ललित सुरजन की कलम से मेघना और सोनू
'यह सच है कि माता-पिता अमीर हो या गरीब, बच्चों को अच्छे से अच्छा वातावरण देने की कोशिश करते हैं।;
'यह सच है कि माता-पिता अमीर हो या गरीब, बच्चों को अच्छे से अच्छा वातावरण देने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक तबके को शायद यह पता ही नहीं है कि अच्छे वातावरण की परिभाषा क्या है; तो दूसरे के पास उस अच्छे वातावरण तक पहुंचने के लिए आवश्यक साधनों का ही अभाव है।
आज जो परिवार सक्षम है वे अपने बच्चों को उन शालाओं में भेज रहे हैं जहां छात्रावास में एसी लगे हैं, पहली कक्षा से ही क्लासरूम में एसी हैं, हजारों रुपयों में सालाना फीस है और बच्चों के विकास के नाम पर बेहूदे कार्यक्रम।
इन स्कूलों पर बाजार का बहुत सीधा-सीधा कब्जा हो गया है जहां बच्चों को अखबार, टूथपेस्ट, साबुन जैसी वस्तुएं भी क्लासटीचर के माध्यम से शाला प्रबंधक के निर्देश पर खरीदनी पड़ती है। इन स्कूलों के व्यापारी मालिक अपना जन्मदिन मनाते हैं और उसके लिए भी बच्चों से पैसा वसूल किया जाता है। यह सब हमारे सम्पन्न अभिभावक खुशी-खुशी कबूल कर लेते हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों को गरीबों से अलग रखना चाहते हैं। भारतीय समाज की दारुण सच्चाइयों से दूर रखना चाहते हैं।'
प्रकाशन वर्ष 2008
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