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जब भी युग बदलता है वह अपने साथ नया बाँकपन, नये विधान, नये लोग, नयी मुहब्बतें लेकर आता है

Update: 2024-03-03 02:56 GMT

- पद्मा सचदेव

लब्भू भैया ने पहाड़ की एक औरत कई बरस तक घर में रखी पर उससे शादी करना न चाहते थे। माँ कहती, ''इस मुए को कहा था इसी पहाड़िन से शादी कर लो पर ब्राह्मण होने का इतना दम्भ मैंने किसी भी ब्राह्मण में नहीं देखा। पता नहीं इसे ब्राह्मणों ने क्या दिया। अपने बाप ने तो नाम तक दिया नहीं। रहा ब्राह्मण का ब्राह्मण ही। ब्राह्मणी ने कभी घर की देहरी न लाँघी। मुआ कुँआरा ही मरकर भूत बनकर इस दुनिया में रहेगा।''

जब भी युग बदलता है वह अपने साथ नया बाँकपन, नये विधान, नये लोग, नयी मुहब्बतें लेकर आता है। हर चीज़ पुरानी होते हुए भी नये तेवर के साथ जैसे नया जन्म ले लेती है। अगर कहीं कुछ नहीं बदला तो वह है बच्चे की मुस्कान, माँ की ममता और मुहब्बतों का दीवानापन। हाँ, कभी-कभी रिश्ते भी जन्मों तक साथ देते हैं।
गुजरे हुए वक़्तों में हैसियत वाले लोगों के घरों में काम करनेवाले नौकर-चाकर, पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने मालिकों के साथ रहते हुए उस घर के सदस्य जैसे हो जाते थे। उनके बच्चे भी वहीं आँगनों में खेल-खेलकर बड़े हो जाते, वहीं मालिकों के बाग़ों से अमरूद, सेब, इमली या सन्तरे चुराते, उनके बच्चों की उतरन पहनते, उनके आँगनों में सर्दियों में ठिठुरते हुए कोई पुराना बूट, स्वेटर या घिसा कम्बल भी पा जाते थे। नौकरों का पूरा परिवार ही अपनी सेवाओं से मालिक-मालकिनों को खुश करने की कोशिश करता। रात को मालिक के पाँव दबाते-दबाते ऊँघने पर वहीं कहीं पलंग के नीचे ढेर हो जाता।

बहुत से घरों में तो बुज़ुर्ग हो जाने पर ये नौकर घरेलू मामलों में सलाह भी दे सकते थे। घर की बेटी की विदाई पर इन्हीं नौकरों की पत्नियाँ घर की बिगड़ैल बेटी को ससुराल में जमाने की भरसक कोशिश करती थीं। मालिक और नौकर का यह रिश्ता निरन्तर मज़बूत होता जाता था। इन रिश्तों के और भी बहुत पहलू हैं, पर मैं तो सिर्फ यह जानती हूँ कि आज भी इनके बिना घर-गृहस्थी के संसार से पार होना बड़ा मुश्किल है। घर में इन लोगों को अपना समझते-समझते कई बार इनके जाने पर मैं उदास रही, पर जितने भी दिन जो भी घर में रहा, मैंने उसे घर का सदस्य ही समझा और उसके जाने पर खूब दुखी भी हुई। आज भी अगाहे-बगाहे कोई मिलने को आ जाता है तो मन में एक आन्तरिक खुशी सर उठा लेती है। मैं उन सब लोगों पर लिखकर शायद हल्का होना चाहती हूँ और शायद एक कज़र् भी उतारना चाहती हूँ।

घरेलू कर्मचारियों में जिसका नम्बर घर में और ज़िन्दगी में पहला है उसका नाम लब्भू था। माँ बताती थीं, जब मैं पैदा हुई तब उसे आये कोई बरस-भर हुआ था। बचपन में उसने मुझे गोद में खिलाया, कन्धे पर बिठाकर सैरें करवायीं और घुटनों पर बिठाकर झूले झुलाये थे। घर में अक़्सर उसका ज़िक़्र होता था। कुछ बरस पहले उसने मुझे देखा तो मेरी माँ से पूछा, ''चाची, क्या यही हमारी पद्दो है ?'' माँ ने कहा, ''क्या पहचान नहीं पा रहा ?'' वह बोला, ''पहचान लिया। इसका नाम तो रामबन के रेडियो पर भी आता है।'' वह मेरी नक़ल लगाता हुआ कहने लगा—

''हुन तुस डोगरी च ख़बराँ सुनो।''
(अब आप डोगरी में खबरें सुनिए)

माँ मुझे कभी-कभी पद्दो भी कहती थी पर यह घटना तभी होती जब माँ को मुझ पर बहुत प्यार आता था, पर इसका मौक़ा मैं उन्हें बहुत कम देती थी। मेरी हरक़तों से अक्सर माँ गुस्सा रहतीं। घर में उनका हाथ बँटाने के लिए मैं कभी कुछ न करती थी। पर बाहर या बाज़ार में कोई भी काम करने को मैं हमेशा तैयार रहती थी। माँ बड़ी कर्मठ औरत थीं। उन्हें सब खुद करना अच्छा लगता था। लब्भू भैया जब भी मिलते कोई न कोई पुरानी बात ज़रूर सुनाते थे। मुझे सुनाते हुए कहते, ''जब पद्दो पैदा हुई तो हमारी दादी ने खूब नाक-भौं सिकोड़ी थी। बेबे का कहना था कि बहू ने आते ही मेरे बेटे पर बेटी लाद दी। उधर मेरे पिताजी बहुत प्रसन्न थे। पिताजी ने बेबे को कहा, ''यह लक्ष्मी है मैं इसे सरस्वती बनाऊँगा। ये विदुषी होगी।

