्रामक कदम उठाए, तो यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने ट्रांसअटलांटिक सुरक्षा ढांचे को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है। नाटो और यूरोपीय सहयोग पर आधारित यह गठबंधन अब तक पश्चिमी सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ रहा है।

ट्रंप का आक्रामक रुख
राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह कहते आ रहे हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए बेहद अहम है। हाल के बयानों में उन्होंने यहां तक कहा कि वह इस आर्कटिक द्वीप को हासिल करने के लिए सैन्य बल सहित सभी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। ट्रंप का तर्क है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया, तो रूस या चीन इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। वहीं, ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने डेनमार्क के साथ रहने की प्राथमिकता पर जोर दिया। इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, 'खैर, यह उनकी समस्या है। मैं उनसे असहमत हूं। मैं उन्हें नहीं जानता। उनके बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता। लेकिन यह उनके लिए एक बड़ी समस्या बनने वाली है।' ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि वह किसी समझौते के जरिए ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करना चाहेंगे, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि “किसी भी तरह से ग्रीनलैंड हमें मिलेगा।” उनके इस बयान को यूरोप में गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री का दो टूक जवाब
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने ट्रंप के बयानों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनका देश डेनमार्क के साथ बने रहना चाहता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर हमें अभी और यहीं अमेरिका और डेनमार्क के बीच चुनना पड़े, तो हम डेनमार्क को चुनेंगे। हम नाटो को चुनेंगे। हम डेनमार्क साम्राज्य और यूरोपीय संघ को चुनेंगे।” नीलसन के इस बयान से यह साफ हो गया है कि ग्रीनलैंड की राजनीतिक प्राथमिकता संप्रभुता और मौजूदा गठबंधनों को बनाए रखने की है, न कि किसी दबाव में आकर रास्ता बदलने की।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड की साझा एकजुटता
कोपेनहेगन में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने ग्रीनलैंड के साथ पूरी मजबूती से खड़े रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा, “प्रिय ग्रीनलैंडवासियों, आपको यह जानना चाहिए कि हम आज एक साथ खड़े हैं, हम कल भी एक साथ खड़े रहेंगे और आगे भी ऐसा ही करेंगे।” डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों नेताओं ने ट्रंप के उस आह्वान का कड़ा विरोध किया, जिसमें उन्होंने ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लाने की बात कही थी। दोनों देशों ने जोर देकर कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और नाटो सैन्य गठबंधन के अंतर्गत आता है।

व्हाइट हाउस में अहम बैठक
इस विवाद के बीच कूटनीतिक स्तर पर भी हलचल तेज हो गई है। डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्ज़फेल्ड बुधवार को व्हाइट हाउस में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात करने वाले हैं। इस बैठक को तनाव कम करने और संभावित टकराव से बचने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, डेनमार्क ने यह भी संकेत दिया है कि वह ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना के साथ सहयोग बढ़ाने को तैयार है, लेकिन उसने साफ कर दिया है कि यह सहयोग संप्रभुता से समझौता किए बिना ही होगा।

“ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है”
डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने एक स्वर में कहा है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। डेनमार्क के अधिकारियों ने ट्रंप के इस विचार को खारिज कर दिया कि किसी सौदे के जरिए यह द्वीप अमेरिका को सौंपा जा सकता है। उनका कहना है कि ग्रीनलैंड की स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून, नाटो प्रतिबद्धताओं और स्थानीय जनता की इच्छा से तय होती है।

ट्रांसअटलांटिक गठबंधन पर खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर दबाव बढ़ाया या सैन्य विकल्प की ओर कदम बढ़ाया, तो इससे अमेरिका-यूरोप संबंधों में गहरी दरार पड़ सकती है। नाटो सहयोगियों के बीच अविश्वास बढ़ेगा और रूस-चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों को पश्चिमी एकता को कमजोर करने का मौका मिलेगा। ग्रीनलैंड का मुद्दा अब सिर्फ एक द्वीप का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह पश्चिमी दुनिया की सुरक्षा, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय नियमों की परीक्षा बन चुका है।

आगे क्या?
आने वाले दिनों में व्हाइट हाउस में होने वाली बातचीत और ट्रंप प्रशासन के अगले कदम इस विवाद की दिशा तय करेंगे। फिलहाल, डेनमार्क और ग्रीनलैंड की एकजुटता यह संकेत दे रही है कि वे किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। वहीं, दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि अमेरिका अपने बयानबाज़ी से आगे बढ़कर क्या ठोस कदम उठाता है या कूटनीति का रास्ता अपनाता है।

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