वेनेजुएला : ट्रंप का असली चेहरा सामने आया
शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल करने की तमन्ना लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' चलाकर वेनेजुएला पर शनिवार स्थानीय समय के अनुसार 02:01 बजे हमला करके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस समेत गिरफ्तार कर लिया
शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल करने की तमन्ना लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' चलाकर वेनेजुएला पर शनिवार स्थानीय समय के अनुसार 02:01 बजे हमला करके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस समेत गिरफ्तार कर लिया और उन्हें हवाई मार्ग से अमेरिका ले आया गया। अमेरिकी विमान से मादुरो को जब उतारा जा रहा था तो उनकी आंखों पर पट्टी बंधी थी और हथकड़ियां भी लगी थीं। यह दृश्य देखकर इतिहास खुद को दोहराता है, वाली मिसाल याद आ गई। लेकिन यह नहीं पता था कि इतिहास इतनी जल्दी दोहराया जाएगा। अभी 21वीं सदी शुरु ही हुई थी कि इराक पर अमेरिका ने विनाशकारी हथियारों की तलाश के नाम पर आक्रमण किया और तत्कालीन शासक सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार कर फांसी पर भी चढ़ा दिया। फिर पता चला कि ऐसे कोई हथियार इराक में थे ही नहीं। शायद अमेरिका को हथियारों की तलाश थी भी नहीं, उसे इराक के प्राकृतिक संसाधनों का कब्जा चाहिए था, जो उसे मिल गया। यही खेल अब वेनेजुएला में खेला गया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने निकोलस मादुरो पर गलत तरीके से सत्ता हथियाने का आरोप लगाने के साथ ड्रग्स तस्करी के गंभीर आरोप भी लगाए हैं और उनका कहना है कि अब मादुरो को पत्नी समेत अमेरिका की कड़ी न्याय व्यवस्था का सामना करना पड़ेगा। मानो सारी दुनिया का ठेका अमेरिका को मिल चुका है कि उसका राष्ट्रपति जब चाहे किसी संप्रभु देश पर आक्रमण कर दे और वहां के नेता को अमेरिकी कटघरे में खड़ा कर दे। और अंतरराष्ट्रीय कानूनों, स्त्री अधिकार को ठेंगा दिखाते हुए राष्ट्र प्रमुख के साथ उनकी पत्नी को भी गिरफ्तार कर ले। चिंता की बात यह है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जिन उद्देश्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था को बनाया गया था, वह पूरी तरह नख-दंत विहीन और लाचार बन चुकी है। घर के अशक्त बूढ़े बुर्जुग उपद्रवी बच्चों को मत लड़ो-मत लड़ो जैसी लाचारगी भरी नसीहत देते हैं, वैसा ही हाल संरा का हो चुका है। पूरी दुनिया में अमेरिका समर्थित हमले हो रहे हैं और संरा बयान जारी करने से आगे बढ़ ही नहीं पा रहा है। इससे बेहतर है कि संरा को मिटा कर नए सिरे से कोई ऐसी वैश्विक संस्था बनाई जाए, जो वाकई दुनिया में शांति स्थापना का काम कर सके। लेकिन इसकी पहल कौन करेगा ये भी विचारणीय है।
एक वक्त था जब भारत में प.जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता थे, जिन्होंने गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत दिया तो तीसरी दुनिया के देशों को अपने अस्तित्व और सम्मान को बचाए रखने के लिए नया मंच मिला। आज के भारत का हाल तो ऐसा है कि ट्रंप पचासों बार पाकिस्तान के समकक्ष हमें रखते हुए युद्धविराम के दावे कर चुके हैं और प्रधानमंत्री मोदी माई डियर फ्रेंड ट्रंप का नाम ही जपते रहे। अब भी वेनेजुएला के घटनाक्रम पर नरेन्द्र मोदी की कोई सीधी टिप्पणी देखने नहीं मिली है, बल्कि एस जयशंकर का बयान आया है कि हम सभी संबंधित पक्षों से अपील करते हैं कि मुद्दों का समाधान बातचीत के ज़रिए और शांतिपूर्ण तरी$के से किया जाए, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे।
