इजरायल और अमेरिका से युद्ध में कैसे भारी पड़ा ईरान, MI6 के पूर्व चीफ ने बताया, समझें तेहरान का मिलिट्री प्लान

एलेक्स यंगर ने ‘द इकोनॉमिस्ट’ से बातचीत में कहा कि ईरान ने युद्ध के मैदान में उम्मीद से कहीं ज्यादा लचीलापन और रणनीतिक क्षमता दिखाई है। उन्होंने स्वीकार किया कि यह निष्कर्ष उनके लिए सहज नहीं है, क्योंकि अपने करियर के दौरान उन्होंने ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) की गतिविधियों का विरोध किया है।

Update: 2026-03-27 06:51 GMT

लंदन/तेहरान/वॉशिंगटन: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी MI6 के पूर्व प्रमुख एलेक्स यंगर ने एक बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि अमेरिका और इजरायल के साथ जारी युद्ध में ईरान ने रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए “मजबूर” है। हालांकि, तेहरान ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि वह किसी भी युद्धविराम वार्ता में शामिल नहीं है।

‘अप्रत्याशित लचीलापन दिखा रहा ईरान’

एलेक्स यंगर ने ‘द इकोनॉमिस्ट’ से बातचीत में कहा कि ईरान ने युद्ध के मैदान में उम्मीद से कहीं ज्यादा लचीलापन और रणनीतिक क्षमता दिखाई है। उन्होंने स्वीकार किया कि यह निष्कर्ष उनके लिए सहज नहीं है, क्योंकि अपने करियर के दौरान उन्होंने ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) की गतिविधियों का विरोध किया है। यंगर ने कहा, “हमारे बीच कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ईरान ने खुद को मजबूत साबित किया है। अमेरिका ने इस संघर्ष को कम करके आंका और करीब दो हफ्ते पहले अपनी बढ़त खो दी।”

हमले के बावजूद कायम रहा प्रतिरोध

युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान को बड़ा झटका तब लगा, जब उसके शीर्ष नेतृत्व पर हमले हुए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की भी हमले में मौत हो गई थी। इसके बावजूद ईरान का सैन्य ढांचा पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ। यंगर के अनुसार, इसका कारण ईरान की विकेंद्रीकृत सैन्य रणनीति है। ईरान ने अपनी सैन्य क्षमताओं को विभिन्न क्षेत्रों में फैला रखा है और अलग-अलग यूनिट्स को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने और कार्रवाई करने की छूट दी गई है। इसी वजह से नेतृत्व को नुकसान पहुंचने के बाद भी उनका प्रतिरोध जारी रहा।

ईरान की ‘हॉरिजॉन्टल एस्केलेशन’ रणनीति

यंगर ने ईरान की युद्ध रणनीति को ‘हॉरिजॉन्टल एस्केलेशन’ बताया। इसका मतलब है कि ईरान किसी एक मोर्चे तक सीमित न रहकर कई क्षेत्रों में एक साथ दबाव बना रहा है। इस रणनीति के तहत तेहरान अपने विरोधियों के अलग-अलग ठिकानों पर हमले कर रहा है, जिससे उन्हें हर दिशा में सतर्क रहना पड़ रहा है। यंगर के मुताबिक, शुरुआत में यह रणनीति अव्यवस्थित और जोखिम भरी लग रही थी, लेकिन अब यह प्रभावी साबित हो रही है।

ऊर्जा मार्ग को निशाना बनाकर बढ़ाया वैश्विक दबाव

ईरान की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करना रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य जो वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है को खतरे में डालकर ईरान ने युद्ध को क्षेत्रीय से वैश्विक स्तर तक पहुंचा दिया है। यह संकरा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। इस मार्ग पर खतरे के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा संकट की स्थिति बनने लगी है, जिसका असर भारत समेत कई देशों पर पड़ सकता है।

अमेरिका के लिए बढ़ती चुनौती

यंगर का मानना है कि ईरान की रणनीति अमेरिका को “भारी कीमत चुकाने” पर मजबूर कर रही है। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष अब केवल सैन्य नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक और वैश्विक दबाव का रूप ले चुका है। अमेरिका और उसके सहयोगियों को अब कई मोर्चों पर एक साथ जवाब देना पड़ रहा है, जिससे उनकी रणनीतिक स्थिति जटिल होती जा रही है।


रणनीति ने बदला युद्ध का समीकरण

पूर्व MI6 प्रमुख एलेक्स यंगर का आकलन इस ओर इशारा करता है कि युद्ध में केवल सैन्य ताकत ही निर्णायक नहीं होती, बल्कि रणनीति और लचीलापन भी अहम भूमिका निभाते हैं। ईरान ने अपने संसाधनों और रणनीतिक सोच के दम पर इस संघर्ष में खुद को मजबूती से खड़ा किया है। अब यह देखना अहम होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगी इस चुनौती का सामना किस तरह करते हैं और क्या आने वाले समय में युद्ध की दिशा बदलती है।

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