बंगाल में बढ़ता घमासान
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। लगातार ऐसे प्रकरण घटित हो रहे हैं जिनकी वजह से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। लगातार ऐसे प्रकरण घटित हो रहे हैं जिनकी वजह से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। दूसरी तरफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सक्रिय होना बता रहा है कि भाजपा यहां चुनाव जीतने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ अपना रही है। चुनाव आयोग और ईडी दोनों संवैधानिक संस्थाएं हैं और दोनों की साख तभी कायम रहेगी, जब बिना राजनैतिक दबाव के ये कार्य करती दिखाई दें। लेकिन प. बंगाल में ऐसा नहीं हो रहा है।
पिछले हफ्ते ममता बनर्जी की टीएमसी के लिए चुनावी रणनीति बनाने वाली एजेंसी आईपैक के दफ्तर और उसके सहसंस्थापक प्रतीक जैन के घर ईडी ने अचानक दबिश दी। यह छापेमारी कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस के सिलसिले में दी गई थी और इसका कोई राजनैतिक मकसद नहीं था, ऐसा तर्क ईडी की तरफ से आया। जबकि टीएमसी का सीधा आरोप है कि यह राजनैतिक बदले की कार्रवाई थी और ईडी के जरिए अमित शाह टीएमसी की रणनीति चुराना चाहते हैं। ममता बनर्जी ने जिस तरीके से इस छापेमारी का विरोध किया, इसके खिलाफ रैली निकाली इसकी उम्मीद भाजपा को नहीं रही होगी। ईडी ने पहले कलकत्ता हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में टीएमसी के खिलाफ याचिका दी है कि उसने काम में बाधा डाली और ममता बनर्जी मौके पर आकर एक फाइल लेकर चली गईं। इधर टीएमसी ने भी हाईकोर्ट में याचिका दी थी। पिछले हफ्ते इस पर सुनवाई शुरु हुई, लेकिन भीड़ और हंगामे के कारण चल नहीं पाई। फिर बुधवार को फिर से सुनवाई हुई तो इसमें ईडी और भाजपा को बड़ा झटका लगा है।
सुनवाई के दौरान ईडी की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू बार-बार यही अपील करते रहे कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दाखिल है, इसलिए उस पर फैसला आने के बाद ही सुनवाई हो। राजू ने इस बात पर भी आपत्ति जाहिर की कि आई पैक की तरफ से अदालत में कोई मौजूद नहीं था। ईडी ने टीएमसी के आरोप खारिज करते हुए यह भी कहा कि उसने कोई दस्तावेज जब्त नहीं किए। सब कुछ ममता बनर्जी और उनके सहयोगी लेकर चले गए। इस पर टीएमसी की तरफ से पेश वकील मेनका गुरुस्वामी ने साफ कहा कि ईडी के इस बयान को दर्ज कर लिया जाए कि छापेमारी के दौरान कुछ भी जब्त नहीं किया गया। यानी भविष्य में अब ईडी किसी दस्तावेज को छापेमारी में बरामद सबूत के तौर पर पेश करना चाहे तो भी यह संभव नहीं होगा। क्योंकि ईडी ने खुद माना है कि उसने कुछ बरामद नहीं किया है। अदालत में टीएमसी ने आरोप लगाया कि ईडी राजनीतिक पार्टी के साथ मिलकर झूठे इल्जाम गढ़ रही है। फिलहाल ईडी की बार-बार अपील के बाद और टीएमसी की तरफ से दी गई दलीलों के बाद याचिका खारिज कर दी गई हैं, अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर क्या फैसला आता है, ये देखना होगा। हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर ईडी चाहे तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फिर आ सकती है। यानी जिस उम्मीद से ईडी की छापेमारी आईपैक पर करवाई गई थी और उसके बाद अदालत में भी टीएमसी को घेरने की कोशिश हुई थी, उसमें फिलहाल भाजपा को नाकामी हासिल हुई है।
ममता बनर्जी अपने विरोधी को घेरने के लिए सड़क पर उतरना और लोगों को अपने साथ करने की राजनीति खूब जानती हैं। ईडी की छापेमारी प्रकरण ने ममता बनर्जी का ये कौशल भाजपा को याद दिला दिया है। अब सुप्रीम कोर्ट से अगर टीएमसी के खिलाफ फैसला आएगा, तो भी ममता बनर्जी उसे सहानुभूति के लिए इस्तेमाल कर लेंगी और अगर पक्ष में फैसला आता है, तब तो भाजपा की बड़ी हार तय है। यानी इस समय ममता बनर्जी के लिए चित भी मेरी और पट भी मेरी वाली स्थिति बन चुकी है।
इधर एसआईआर पर भी ऐसे-ऐसे खुलासे हो रहे हैं, जिनसे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। अर्मत्य सेन के बाद जादवपुर विवि के कुलपति को चुनाव आयोग ने पेश होने का नोटिस दिया है। वहीं मंगलवार को बांकुड़ा जिले के खतड़ा में टीएमसी कार्यकर्ताओं ने एक वाहन जब्त किया, जिसमें एसआईआर के करीब 3,000 फॉर्म-7 भरे हुए थे। पुलिस ने वाहन को अपने कब्जे में ले लिया। घटना में दो भाजपा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। गौरतलब है कि फार्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी का नाम शामिल किए जाने का विरोध करने या किसी मृत या स्थानांतरित व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटवाने के लिए किया जाता है। ममता बनर्जी ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में फार्म-7 ले जाने का उद्देश्य वैध मतदाताओं के नाम हटाना था। वहीं भाजपा ने सफाई में कहा कि हमारे बीएलए (बूथ स्तरीय एजेंट) जो बीएलओ (बूथ स्तरीय अधिकारी) को फॉर्म-7 जमा नहीं करा पाए थे, वे उन्हें ईआरओ (चुनाव पंजीकरण अधिकारी) कार्यालय में जमा कराने जा रहे थे। तृणमूल कार्यकर्ताओं ने हमारे कार्यकर्ताओं पर हमला किया। उनकी पिटाई की और फार्म छीन लिए। चुनाव आयोग ने भी कहा है कि फॉर्म उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है। कोई भी मतदाता फॉर्म-7 जमा कर सकता है। फार्म-7 जमा करने मात्र से नाम मतदाता सूची से बाहर नहीं हो जाता। फार्म में दी गई जानकारी के आधार पर दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही नाम मतदाता सूची से बाहर किया जाता है।
इन तर्कों पर हंसी आती है। क्या चुनाव आयोग बता सकता है कि प. बंगाल के कितने ग्रामीण मतदाता ऐसे हैं, जो वेबसाइट पर जाकर नाम हटाने की कार्रवाई कर सकते हैं। और अगर उसका तर्क यही है तो फिर भाजपा के लोगों को इतनी बड़ी संख्या में वही फार्म क्यों ले जाने पड़े, जिनसे नाम काटे जाते हैं। जाहिर है कोई खेल हो रहा है, जो पहले ही पकड़ा गया। इस बीच रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक खबर है, जिसके मुताबिक पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के लिखित दिशानिर्देशों को अनौपचारिक व्हाट्सएप संदेशों के जरिए हटाया जा रहा है। इसमें समय सीमा को आगे बढ़ाना, सत्यापन की समय सीमा को कम करना और कानूनी अवधि समाप्त होने से पहले ही मतदाताओं को अनुपस्थित घोषित करने जैसे संदेश हैं। ममता बनर्जी ने इस पर भी चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।