डेनमार्क की PM की खुली चेतावनी, कब्जा हुआ तो NATO का अंत तय, ग्रीनलैंड पर अमेरिका–यूरोप टकराव तेज
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन ने अमेरिका को खुली चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की, तो इसका सीधा अर्थ नाटो सैन्य गठबंधन का अंत होगा।
कोपेनहेगन/वाशिंगटन। रणनीतिक और खनिज-संपदा से भरपूर आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच टकराव अब अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन ने अमेरिका को खुली चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की, तो इसका सीधा अर्थ नाटो सैन्य गठबंधन का अंत होगा। उनका यह बयान ट्रंप के उस ताजा एलान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका अगले 20 दिनों के भीतर ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में ले लेगा।
फ्रेडरिकसन के इस कड़े रुख ने यूरोप में पहले से मौजूद बेचैनी को और गहरा कर दिया है। कई यूरोपीय देशों ने खुलकर डेनमार्क और ग्रीनलैंड के समर्थन का एलान किया है, जबकि अमेरिका के भीतर ट्रंप प्रशासन इसे “रणनीतिक सुरक्षा की अनिवार्यता” बता रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों को झकझोर दिया है, बल्कि नाटो की एकता और भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ट्रंप का एलान और बढ़ता तनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक बयान में कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है और इसे अमेरिकी नियंत्रण में लाना अब समय की मांग है। ट्रंप ने यहां तक कहा कि यह प्रक्रिया लंबी नहीं होगी और “अगले 20 दिनों में” स्थिति साफ हो जाएगी। इस बयान को यूरोप में सीधी धमकी के तौर पर देखा गया।
तनाव तब और बढ़ गया जब ट्रंप ने डेनमार्क द्वारा ग्रीनलैंड की सुरक्षा बढ़ाने के प्रयासों का मजाक उड़ाया। उन्होंने संकेत दिया कि डेनमार्क के पास न तो पर्याप्त सैन्य ताकत है और न ही वह ग्रीनलैंड की रक्षा अकेले कर सकता है। इस टिप्पणी ने डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों में तीखी नाराजगी पैदा की।
डेनमार्क की दो टूक चेतावनी
डेनमार्क के सरकारी चैनल टीवी2 को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन ने बेहद सख्त लहजे में कहा, “अगर अमेरिका किसी दूसरे नाटो देश पर हमला करता है, तो सब कुछ रुक जाएगा। इसमें नाटो का अंत भी शामिल है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ट्रंप को हल्के में नहीं लिया जा सकता और ग्रीनलैंड या डेनमार्क को इस तरह धमकाना पूरी तरह अस्वीकार्य है। फ्रेडरिकसन के मुताबिक, नाटो की बुनियाद आपसी भरोसे और सामूहिक सुरक्षा पर टिकी है। यदि अमेरिका ही किसी सहयोगी देश की संप्रभुता को चुनौती देता है, तो गठबंधन का अस्तित्व ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।
प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है और इसका भविष्य वहां के लोग और डेनमार्क मिलकर तय करेंगे। उन्होंने कहा कि सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सहयोग संभव है, लेकिन दबाव और धमकी के जरिए फैसले थोपना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
व्हाइट हाउस का पलटवार
डेनमार्क और यूरोप की कड़ी प्रतिक्रिया के बीच व्हाइट हाउस ने भी अपना पक्ष रखा है। राष्ट्रपति के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ ने कहा कि ग्रीनलैंड का अमेरिका के नियंत्रण में होना “रणनीतिक सुरक्षा” के लिहाज से जरूरी है। उनके अनुसार, ट्रंप कई महीनों से यह दोहराते आ रहे हैं कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए वहां संपूर्ण सुरक्षा ढांचा विकसित करना अनिवार्य है, और इसके लिए अमेरिकी नियंत्रण जरूरी है।
व्हाइट हाउस का तर्क है कि रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक सुरक्षा का नया केंद्र बन चुका है। ऐसे में अमेरिका ग्रीनलैंड को केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि अपनी मिसाइल डिफेंस, स्पेस सर्विलांस और सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा मानता है।
वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड की आशंका
यूरोप में चिंता का एक बड़ा कारण वेनेजुएला में हाल ही में किया गया अमेरिकी सैन्य अभियान भी है। शनिवार रात वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को असाधारण सैन्य कार्रवाई में अमेरिका लाए जाने के बाद यह आशंका और गहरा गई है कि ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड के मामले में भी आक्रामक कदम उठा सकता है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं को डर है कि ट्रंप की विदेश नीति अब केवल बयानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह सीधे सैन्य कार्रवाई तक जाने को तैयार हैं। इसी वजह से फ्रेडरिकसन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस फ्रेडरिक नील्सन ने ट्रंप की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए “गंभीर परिणामों” की चेतावनी दी है।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री का संदेश
