वॉशिंगटन/नुक। रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक रुख ने अमेरिकी राजनीति में नई खींचतान पैदा कर दी है। जहां एक ओर ट्रंप बार-बार ग्रीनलैंड पर अमेरिका के नियंत्रण की जरूरत बताते हुए धमकी भरे बयान दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी ही सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस विचार के खुलकर खिलाफ खड़े हो गए हैं। डेमोक्रेट सांसदों के साथ-साथ रिपब्लिकन सांसदों ने भी ग्रीनलैंड की स्वायत्तता और डेनमार्क की संप्रभुता के समर्थन में मोर्चा खोल दिया है, जिससे ट्रंप अपनी ही पार्टी में अलग-थलग नजर आने लगे हैं।
रिपब्लिकन पार्टी में दरार, ट्रंप के लिए असहज स्थिति
ग्रीनलैंड को लेकर यह विवाद अब महज विदेश नीति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह अमेरिकी घरेलू राजनीति में भी गहराते मतभेदों का प्रतीक बन गया है। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर दोफाड़ की स्थिति ने राष्ट्रपति ट्रंप के लिए एक बार फिर राजनीतिक शर्मिंदगी खड़ी कर दी है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टियों के सांसदों का एक संयुक्त 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ग्रीनलैंड पहुंच गया है। यह दल डेनमार्क और ग्रीनलैंड के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर उन्हें यह भरोसा दिलाएगा कि अमेरिकी संसद का एक बड़ा वर्ग ट्रंप के रुख से सहमत नहीं है और ग्रीनलैंड की स्वायत्तता का समर्थन करता है। इस प्रतिनिधिमंडल में रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस और लीजा मुर्कोवस्की जैसे प्रभावशाली नेता शामिल हैं, जिनकी मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ट्रंप के विचार को पार्टी के भीतर व्यापक समर्थन हासिल नहीं है।
सुरक्षा और खनिजों का तर्क दे रहे हैं ट्रंप
राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। उनका तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों, रूस और चीन की दिलचस्पी तथा सैन्य संतुलन के लिहाज से अमेरिका को ग्रीनलैंड की “सख्त जरूरत” है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों की विशाल संभावनाएं मौजूद हैं, जो भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। ट्रंप ने इन दलीलों के आधार पर यहां तक संकेत दिए कि यदि जरूरत पड़ी तो ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने के लिए बल प्रयोग के विकल्प से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उनके इन बयानों ने यूरोप और नाटो सहयोगियों में गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
यूरोप की प्रतिक्रिया, डेनमार्क को समर्थन
ट्रंप के सख्त रुख के बाद डेनमार्क के आग्रह पर कुछ यूरोपीय देशों ने सीमित संख्या में सैन्य बल ग्रीनलैंड क्षेत्र में भेजे हैं। इसे प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा और संप्रभुता पर किसी भी तरह का दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। डेनमार्क साफ कर चुका है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है और वहां की जनता को अपने भविष्य का फैसला करने का पूरा अधिकार है।
अमेरिकी सांसदों का संदेश: सहयोगियों से दूरी नहीं
डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस कून्स के नेतृत्व में पहुंचे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस फ्रेडरिक नील्सन से मुलाकात प्रस्तावित है। कून्स ने यात्रा से पहले जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के इस दौर में हमें अपने सहयोगियों के और करीब रहने की जरूरत है, न कि उन्हें दूर धकेलने की।” उनका यह बयान सीधे तौर पर ट्रंप की नीति पर सवाल खड़ा करता है। न्यू हैम्पशायर की सीनेटर जीन शाहीन, जो सीनेट की विदेश संबंध समिति की सदस्य भी हैं, ने चेतावनी दी है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे की सुगबुगाहट से नाटो की छवि को गहरा नुकसान पहुंचा है। उनके मुताबिक, इससे यह संदेश गया है कि अमेरिका अपने ही सहयोगियों की संप्रभुता का सम्मान नहीं करता, जिसका फायदा रूस और चीन जैसे देश उठा सकते हैं।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की कूटनीतिक सक्रियता
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्सफेल्ट ने भी इस मुद्दे पर कूटनीतिक मोर्चा संभाल लिया है। दोनों नेताओं ने अमेरिका जाकर वहां के सांसदों से मुलाकात करने और ग्रीनलैंड के पक्ष में समर्थन जुटाने का फैसला किया है। उनका उद्देश्य अमेरिकी राजनीतिक नेतृत्व को यह समझाना है कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर किसी भी तरह का दबाव अंतरराष्ट्रीय नियमों और साझेदारी की भावना के खिलाफ होगा।
अमेरिकी जनमत भी ट्रंप के खिलाफ
ट्रंप के दावों के उलट अमेरिकी जनता का बड़ा हिस्सा भी ग्रीनलैंड को लेकर उनके रुख से सहमत नहीं दिखता। रॉयटर्स और इप्सोस के हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 17 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने ही ग्रीनलैंड पर कब्जे के विचार का समर्थन किया है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि ट्रंप की यह नीति न तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और न ही घरेलू मोर्चे पर व्यापक समर्थन हासिल कर पाई है।
बढ़ती मुश्किलें
कुल मिलाकर ग्रीनलैंड मुद्दे पर राष्ट्रपति ट्रंप का आक्रामक रवैया अब उनके लिए राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौती बनता जा रहा है। अपनी ही पार्टी के नेताओं का विरोध, सहयोगी देशों की नाराजगी और घरेलू जनमत का अभाव इन सभी ने मिलकर ट्रंप को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां उन्हें अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।