माँ बताती थी—लब्भू भैया को गठिया हो गया था। पिताजी ने लाहौर के किसी अस्पताल में दाख़िल करवाकर अँग्रेज़ डॉक्टरों से लब्भू भैया का इलाज करवाया था। लब्भू भैया पिताजी का यह एहसान कभी न भूले। पिताजी ने बाद में उन्हें एक हलवाई की दुकान पर नौकर रखवा दिया था। उसके बाद उन्होंने रामबन में चिनाब नदी के किनारे दूध-दही की अपनी दुकान खोल ली थी। हमारे यहाँ जब भी आते कलाड़िया (दूध-दही से बना एक तरह का पनीर) ज़रूर लाते। कई और पहाड़ी सौगातें लाना भी न भूलते। माँ को चाची-चाची कहकर अपना पसन्दीदा खाना बनवाते। माँ प्रसन्न होकर लब्भू भैया की फरमाइशें पूरी करतीं। उनके ब्याह के कई चर्चे होते पर ब्याह कभी न हुआ इस बात का दु:ख उन्हें हमेशा रहा।

असल में जो बात बताने से मैं बच रही हूँ वह यह है कि लब्भू भैया रिश्ते में हमारे भाई ही लगते थे। हमारे एक दूर के ताऊ अपनी ज़मीनों पर कई-कई दिन रहते तो वहीं की एक स्त्री से इन्होंने किसी कि़स्म की शादी कर ली थी। उनकी पत्नी—हमारी ताई—उनको घास न डालती थी। इसलिए ताऊ जी भी उनसे बचने के लिए ज़्यादा समय खेती-बाड़ी की देखभाल पर लगाने लगे। फसलें तो अच्छी हुईं ही लब्भू भैया भी दुनिया में आ गये। उस गाँव में सब जानते थे पर ताई को बताने की हिम्मत किसी में न थी। जब ताऊ भगवान को प्यारे हुए तो हमारी ताई ने लब्भू भैया की माँ को उनके अन्तिम दर्शन भी न करने दिये। लब्भू भैया को लेकर वह ज़मीनों पर ही किसी तरह गुज़र कर रही थी। उनकी मृत्यु के समय लब्भू भैया दस-बारह बरस की उम्र में ही जब यतीम हो गये तो मेरे पिताजी उन्हें घर ले आये। अन्त तक हमारे परिवार से लब्भू भैया जुड़े रहे।

बहुत साल पहले माँ ने एक जगह टिप्पस भिड़ायी भी थी। बड़े अच्छे घर की विधवा थी। उसकी एक बेटी भी थी। उस औरत के ससुराल वाले उससे इसलिए नाराज़ थे कि अपने पति की पेंशन उसे मिल गयी थी और वह अकेली रहती थी। शहर में अपनी लड़की को स्कूल में डाला था उसने। लब्भू भैया मेरी माँ से पूछकर उसे 'नल-दमयन्ती' फिल्म दिखाने भी ले गये थे पर बात इससे आगे न बढ़ी। उस औरत ने एक दिन मेरी माँ को आकर कहा, ''मेरी बेटी की सोचिए, कल जब इसकी शादी होगी तो बाप की जगह मैं लब्भू को तो खड़ा नहीं कर सकती, मुझे माफ़ करिए।'' वह अपनी लाड़ली बेटी को लेकर चली गयी और माँ ने उसे माफ़ कर दिया।

लब्भू भैया ने पहाड़ की एक औरत कई बरस तक घर में रखी पर उससे शादी करना न चाहते थे। माँ कहती, ''इस मुए को कहा था इसी पहाड़िन से शादी कर लो पर ब्राह्मण होने का इतना दम्भ मैंने किसी भी ब्राह्मण में नहीं देखा। पता नहीं इसे ब्राह्मणों ने क्या दिया। अपने बाप ने तो नाम तक दिया नहीं। रहा ब्राह्मण का ब्राह्मण ही। ब्राह्मणी ने कभी घर की देहरी न लाँघी। मुआ कुँआरा ही मरकर भूत बनकर इस दुनिया में रहेगा।''

मरने से पहले ही लब्भू भैया ने पड़ोस के एक लड़के नाम अपनी दुकान करवा दी थी। उन्होंने कहा, ''तुम साल-भर मुझे नेति (रोज़ एक वक्त का खाना किसी दरख़्त के नीचे रख देना) देना, मेरा दाह संस्कार करना और साल बाद मेरी बरसी कर देना। उस लड़के ने लब्भू भैया का क्रिया-करम एक पुत्र की तरह से ही किया और मेरा ख़्याल है हर बरस श्राद्ध भी करता ही होगा। लोग ज़िन्दा मनुष्यों से उतना नहीं डरते जितना मरे हुओं से डरते हैं। मेरी माँ कहती—''जीने से ज़्यादा उसे मरने की चिन्ता थी, बस उसी का इन्तज़ाम सारी उम्र करता रहा।!''

पिछले दिनों घर में शादी थी तो भी लब्भू भैया आये थे और उन्होंने बताया था कि मैं तो हाथ में गठरी लिये रहता हूँ अब जब भी उसका बुलौआ आ जाय। चिनाब दरिया की लहरों को देखता रहता हूँ। दुकान का काम भी चलता ही रहता है। यह पहला घरेलू कर्मचारी था जिसके बारे में मैंने जाना। उनकी इज़्ज़त करना माँ ने ही सिखाया था।
आज न माँ हैं, न भैया। पर उनका वह सम्बन्ध आज भी क़ायम है।

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