DU के 12 कॉलेजों में 600 सहायक प्राध्यापकों की भर्ती का रास्ता साफ, मार्च से शुरू हो सकती है प्रक्रिया

ये 12 कॉलेज दिल्ली सरकार द्वारा वित्तपोषित हैं। बीते कुछ वर्षों में शासन और विश्वविद्यालय के बीच समन्वय की कमी के कारण भर्ती प्रक्रिया ठप पड़ गई थी। पहले कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी की अनुमति से नियुक्तियां हो जाती थीं, लेकिन बाद में दिल्ली सरकार की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई।

Update: 2026-02-11 05:22 GMT
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) से संबद्ध 12 कॉलेजों में लंबे समय से अटकी सहायक प्राध्यापकों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि इन कॉलेजों में लगभग 600 सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति की जाएगी। संभावना है कि मार्च माह से भर्ती प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो जाएगी। इस निर्णय से शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे कॉलेजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। डीयू प्रशासन के अनुसार भर्ती से जुड़ी सभी आवश्यक तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं और वित्तीय अड़चनों को भी सुलझा लिया गया है। लंबे समय से रिक्त पदों के कारण प्रभावित हो रही शैक्षणिक व्यवस्था अब पटरी पर लौट सकती है।

वित्तीय बाधाएं दूर, अनुदान जारी

डीयू के डीन ऑफ कॉलेजेज ने बताया कि दिल्ली सरकार की ओर से संबंधित कॉलेजों को वेतन और अन्य मदों के लिए अनुदान जारी किया जा रहा है। यही वित्तीय स्वीकृति पहले भर्ती प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई थी। उन्होंने कहा कि जैसे ही वित्तीय मंजूरी स्पष्ट हुई, विश्वविद्यालय ने नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी तेज कर दी। अब विज्ञापन जारी करने और चयन समितियों के गठन की दिशा में काम शुरू किया जा रहा है। विश्वविद्यालय अधिकारियों का मानना है कि यदि तय समयसीमा के अनुसार प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो आने वाले शैक्षणिक सत्र से पहले बड़ी संख्या में पद भर लिए जाएंगे।

समन्वय की कमी से ठप थी प्रक्रिया

दरअसल, ये 12 कॉलेज दिल्ली सरकार द्वारा वित्तपोषित हैं। बीते कुछ वर्षों में शासन और विश्वविद्यालय के बीच समन्वय की कमी के कारण भर्ती प्रक्रिया ठप पड़ गई थी। पहले कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी की अनुमति से नियुक्तियां हो जाती थीं, लेकिन बाद में दिल्ली सरकार की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई। इस नई व्यवस्था के चलते कई प्रस्ताव लंबित रह गए और भर्ती प्रक्रिया बार-बार टलती रही। परिणामस्वरूप, जब विश्वविद्यालय स्तर पर लगभग पांच हजार से अधिक पदों पर भर्ती की गई, तब भी इन 12 कॉलेजों में रिक्तियां नहीं भरी जा सकीं। इससे असमानता की स्थिति बनी रही और संबंधित कॉलेजों में शिक्षकों की कमी गंभीर रूप लेती गई।

तदर्थ शिक्षकों के सहारे चल रही थी पढ़ाई

रिक्त पदों के चलते इन कॉलेजों में लंबे समय से तदर्थ (एड-हॉक) और अतिथि शिक्षकों के सहारे शिक्षण कार्य चलाया जा रहा था। हालांकि इन शिक्षकों ने परिस्थितियों के बावजूद शैक्षणिक गतिविधियों को बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन स्थायित्व की कमी ने कई समस्याएं खड़ी कीं। तदर्थ शिक्षकों में नौकरी की असुरक्षा बनी रही, जबकि छात्रों को भी बार-बार शिक्षकों के बदलने से शैक्षणिक निरंतरता में बाधा का सामना करना पड़ा। शोध कार्य, विभागीय गतिविधियां और दीर्घकालिक अकादमिक योजनाएं भी प्रभावित हुईं। कई शिक्षक संगठनों ने समय-समय पर स्थायी नियुक्तियों की मांग उठाई थी और इसे छात्रों के हित से जुड़ा मुद्दा बताया था।


गवर्निंग बॉडी के गठन की प्रक्रिया भी तेज

डीयू अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी के गठन की प्रक्रिया भी जल्द पूरी की जाएगी। गवर्निंग बॉडी में विश्वविद्यालय और दिल्ली सरकार के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। प्रशासन का मानना है कि यदि गवर्निंग बॉडी का गठन समय पर और पारदर्शी तरीके से होता है तो भविष्य में भर्ती से जुड़ी अड़चनें कम होंगी। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक सुचारु हो सकेगी और समन्वय की कमी जैसी समस्याएं दोबारा सामने नहीं आएंगी।

ये हैं वह 12 कालेज


आचार्य नरेंद्रदेव कालेज, अदिति महाविद्यालय, बीआर कालेज, भाष्कराचार्य कालेज, भगिनी निवेदिता कालेज, डीडीयू कालेज, इंदिरा गांधी कालेज, केशव महाविद्यालय, महाराजा अग्रसेन कालेज, महर्षि वाल्मीकि कालेज, राजगुरु कालेज और सुखदेव कालेज हैं।


छात्रों और शिक्षकों को बड़ी राहत

लगभग 600 सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति से न केवल शिक्षकों की कमी दूर होगी, बल्कि शैक्षणिक गुणवत्ता में भी सुधार की उम्मीद है। स्थायी शिक्षकों के आने से विभागों में दीर्घकालिक अकादमिक योजनाएं लागू की जा सकेंगी, शोध गतिविधियां बढ़ेंगी और छात्रों को निरंतर मार्गदर्शन मिल सकेगा। छात्र संगठनों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि लंबे समय से कक्षाएं नियमित रूप से संचालित करने और पाठ्यक्रम समय पर पूरा करने में दिक्कतें आ रही थीं। स्थायी नियुक्तियों से यह समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है।

पारदर्शिता और समयबद्धता पर नजर

हालांकि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने की संभावना जताई गई है, लेकिन शिक्षकों और अभ्यर्थियों की नजर इस बात पर भी रहेगी कि प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और समयबद्ध रहती है। पिछले अनुभवों को देखते हुए कई उम्मीदवार सतर्क हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का दावा है कि इस बार चयन प्रक्रिया को निर्धारित मानकों और यूजीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार संचालित किया जाएगा। चयन समितियों में विषय विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा और सभी औपचारिकताओं का पालन किया जाएगा।

उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए अहम कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि राजधानी के प्रमुख विश्वविद्यालय में लंबे समय से रिक्त पदों का भरा जाना उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति से अकादमिक वातावरण मजबूत होगा और विश्वविद्यालय की रैंकिंग व शोध उत्पादकता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। दिल्ली विश्वविद्यालय देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है। ऐसे में उससे जुड़े कॉलेजों में शैक्षणिक संसाधनों की कमी का असर व्यापक स्तर पर महसूस किया जाता है।

राहत की खबर

अब सबकी निगाहें मार्च में प्रस्तावित भर्ती प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि प्रक्रिया तय समय पर शुरू होकर पारदर्शी ढंग से पूरी होती है, तो यह न केवल इन 12 कॉलेजों बल्कि पूरे विश्वविद्यालय तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। लंबे इंतजार के बाद सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति का रास्ता साफ होना शिक्षकों, छात्रों और प्रशासन—तीनों के लिए राहत की खबर है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विश्वविद्यालय इस अवसर को किस तरह प्रभावी शैक्षणिक सुधार में बदलता है।

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