तेहरान/वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने की कूटनीतिक कोशिशें फिलहाल विफल होती नजर आ रही हैं। ईरान के नए सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने युद्धविराम और तनाव घटाने से जुड़े प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया है। इस फैसले ने संकेत दे दिया है कि फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं हैं और संघर्ष आगे और तेज हो सकता है।
‘अब बातचीत का समय नहीं’
एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, दो मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका की ओर से तनाव कम करने और संभावित युद्धविराम के प्रस्ताव तेहरान भेजे गए थे। हालांकि, सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने इन्हें स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि जब तक अमेरिका और इजरायल को “घुटनों पर नहीं लाया जाता”, तब तक शांति वार्ता का कोई सवाल ही नहीं उठता। इस बयान को ईरान के कड़े और आक्रामक रुख के तौर पर देखा जा रहा है।
पहली उच्चस्तरीय बैठक में ही सख्त संदेश
सूत्रों के मुताबिक, सुप्रीम लीडर बनने के बाद मोजतबा खामेनेई ने विदेश नीति पर अपनी पहली उच्चस्तरीय बैठक में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वह बैठक में व्यक्तिगत रूप से मौजूद थे या वर्चुअल माध्यम से जुड़े। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में सुप्रीम लीडर को रक्षा, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सभी प्रमुख फैसलों का अंतिम अधिकार होता है। ऐसे में उनका यह रुख आने वाले समय की नीति का संकेत माना जा रहा है।
ट्रंप प्रशासन ने भी ठुकराई मध्यस्थता
सूत्रों के अनुसार, 14 मार्च को पश्चिम एशिया के कुछ सहयोगी देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद शुरू कराने की कोशिश की थी। इसका उद्देश्य युद्ध को रोकना और समाधान की दिशा में कदम बढ़ाना था। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने इस पहल को स्वीकार नहीं किया। इससे यह साफ हो गया कि अमेरिका भी फिलहाल सैन्य दबाव की रणनीति से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है।
तीन सप्ताह में 2000 से ज्यादा मौतें
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी यह संघर्ष अब तीसरे सप्ताह में पहुंच चुका है। विभिन्न आकलनों के अनुसार, इस दौरान 2000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। लगातार हो रहे हमलों और जवाबी कार्रवाई के कारण हालात और बिगड़ते जा रहे हैं, जबकि किसी भी तरह के समाधान के संकेत फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना रणनीतिक हथियार
ईरान पहले ही संकेत दे चुका है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को नियंत्रित करना उसकी रणनीति का अहम हिस्सा है। उसने इसे अपने विरोधियों पर दबाव बनाने का एक प्रभावी साधन बताया है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। ऐसे में इसका प्रभावित होना वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रहा है।
ऊर्जा संकट गहराया, कीमतों में उछाल
होर्मुज जलडमरूमध्य के लगभग बंद होने की स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसका असर यह हुआ है कि कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबी चली, तो वैश्विक महंगाई पर भी इसका असर पड़ेगा और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
सहयोगी देशों ने बनाई दूरी
अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों से इस समुद्री मार्ग को खुलवाने के लिए मदद मांगी थी, लेकिन कई यूरोपीय देशों ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। यह रुख दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संघर्ष को लेकर एकराय नहीं है और कई देश इसमें सीधे शामिल होने से बचना चाहते हैं।
बढ़ती अनिश्चितता और क्षेत्रीय खतरे
मौजूदा हालात में सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच लगातार बढ़ती तनातनी ने पूरे मध्य पूर्व को अस्थिर बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्द ही कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।