भारत को बताना चाहिए कि सभी संबंधित पक्षों से उसका तात्पर्य क्या है। क्यों मोदी पहले चीन का नाम लेने से कतरा रहे थे और अब अमेरिका को सीधे नहीं कह रहे कि उसका इस तरह आक्रमण करना गलत है। मान लें कि निकोलस मादुरो ने अपने देश में कुछ गलत किया है या वैश्विक स्तर पर किसी अपराध में संलग्न हैं, तो उन पर कार्रवाई के लिए उनके अपने देश की न्याय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय अदालत है। ट्रंप यहां किस हैसियत से घुसे हैं।
ब्रा•ाील के राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा ने बिल्कु ल ठीक कहा है कि वेनेज़ुएला के नेता को हिंसक तरीक़े से पकड़ना 'पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक और बेहद ख़तरनाक मिसाल' है। क्यूबा ने कहा कि वेनेज़ुएला पर किए गए आपराधिक हमले की निंदा करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तुरंत कार्रवाई की मांग करता है। रूस ने भी इस हमले को गलत बताया है वहीं चीन ने कहा है कि एक संप्रभु देश के ख़िलाफ़ अमेरिका के खुलेआम बल प्रयोग और उसके राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ कार्रवाई से वह बहुत हैरान है और इसकी कड़ी निंदा करता है। भारत ऐसी खुली आलोचना क्यों नहीं कर पाया, यह चिंताजनक प्रश्न है। क्योंकि इस तरह हम भी अमेरिका की आक्रमणकारी, विस्तारवादी नीति के हिमायती बन रहे हैं, जिसकी इजा•ात हमारी विदेश नीति नहीं देती है।
दरअसल गलत तरीके से सत्ता हथियाना या ड्रग्स के आरोप केवल बहाना हैं, ट्रंप का असली मकसद अमेरिकी तेल कंपनियों के लिए वेनेजुएला को खोलना था, जो मादुरो के सत्ता में रहते संभव नहीं हो रहा था। ट्रंप ने कहा है कि, 'यूनाइटेड स्टेट्स की बहुत बड़ी तेल कंपनियां वेनेजुएला जाएंगी, अरबों डॉलर खर्च करेंगी और बहुत बदहाल बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करेंगी। हम तेल की विशाल मात्रा बेचेंगे। ये बयान साफ बता रहा है कि अमेरिका का असली मकसद क्या है। वैसे ट्रंप के इस आक्रमण से कई अमेरिकी नेता भी नाराज हैं। जोहरान ममदानी और कमला हैरिस जैसे लोगों ने इसकी आलोचना की है। वहीं पूरे अभियान को कांग्रेस को बताए बिना शुरु करने पर सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता चक शूमर ने कहा, कि निकोलस मादुरो एक अवैध तानाशाह हैं। लेकिन कांग्रेस की अनुमति के बिना और आगे क्या होगा, इसकी कोई विश्वसनीय योजना बनाए बिना सैन्य कार्रवाई शुरू करना लापरवाही है। हालांकि विदेश मंत्री मार्क रूबियो ने कहा कि अगर कांग्रेस को पहले जानकारी दी जाती तो मिशन ख़तरे में पड़ सकता था। जिस पर ट्रंप ने जोड़ा, 'कांग्रेस में जानकारी लीक होने की आशंका रहती है। यह अच्छा नहीं होता।'
यह बिल्कुल मोदी वाली कार्यशैली है कि बड़े फैसले ले लो और बाद में अपने मंत्रियों को इस बारे में बताओ। खैर अब सवाल ये है कि निकोलस मादुरो के साथ क्या बर्ताव किया जाएगा। क्या उनका हश्र भी सद्दाम हुसैन जैसा होगा या इस बार अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के साथ-साथ अमेरिका के भीतर भी ट्रंप की इस तानाशाही का कड़ा विरोध होगा।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये फिर पूरी दुनिया के लिए खतरनाक बात होगी, क्योंकि वेनेजुएला के बाद उन तमाम कमजोर देशों को ऐसे ही तबाह किया जाएगा, जहां प्राकृतिक संसाधन भरे पड़े हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर वेनेजुएला की विपक्ष की नेता मारिया कोरिना मचाडो ने कहा है कि आजादी का वक्त आ गया है। शायद वे अमेरिका की गुलामी को वेनेजुएला की आजादी की तरह देख रही हैं। जबकि आधुनिक लोकतंत्र की परिभाषा के लिहाज से संप्रभु देश पर आक्रमण और अतिक्रमण है।