मजदूरों की दशा सुधारने योजनाएं तो अनेक पर लाभ कैसे मिले
दुनिया में नये-नये अविष्कार से तकनीक में वृद्धि तो हुई है, जिससे कम समय में उत्पादन का प्रतिशत बढ़ा है
बिचौलियों व ठेकेदारों के चंगुल से मुक्ति दिलानेे श्रम विभाग के पास संसाधन नहीं
जांजगीर। दुनिया में नये-नये अविष्कार से तकनीक में वृद्धि तो हुई है, जिससे कम समय में उत्पादन का प्रतिशत बढ़ा है। मगर समाज के अंतिम पंक्ति का मजदूर आज भी अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने में असफल रहा है। शासन द्वारा मजदूरों के हित में कई योजनाएं संचालित की जा रही है। मगर यहां भी कमीशन खोरी व भाई-भतीजा वाद के चलते मजदूरों को वास्तविक लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।
इनके बदले ऐसे लोग योजनाओं में शामिल कर लिए जा रहे है, जो इसके पात्र भी नहीं। यही वजह है कि जिले से बड़ी संख्या में मजदूर पलायन कर अन्य राज्यों में रोजी-रोटी की तलाश में भटकते तथा ठेकेदारों के शोषण का शिकार होते आ रहे है। आज 1 मई मजदूर दिवस का अवसर मजदूरों, श्रमिकों व विभिन्न व्यवसाय से जुड़े कारीगरों का दिन है, उनके अधिकार, स्वाभिमान, कर्तव्य को जानने व समझने का यह दिन मजदूरों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिवस है।
मजदूर दिवस की चर्चा होते ही हमारे सामने अनेक ऐसे दीन हीन चेहरे अनायास ही उभरकर सामने आ जाते है जिनमें उम्र दराज हो चुके रिक्शा खीचते वृद्ध, हाथ में गैती, फावड़ा लिए युवक, रेल्वे स्टेशनों में भारी भरकम बोझ उठाते कुली होते है इन्हे देखकर यह प्रतीत होने लगता है कि प्रत्येक साल 1 मई को मनाया जाने वाला मजदूर दिवस वास्तव में एक आयोजन मात्र ही है जिससे इनके जीवन में थोड़ा भी परिवर्तन नहीं हो पाता।
जिले के संदर्भ में देखा जाये तो यहां के भारी तादात में गांव-गांव के मजदूर परिवार कमाने-खाने बाहरी प्रदेशों में होते है जिनके बाल-बच्चे बिना स्कूल पहुंचे ही बड़े हो जाते है और फिर एक मजदूर पीढ़ी तैयार हो जाती है जो केवल पसीना बहाना जानती है जिन्हे अपने अधिकार व कर्तव्य के प्रति जरा सा भी संज्ञान नहीं होता है।
बंधक बन रहे है जिले के मजदूर
जिले से प्रतिवर्ष हजारो की संख्या में लोग अन्य प्रांत रोजी मजदूरी के लिए पलायन कर जाते है। इनमें से अधिकांश तो परम्परा गत् रूप से बाहर जाने के आदी हो चुके है वही कुछ मजबूरियों के चलते एैसा करते है। इन्ही मजबुरियों दलाल पनप रहे है जो अन्य प्रांत के भठ्ठा मालिकों से मोटी रकम एडवांस के रूप में ले लेते है और मजदूरो को कम पैसा देकर भेजते है।
ऐसे में भठ्ठा संचालक अपनी पूरी रकम इन मजदूरो के पगार से वसूलते है और शुरू होता है बंधक बनाने का खेल। प्रतिवर्ष ऐसे दर्जनों प्रकरण जिला प्रशासन के समक्ष आता रहा है। जिससे एक तरफ जिले के बदनामी होती है। वही दूसरी ओर मजदूरो की विश्वसनीयता भी घटने लगी है।