दो व्यापार समझौते और तीन चुनौतियां

करोड़ों गिग वर्कर्स को न्यूनतम मजदूरी और काम के तय घंटे जैसी बुनियादी चीजें देना भी उसका काम है

Update: 2026-02-06 02:57 GMT

करोड़ों गिग वर्कर्स को न्यूनतम मजदूरी और काम के तय घंटे जैसी बुनियादी चीजें देना भी उसका काम है। और रोजगार भी तभी बढ़ेंगे जब निवेश का तंत्र सुधरेगा। असल में यह खाए, पिए अघाए लोगों का बजट है, अच्छी हालत में भविष्य बेहतर बनाने की कोशिश करने की जगह चीजों को वैसे ही चलाने देने की सोच का अभाव है, कुछ न करके भी संतुष्ट रहने का बजट है।

आखिर अमेरिका से भी व्यापार संधि हो गई और सारी बारीकी सामने नहीं आई हो तब भी यह नतीजा निकालने में हर्ज नहीं है कि दोनों पक्षों को संतुष्ट करने वाले प्रावधान इसमें हैं और 18 फीसदी सीमा शुल्क पर भारतीय माल के अमेरिका प्रवेश का मतलब हमारा व्यापार बढ़ना ही होगा। एक नई बात यह हो सकती है की कुछ अमेरिकी/विदेशी उत्पादक अमेरिका में ही अपना ज्यादा माल बेच सकने की सहूलियत के लिए भारत में अपना प्रोडक्शन बेस बनाएं। अमेरिकी संधि तो बजट के अगले दिन हुई पर यूरोपीय संघ से खुले व्यापार की संधि भी तीन- चार दिन पहले हुई थी। उसके प्रावधान भी यही स्थिति बनाते हैं और यही चीजें इन संधियों का सबसे धनात्मक पक्ष है। अब अमेरिका से समझौते की घोषणा भले दो तारीख को हुई हो लेकिन अधिकांश शर्तों पर सहमति बनाने की चर्चा बिहार चुनाव के पहले से हो रही थी। और तो और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने तीन दिन पहले यह कह दिया था कि यह समझौता अब हो जाने को ही है। इस प्रसंग को लंबा खींचने के पीछे यह बात दिखाने की मंशा है कि बजट की तैयारियों के क्रम में इन दो बड़ी संधियों का आधार तैयार था और कम से कम इस बातचीत में शामिल लोगों को तो प्रावधानों की भी लगभग पूरी स्थिति का पता होगा।

लेकिन निर्मला सीतारमन के नौवें बजट में इस संधियों के फलितार्थ से संबंधित कोई तैयारी नहीं दिखती। यूरोपीय संघ और अमेरिका हमारे पशुपालन और खेती को प्रभावित करने वाले प्रावधानों के लिए दबाव बना रहे थे और इनमें से काफी बातें मान ली गई हैं। कार, शराब से लेकर अनेक औद्योगिक उत्पाद का आयात सस्ता होकर हमारे अपने उत्पादन और खपत के परिदृश्य को बदलेगा। बजट में कृषि और पशुपालन या मत्स्य और कुक्कुटपालन में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है जो आगे आने वाले प्रभाव में हमारे किसानों और पशुपालकों के हितों की रक्षा कर सके। हम जानते हैं कि यूरोप और अमेरिका में खेती और डेयरी का कारोबार भारी सब्सिडी पर चलता है। ऐसे में गेहूँ, मक्का, सोयाबीन, जेनेटिक फसलों और खली के धंधे पर ही नहीं दूध, मक्खन और अन्य डेयरी उत्पादों पर असर होगा लेकिन वित्त मंत्री ने उसकी चिंता अगले बजट के लिए छोड़ दी है। वे इस बजट को जाने किस आधार पर युवाओं का और नये भारत के निर्माण का बजट बता रही हैं।

