धारा-497 हटाई गई तो कमजोर होगा वैवाहिक बंधन : सरकार

। केंद्र सरकार ने व्यभिचार (अडेल्ट्री) में दंड के प्रावधान को सही बताया है। सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि व्यभिचार (आईपीसी की धारा-497) को कमजोर या फीका करना विवाह जैसी संस्था को खत्म करना होगा

Update: 2018-07-12 02:37 GMT

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने व्यभिचार (अडेल्ट्री) में दंड के प्रावधान को सही बताया है। सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि व्यभिचार (आईपीसी की धारा-497) को कमजोर या फीका करना विवाह जैसी संस्था को खत्म करना होगा। साथ ही ऐसा करना भारतीय मूल्यों के विपरीत होगा। सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने धारा-497 (व्यभिचार) के लिए दंड के प्रावधान को सही बताते हुए कहा है कि इस प्रावधान को कमजोर या फीका करने से वैवाहिक बंधन की पवित्रता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। ऐसा करने से वैवाहिक संबंधों में शिथिलता आ जाएगी।  

महिलाओं को जिम्मेदार ठहराना भारतीय मूल्यों के खिलाफ 

सरकार ने हलफनामे में कहा है, भारतीय दंड संहिता की धारा-497 और सीआरपीसी की धारा-198(2) को खत्म करना भारतीय चरित्र व मूल्यों के लिए हानिकारक होगा। भारतीय मूल्यों में विवाह जैसी संस्था की पवित्रता सर्वोपरि है। केंद्र सरकार ने अपना जवाब केरल निवासी जोसफ शिन द्वारा दायर उस जनहित याचिका पर दिया है जिसमें याचिका में धारा-497 को निरस्त करने की गुहार की गई है। याचिका में इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण और लिंग विभेद वाला बताया गया है। 

पुरुषों को ही अपराधिक मुकदमा झेलना पड़ता है

याचिका में कहा गया है कि धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन यह अपराध पुरुषों तक ही सीमित है अगर उसका किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध हो। इस मामले में पत्नी को न व्यभिचारी माना जाता है और न ही कानूनन उसे उकासने वाला ही माना जाता है। वहीं पुरुषों को इस अपराध के लिए पांच वर्ष तक की सजा हो सकती है। धारा-497 हर परिस्थितियों में महिलाओं को पीड़िता मानता है, वहीं मर्दों को अपराधिक मुकदमा झेलना पड़ता है।  

धारा-497 को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए

 सरकार ने यह भी कहा कि मालीमथ समिति ने सिफारिश की थी कि धारा-497 को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए। यह मसला फिलहाल संविधान पीठ के पास लंबित है। संविधान पीठ ने 150 वर्ष पुराने कानून की वैधता का परीक्षण करेगी। 

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