'काउंटिंग में केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति नियमों के खिलाफ नहीं', TMC को सुप्रीम कोर्ट से झटका

पश्चिम बंगाल में 4 मई को होने वाली मतगणना के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान टीएमसी ने हर टेबल पर केंद्र सरकार या पीएसयू कर्मचारियों की अनिवार्य तैनाती को चुनौती दी थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी तरह के नए आदेश देने से इनकार कर दिया।;

Update: 2026-05-02 05:50 GMT

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से सियासी लड़ाई लड़ रही थी। दो चरणों में वोटिंग खत्म होने के बाद अब टीएमसी की लड़ाई चुनाव आयोग से शुरू हो चुकी है। ममता की पार्टी ने वोटों की गिनती के लिए सुपरवाइजर और सहायक के तौर पर केंद्र सरकार और PSU कर्मचारियों की तैनाती को लेकर ऐतराज जताया है। इसके लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ रही है।

कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।इस याचिका पर सुनवाई के लिए जस्टिस पामिदिघंतम नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की एक विशेष पीठ का गठन किया गया है।

फर्क नहीं पड़ता कि अधिकारी केंद्र का है- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि मतगणना के दौरान वहां हर राजनीतिक दल के चुनाव एजेंट मौजूद रहेंगे। इसलिए, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि पर्यवेक्षक केंद्र सरकार का नामित अधिकारी है या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों की तैनाती पूरी तरह से चुनाव आयोग की अपनी संतुष्टि पर निर्भर करती है, क्योंकि वहां सभी पार्टियों के एजेंट मौजूद होंगे।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला वोटों की गिनती करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़ा हुआ है। चुनाव आयोग ने निर्देश दिया था कि बंगाल में वोटों की गिनती के लिए केंद्रीय कर्मचारियों को मतगणना पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) बनाया जाएगा। टीएमसी इस फैसले का विरोध कर रही है। उनका मानना है कि इस प्रक्रिया में राज्य सरकार के कर्मचारियों को भी बराबर शामिल किया जाना चाहिए। इसी आदेश को चुनौती देने के लिए टीएमसी ने अर्जी दी थी, जिस पर जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई की।

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने नियमों को लेकर क्या स्पष्ट किया?

  • मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने नियमों को लेकर स्थिति साफ की।
  • उन्होंने कहा कि नियमों में यह विकल्प पूरी तरह से खुला है कि काउंटिंग सुपरवाइजर और काउंटिंग असिस्टेंट केंद्र सरकार के भी हो सकते हैं और राज्य सरकार के भी।
  • कोर्ट ने कहा कि जब यह विकल्प खुला हुआ है, तो हम यह बिल्कुल नहीं कह सकते कि चुनाव आयोग का यह नोटिफिकेशन नियमों के खिलाफ है।
  • जस्टिस बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार है कि वह कह सकता है कि दोनों अधिकारी केंद्र सरकार के ही होंगे।

कपिल सिब्बल ने कोर्ट में क्या दलील दी?

  • टीएमसी की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के सर्कुलर (परिपत्र) पर सवाल उठाए।
  • सिब्बल ने कोर्ट में दलील दी कि चुनाव आयोग के सर्कुलर में खुद ऐसा स्पष्ट तौर पर नहीं कहा गया है कि केवल केंद्रीय कर्मचारी ही होंगे।
  • टीएमसी का तर्क है कि चुनाव आयोग का यह कदम जानबूझकर राज्य सरकार के कर्मचारियों को गिनती से दूर रखने के लिए उठाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी की दलीलों पर क्या जवाब दिया?

वकील सिब्बल की दलीलों पर जस्टिस बागची ने तुरंत अपना पक्ष रखा। उन्होंने ने कहा कि अगर चुनाव आयोग ने ऐसा कहा भी होता, तब भी हम उन्हें इस बात के लिए गलत नहीं ठहरा सकते थे। इसका मुख्य कारण यह है कि नियम साफ तौर पर कहते हैं कि मगणना के लिए केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधिकारियों को नियुक्त किया जा सकता है।  

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