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस फ्रेडरिक नील्सन ने एक न्यूज कॉन्फ्रेंस में साफ कहा कि ग्रीनलैंड की तुलना वेनेजुएला से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “ग्रीनलैंड एक लोकतांत्रिक समाज है। यहां के लोग अपने भविष्य का फैसला खुद करते हैं। किसी भी देश के लिए यहां रातोंरात कब्जा करना आसान नहीं है।” नील्सन ने ग्रीनलैंड के लोगों से शांत और एकजुट रहने की अपील की और भरोसा जताया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उनकी संप्रभुता का सम्मान करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ सहयोग के रास्ते खुले हैं, लेकिन दबाव और धमकी के जरिए नहीं।
यूरोप में बेचैनी, समर्थन की लहर
ट्रंप की हड़बड़ी और आक्रामक बयानबाजी ने पूरे यूरोप में हलचल मचा दी है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन समेत कई देशों ने खुलकर ग्रीनलैंड की संप्रभुता का समर्थन किया है। यूरोपीय नेताओं ने एक साझा बयान में कहा कि ग्रीनलैंड का भविष्य डेनमार्क और वहां के लोगों को तय करने देना चाहिए।
जर्मनी के विदेश मंत्री ने कहा कि यदि ग्रीनलैंड को किसी तरह का खतरा है, तो नाटो को सामूहिक रूप से उसकी सुरक्षा पर विचार करना चाहिए, न कि किसी एक देश को जबरन नियंत्रण थोपने की कोशिश करनी चाहिए। फ्रांस ने भी चेतावनी दी कि यूरोप अपनी सीमाओं और सहयोगी देशों की संप्रभुता के साथ किसी तरह का समझौता नहीं करेगा।
नाटो की भूमिका और दुविधा
नाटो ने इस पूरे विवाद पर संतुलित लेकिन स्पष्ट रुख अपनाया है। गठबंधन की ओर से कहा गया है कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है और इसे सहयोग और संवाद के जरिए ही मजबूत किया जा सकता है। हालांकि डेनमार्क की प्रधानमंत्री के बयान के बाद नाटो के भीतर भी चिंता बढ़ गई है कि यदि अमेरिका और किसी यूरोपीय सदस्य देश के बीच सीधा टकराव होता है, तो गठबंधन किस दिशा में जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नाटो के इतिहास का सबसे बड़ा आंतरिक संकट बन सकता है। एक तरफ अमेरिका है, जो नाटो का सबसे शक्तिशाली सदस्य है, और दूसरी तरफ यूरोपीय देश, जो अपनी संप्रभुता और एकता पर समझौता नहीं करना चाहते।
ग्रीनलैंड में पहले से अमेरिकी मौजूदगी
गौरतलब है कि अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य रूप से मौजूद है। अमेरिकी रक्षा विभाग 1951 से ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में पिटफिक स्पेस बेस (पूर्व में थुले एयर बेस) संचालित कर रहा है। यह बेस नाटो के लिए मिसाइल चेतावनी, मिसाइल डिफेंस और स्पेस सर्विलांस अभियानों में अहम भूमिका निभाता है।
इसके अलावा डेनमार्क अमेरिका का एक बड़ा रक्षा साझेदार है। वह अमेरिकी हथियारों का प्रमुख खरीदार है और हाल ही में उसने एफ-35 लड़ाकू विमान भी खरीदे हैं। डेनमार्क की संसद ने अपनी धरती पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अधिक पहुंच देने वाले एक विधेयक को भी मंजूरी दी है। ऐसे में यूरोपीय नेताओं का सवाल है कि जब अमेरिका को पहले से इतनी सैन्य सुविधा और सहयोग मिल रहा है, तो फिर ग्रीनलैंड पर कब्जे की जरूरत क्यों है।
क्यों अहम है ग्रीनलैंड?
ग्रीनलैंड न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जहां भविष्य में समुद्री मार्ग, ऊर्जा संसाधन और खनिज संपदा वैश्विक राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यहां दुर्लभ खनिज, तेल और गैस के बड़े भंडार होने की संभावना मानी जाती है। इसके साथ ही, ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अमेरिका को रूस और यूरोप के बीच एक अहम रणनीतिक बढ़त देती है। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन इसे केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा निवेश के रूप में देख रहा है।
आगे क्या?
विश्लेषकों के मुताबिक, ग्रीनलैंड को लेकर मौजूदा टकराव केवल एक द्वीप तक सीमित नहीं है। यह अमेरिका और यूरोप के बीच शक्ति-संतुलन, नाटो की विश्वसनीयता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान का भी सवाल बन गया है। यदि ट्रंप अपने रुख पर अड़े रहते हैं, तो ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में दशकों बाद सबसे बड़ी दरार पड़ सकती है।
फिलहाल यूरोप एकजुट दिखाई दे रहा है और डेनमार्क के समर्थन में मजबूती से खड़ा है। लेकिन आने वाले हफ्ते यह तय करेंगे कि यह विवाद कूटनीतिक बातचीत से सुलझेगा या फिर नाटो और वैश्विक राजनीति के लिए एक नए और खतरनाक मोड़ की शुरुआत करेगा।