वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जिसने भारत-अमेरिका संबंधों और ऊर्जा कूटनीति पर बहस तेज कर दी है। ट्रंप ने कहा है कि रूसी तेल खरीदने के कारण भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए गए हैं, जिससे प्रधानमंत्री मोदी उनसे “ज्यादा खुश नहीं” हैं। ट्रंप ने यह टिप्पणी मंगलवार को वॉशिंगटन में हाउस रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों की बैठक के दौरान की।
ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी खुद उनसे मिलने आए थे और उनसे मुलाकात की अनुमति मांगी थी। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह बातचीत कब और कहां हुई। उनके बयान को लेकर भारत में राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
ट्रंप का दावा: मोदी खुद मिलने आए
हाउस रिपब्लिकन पार्टी की बैठक में ट्रंप ने कहा, “पीएम मोदी मुझसे ज्यादा खुश नहीं हैं, क्योंकि हमने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। लेकिन वह खुद मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने कहा, सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं? और मैंने कहा, हां।” ट्रंप ने इस बातचीत का कोई संदर्भ या तारीख नहीं बताई, लेकिन उन्होंने यह जरूर जोड़ा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते उनके कार्यकाल में “बहुत अच्छे” रहे हैं। उनके मुताबिक, भारत कई वर्षों से अमेरिका से रक्षा सौदों और व्यापार को लेकर बातचीत करता रहा है।
अपाचे हेलिकॉप्टर और रक्षा सौदे का जिक्र
ट्रंप ने अपने बयान में भारत द्वारा अपाचे हेलिकॉप्टरों की खरीद का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अपाचे हेलिकॉप्टर की वजह से भारत कई सालों से उनके पास आ रहा था और अब “हम इसे बदल रहे हैं।” ट्रंप के मुताबिक, भारत ने 68 अपाचे हेलिकॉप्टरों का ऑर्डर दिया है। उन्होंने कहा, “मेरे और पीएम मोदी के बीच बहुत अच्छे रिश्ते हैं। अब भारत ने रूस से तेल खरीदना काफी हद तक कम कर दिया है।”
50% टैरिफ का ब्योरा
ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत पर लगाए गए कुल 50 प्रतिशत टैरिफ में से 25 प्रतिशत “अतिरिक्त टैरिफ” रूस से तेल खरीदने की वजह से लगाया गया है। उनके अनुसार, यह कदम यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी नीति का हिस्सा है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप रहा है कि भारत जैसे देश रूस से तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन पर हो रहे हमलों को फंड कर रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर सख्त रुख अपनाया है।
ट्रंप का पुराना बयान
गौरतलब है कि ट्रंप ने इससे एक दिन पहले भी भारत के रूस से तेल आयात कम करने को लेकर बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि भारत ने यह फैसला उन्हें खुश करने के लिए लिया। ट्रंप ने कहा था, “वे मुझे खुश करना चाहते थे। प्रधानमंत्री मोदी बहुत अच्छे इंसान हैं। वह जानते थे कि मैं खुश नहीं था, इसलिए मुझे खुश करना जरूरी था। हम व्यापार करते हैं और उन पर टैरिफ बढ़ा सकते हैं।” इस बयान के बाद भारत में विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा था और सवाल उठाए थे कि क्या भारत की ऊर्जा नीति विदेशी दबाव में बदली जा रही है।
भारतीय राजदूत और 25% टैरिफ हटाने की अपील का दावा
इस पूरे विवाद में अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम का बयान भी चर्चा में है। ट्रंप के साथ मौजूद ग्राहम ने दावा किया कि करीब एक महीने पहले वह भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के घर गए थे। उस मुलाकात में सबसे ज्यादा चर्चा भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद कम करने को लेकर हुई थी।
ग्राहम के मुताबिक, भारतीय राजदूत ने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं राष्ट्रपति ट्रंप तक यह संदेश पहुंचाऊं कि भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ हटाया जाए।” उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत के दौरान यह बात सामने आई कि भारत अब पहले के मुकाबले रूस से काफी कम मात्रा में तेल खरीद रहा है और यह मुद्दा द्विपक्षीय चर्चा का अहम हिस्सा रहा।
चार साल बाद रूस से तेल आयात में गिरावट
आंकड़ों के स्तर पर देखें तो भारत ने 2021 के बाद पहली बार रूस से कच्चे तेल का आयात घटाया है। नवंबर में भारत का रूसी तेल आयात करीब 17.7 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो दिसंबर में घटकर लगभग 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह आंकड़ा और गिर सकता है। अनुमान है कि जनवरी में भारत का रूसी तेल आयात 10 लाख बैरल प्रतिदिन से भी नीचे आ सकता है।
अमेरिकी प्रतिबंधों का असर
भारत के रूसी तेल आयात में कमी की एक बड़ी वजह अमेरिकी प्रतिबंध भी हैं। 21 नवंबर से रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू हुए। इसके बाद भारत के लिए रूस से तेल खरीदना और उसे ढोना ज्यादा जटिल और महंगा हो गया। शिपिंग, बीमा और भुगतान से जुड़ी दिक्कतों ने भी भारत के लिए रूसी तेल को कम आकर्षक बना दिया है।
रूस ने घटाया डिस्काउंट, बदला समीकरण
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने अपने कच्चे तेल पर भारी छूट देनी शुरू की थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, जबकि रूस भारत जैसे देशों को 20–25 डॉलर प्रति बैरल सस्ता तेल दे रहा था। यह भारत के लिए बेहद फायदेमंद सौदा था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरकर करीब 63 डॉलर प्रति बैरल रह गई है। इसके साथ ही रूस ने भी अपनी छूट घटाकर केवल 1.5 से 2 डॉलर प्रति बैरल कर दी है। इतनी कम छूट में भारत को पहले जैसा आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा। ऊपर से रूस से तेल लाने में शिपिंग और बीमा खर्च भी ज्यादा पड़ता है।
पुराने सप्लायर्स की ओर लौट रहा भारत
इन बदले हुए हालात में भारत एक बार फिर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अमेरिका जैसे पारंपरिक और स्थिर सप्लायर्स से तेल खरीद की ओर लौट रहा है। जानकारों का कहना है कि अब कीमत में रूस और अन्य देशों के तेल के बीच बड़ा अंतर नहीं बचा है, ऐसे में भरोसेमंद सप्लाई और कम जोखिम भारत की प्राथमिकता बन गई है।
कूटनीतिक और राजनीतिक मायने
विश्लेषकों के मुताबिक, ट्रंप के बयानों का असर केवल व्यापार या ऊर्जा नीति तक सीमित नहीं है। यह भारत-अमेरिका संबंधों की संवेदनशीलता, यूक्रेन युद्ध की वैश्विक राजनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ा मामला है। भारत आधिकारिक तौर पर यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों और बाजार स्थितियों पर आधारित है, न कि किसी देश के दबाव पर। लेकिन ट्रंप के बयानों ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या भारत पर अमेरिकी दबाव काम कर रहा है।
फिलहाल, रूस से तेल आयात में आई गिरावट, अमेरिकी टैरिफ और ट्रंप के सार्वजनिक बयान इन तीनों ने भारत-अमेरिका रिश्तों को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह विवाद कूटनीतिक बातचीत से सुलझता है या दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ता है।