पीएमसीएस में सामने आया बड़ा घोटाला, एजी कार्यालय ने गड़बड़ी पकड़ी तो डिलीट कर दिया सारा डाटा
बिहार के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान पटना मेडिकल कालेज एवं अस्पताल में बड़ा घोटाला सामने आया है
पटना। बिहार के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान पटना मेडिकल कालेज एवं अस्पताल में बड़ा घोटाला सामने आया है। यहां मरीजों का रजिस्ट्रेशन करने वाली एजेंंसी ने बड़ा गोलमाल किया है। आडिट से पता चला है कि यहां आधे मरीजों के रजिस्ट्रेशन का पैसा हजम कर लिया जा रहा था। यह खेल काफी पहले से चलने की उम्मीद जताई जा रही है।
ओपीडी-इमरजेंसी में आने वाले रोगियों की संख्या में 50 प्रतिशत की कमी कर पीएमसीएच (पटना मेडिकल कालेज सह अस्पताल) में पंजीयन करने वाली आउटसोर्स एजेंसी ने करोड़ों रुपये का खेला किया है। सिर्फ जनवरी 2022 में ओपीडी-इमरजेंसी में पंजीयन कराने वाले 33 हजार 231 रोगियों की जगह पीएमसीएच अधीक्षक कार्यालय को सिर्फ 18 हजार 510 का आंकड़ा देकर प्रति मरीज पांच रुपये के हिसाब से राशि जमा की गई। इस प्रकार सिर्फ जनवरी माह में पीएमसीएच को 73 हजार 605 रुपये की चपत लगाई गई।
हालांकि, मामला खुलने के बाद एजेंसी ने आडिट टीम को अपने सर्वर से मरीजा का डाटा नहीं उपलब्ध कराया, जिससे कुल कितनी राशि की पीएमसीएच को चपत लगी, इसका आकलन नहीं हो सका। अस्पताल प्रबंधन को निजी एजेंसी से कई साल के आंकड़ों में गड़बड़ी की उम्मीद है।
महालेखाकर कार्यालय की टीम ने 29 अगस्त 2022 को जारी आडिट रिपोर्ट में गड़बड़ी का पूरा ब्योरा देने के बाद पीएमसीएच प्रबंधन से एजेंसी के पूरे कार्यकाल की जांच कर कम जमा राशि की वसूली और कार्रवाई कर अवगत कराने को कहा गया है।
हालांकि, तीन माह गुजरने के बाद भी न तो एजेंसी से अधिक राशि की वसूली की गई और न ही कोई कार्रवाई। ओपीडी-इमरजेंसी में विभागवार बनने वाले रजिस्टर और आधिकारिक आंकड़ों का मिलान करें तो अब भी रोगियों की संख्या कम दिखा पंजीयन राशि हड़पने का खेल जारी है। वहीं, पीएमसीएच के उपाधीक्षक डा. एके झा ने इस मामले की जानकारी नहीं होने की बात कही।
बताते चलें कि आठ वर्ष पूर्व यहां की ओपीडी में 3400 मरीजों का रिकार्ड बना था। हर सोमवार को औसतन ढाई हजार से अधिक मरीज आते थे लेकिन नई एजेंसी के बाद से अबतक किसी भी दिन मरीजों की संख्या ढाई हजार नहीं पहुंची है।
पीएमसीएच ओपीडी-इमरजेंसी मरीजों से पंजीयन शुल्क पांच रुपये लिए जाते हैं। जून 2020 से आदित्य-आर्नव एसोसिएट्स नामक आउटसोर्सिंग एजेंसी यह काम कर रही है। एजेंसी को प्रतिदिन रोगियों की संख्या के अनुसार पांच रुपये की दर से पंजीयन राशि अधीक्षक कार्यालय में जमा करनी होती है और बिल जमा करने के सात दिन के अंदर 1.95 पैसे की दर से उसे सेवा शुल्क का भुगतान किया जाता है।
13 जून 2022 को आडिट टीम ने विलंब से शुल्क जमा करने के साक्ष्य पाने के बाद अधीक्षक कार्यालय में जमा आधिकारिक रिपोर्ट के अलावा एजेंसी के कम्यूटर के आंकड़ों का मिलान किया। इसमें पाया गया कि जनवरी 2022 में आधिकारिक रूप से 18 हजार 510 रोगियों के पंजीयन की रिपोर्ट दी गई थी जबकि एजेंसी के सर्वर के डेटा अनुसार 33 हजार 231 का पंजीयन हुआ था।
14 हजार 721 मरीजों का अंतर देख आडिट ने अन्य माह के आंकड़ों का मिलान करने की कोशिश की पर एजेंसी कर्मियों ने गड़बड़ी पकड़े जाने की जानकारी होने के बाद पहले सुपरवाइजर की अनुमति लाने को कहा। विभिन्न विभागों के कम्यूटर में जाकर डाटा प्राप्त करने का प्रयास किया गया लेकिन तब तक उसे सर्वर से उड़ा दिया गया था।
सुपरवाइजर ने बताया कि बैकअप लेकर डाटा डिलीट कर दिया गया है और बैकअप मांगने पर एक्सेल फार्मेट में दिया गया, जिसमें छेड़छाड़ से इंकार नहीं किया जा सकता। आडिट टीम ने रिपोर्ट में लिखा है कि गड़बड़ी सामने आने पर डाटा साफ्टवेयर से उड़ाया गया है। एक माह में 73 हजार 605 रुपये के हिसाब से पूरे कार्यकाल में करोड़ों की अनियमितता सामने आ सकती है।
आडिट टीम ने एजेंसी को टेंडर देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार हास्पिटल के रिकार्ड-पंजीयन करने वाली कंप्यूटर एजेंसी को सरकारी-निजी अस्पताल में तीन वर्ष अनुभव होना चाहिए था।
पूर्व में कंप्यूटर समेत अन्य आउटसोर्सिंग एजेंसी के लिए निकले टेंडर में यह शर्त थी लेकिन आदित्य एंड आर्नव एसोसिएट्स के मामले में इसे एक वर्ष कर दिया गया क्योंकि तीन वर्ष होने पर उसका चयन ही नहीं हो पाता। ऐसे में इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि निविदादाता को लाभ पहुंचाने के लिए शर्तों में परिवर्तन किया गया है।