ललित सुरजन की कलम से भागमभाग के बीच कुछ बातें
'मैं अंबिकापुर कुछ साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भागीदारी करने गया था।;
'मैं अंबिकापुर कुछ साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भागीदारी करने गया था। आते-जाते खैरागढ़ के साहित्यिक मित्र डॉ. गोरेलाल चंदेल और भिलाई के साथी रवि श्रीवास्तव भी साथ थे। रात को जब रायपुर से ट्रेन चली तो सोने का समय होने आया था।
लौटते वक्त एक रोचक वाकया हुआ। सुबह बिलासपुर के आसपास नींद खुल गई तो हम लोग आपस में दुनिया भर की बातें करने में मशगूल हो गए। समय ऐसा था कि किसी सहयात्री को हमारी बातचीत से तकलीफ नहीं होना चाहिए थी, लेकिन तभी ऊपर की बर्थ से एक उनींदे युवा सहयात्री ने हस्तक्षेप किया- अंकल, सोने दीजिए। रायपुर पहुंच कर दिन भर बहुत काम करना है।
रायपुर आने के कुछ पहले वह युवक अपनी बर्थ से नीचे उतरा। मैंने कहा कि हमारे कारण तुमको तकलीफ हुई। कहां रहते हो, क्या करते हो? मालूम पड़ा कि वह और उसके साथी चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं। अंबिकापुर से ऑडिट करके लौट रहे हैं। इस बीच रायपुर में टेबल पर फाइलों का अंबार लग गया होगा।'
'रायपुर के युवा सीए अमित अग्रवाल के इस उत्तर से समझ आया कि आज की नई पीढ़ी को कितना संघर्ष और परिश्रम करना पड़ रहा है। पहले की अपेक्षा कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा है और अगर सफलता हासिल करना है तो उसके लिए लगातार दौड़ते रहना एक विवशता बन गई है।'
(देशबन्धु में 14 जुलाई 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/07/blog-post_16.html