इससे भी ज्यादा जिस चीज की चिंता करनी चाहिए थी वह है भारत को मैन्युफैक्चरिंग का ठिकाना बनाने की तैयारी। ये दोनों व्यापार सन्धियां हमारे यहां से तैयार माल को यूरोप और अमेरिका में भेजने का रास्ता सुगम करेंगी। फिर सिर्फ मोबाइल और कंप्यूटर के लिए ही नहीं, सारे औद्योगिक उत्पादों और उपभोक्ता मशीनरी के निर्माण और एसेम्बलिङ्ग कारोबार की राह इससे खुलने वाली है। इस बीच यह भी हुआ है कि ट्रम्प की नीतियों और वैश्विक वित्त बाजार में अनिश्चितता के चलते दुनिया भर की पूंजी विकसित और मजबूत अर्थव्यवस्थाओं की तरफ मुड़ गई है। और तो और वहां भी सोना-चांदी में निवेश को सुरक्षित और बढ़ने वाला मानने का चलन बढ़ा है। उनके यहां के निवेश में पांच से बारह फीसदी तक की वृद्धि हुई है जबकि हमारे यहां से बड़ी मात्रा में विदेशी संस्थागत निवेश और पोर्टफोलियो निवेश में कमी आई है। विदेशी पूंजी की जगह देसी पूंजी ने कुछ समय तक मोर्चा संभाला लेकिन अब उसकी क्षमता की सीमा आ गई है, यह हर आदमी महसूस कर रहा है। बाजार से पूंजी का पलायन रोकने और नई पूंजी को आकर्षित करने वाले कदम उठाने की दरकार है लेकिन निर्मला जी का बजट इस बारे में मौन हो गया है। संरचना क्षेत्र में निवेश अच्छा होता है लेकिन हर जानकार बताता है कि हम अपनी क्षमता से ज्यादा निवेश इस क्षेत्र में कर चुके हैं।

पूंजी का पलायन रोकने और नए निवेश को आकर्षित करने जैसा ही इमरजेंसी वाला काम डालर और प्रमुख विदेशी मुद्राओं के मुकाबले रुपए का धराशायी होना रोकने का है। ऐसी ही आपात जरूरत सर्राफा बाजार के भूचाल को संभालने की है। चांदी भारी सट्टेबाजी की चीज बन गई है और शादियों के मौसम में आम आदमी सोना तो दूर चांदी तक खरीदने की स्थिति में नहीं है और उधर सट्टेबाज माल बनाकर लाल होते गए हैं। एक किलो चांदी की कीमत में एक दिन में अस्सी हजार तक की गिरावट और चढ़ान तो बिना सट्टेबाजी संभव ही नहीं है। और अगर चीन या कोई भी और देश सोना चांदी खरीद कर जमाखोरी कर रहा है तो उसका भी उपाय ढूंढा जाना चाहिए। शेयर बाजार का यही हाल है और बजट के दिन की उसकी दो हजार अंकों की गिरावट को बजट से निराशा मान सकते हैं लेकिन अमेरिकी सरकार द्वारा एक कंपनी को नोटिस देने भर से बाजार लाखों करोड़ के मूल्य गंवा दे यह तो सट्टेबाजों का नहीं उनकी गिरोहबाजी से ही संभव है। रुपया रोज गोते खा रहा है और साल भर में छह फीसदी तक नीचे आ गया है। बजट में इन क्षेत्रों का जिक्र ही नहीं है और प्रतिभूति कारोबार टैक्स बढ़ाकर ऐसा हंगामा मचा दिया गया कि हर आदमी यह समझने की कोशिश कर रहा है कि यह क्या बला है। और जो स्थिति समझते हैं उनको भी समझ नहीं आ रहा है कि इस उपाय से बाजार को क्या फायदा होगा?

शायद सरकार महंगाई और मुद्रास्फीति बढ़ने न देने की मंशा को ऊपर रख रही है। उसे जीडीपी की दर और महंगाई दर की चिंता सबसे ज्यादा है। वह दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज विकास दर पर इठला रही है। उसने पिछले बजट में आयकर नियमों में जो बदलाव किए हैं और जो इस बार अप्रैल से लागू होंगे, उनको फाइनल मान लिया है। उसने जीएसटी दरों में जो बदलाव किये उनके बाद कर के ढांचे में मामूली करेक्शनों को छोड़कर बाकी कुछ करने की जरूरत नहीं लगती। वह भूल गई है कि पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाना उसी का काम है और दस साल से ज्यादा समय से टल रहा है। अभी के बढ़े टैक्स अपने लोगों से हर साल तीन लाख करोड़ ज्यादा वसूल कर उसके बटुए में पहुंचा देते हैं। वह भूल गई है कि देश में आधे कामगार खेती से जुड़े हैं और सस्ते विदेशी आयात के बाद उन सबके जीवन पर कम ज्यादा असर होगा ही। करोड़ों गिग वर्कर्स को न्यूनतम मजदूरी और काम के तय घंटे जैसी बुनियादी चीजें देना भी उसका काम है। और रोजगार भी तभी बढ़ेंगे जब निवेश का तंत्र सुधरेगा। असल में यह खाए, पिए अघाए लोगों का बजट है, अच्छी हालत में भविष्य बेहतर बनाने की कोशिश करने की जगह चीजों को वैसे ही चलाने देने की सोच का अभाव है, कुछ न करके भी संतुष्ट रहने का बजट है।

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