पद्म अलंकरणों की बंदरबांट का शर्मनाक सिलसिला
केद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने पद्म अलंकरणों के जरिये अपनी चुनावी राजनीति के समीकरण साधने का जो सिलसिला 2015 में शुरू किया था
- अनिल जैन
केरल के ही जस्टिस केटी थॉमस को भी पद्म विभूषण देने का ऐलान किया गया है, जो कि स्पष्ट रूप से चुनावी राजनीति से प्रेरित है। इसमें कोई संदेह नहीं कि निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जस्टिस थॉमस का न्यायिक सेवा का रिकॉर्ड बेदाग और शानदार रहा है, लेकिन मोदी सरकार को उनकी याद अब आई है, क्योंकि केरल में चुनाव है।
केद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने पद्म अलंकरणों के जरिये अपनी चुनावी राजनीति के समीकरण साधने का जो सिलसिला 2015 में शुरू किया था, वह इस साल 2026 में भी जारी रहा। इस साल कुल 131 लोगों को पद्म अलंकरण प्रदान करने का ऐलान किया गया है, जिनमें 38 लोग उन पांच राज्यों के हैं, जहां इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इन पांच राज्यों में भी सबसे ज्यादा 13 पद्म अलंकरण तमिलनाडु के लोगों को देने की घोषणा हुई है, जहां भारतीय जनता पार्टी पिछले कई वर्षों से अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल के 11, केरल के 8, असम के 5 और पुडुचेरी के 1 व्यक्ति को यह अलंकरण प्रदान किया जाएगा।
देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण के लिए इस बार पांच लोगों का चयन किया गया है, जिनमें से तीन अकेले केरल के हैं, जहां भाजपा ने अपनी सरकार बनाने की हसरत पाल रखी है। इन तीन में सबसे उल्लेखनीय और चौंकाने वाला नाम केरल के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री और मार्क्सवादी नेता वीएस अच्युतानंदन का है। इसमें कोई दो मत नहीं कि अपनी असंदिग्ध ईमानदारी, सादगी और गरीब व कमजोर वर्ग की सेवा के लिए अच्युतानंदन के लिए कोई भी पुरस्कार या सम्मान बहुत बौना है। वैसे भी भारत की वामपंथी पार्टियां शुरू से ही सैद्धांतिक रूप से ऐसे सरकारी सम्मानों के खिलाफ रही हैं। इसीलिए पूर्व में ईएमएस नंबूदरिपाद, ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे नेता पद्म अलंकरणों को ठुकरा चुके हैं। अच्युतानंदन अगर जीवित होते तो शायद वे भी अपनी सैद्धांतिक निष्ठा के चलते यह सम्मान स्वीकार नहीं करते लेकिन उनके परिवारजनों ने इसे स्वीकार करने का फैसला किया है। उनकी पार्टी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस फैसले का समर्थन किया है।
कहने को तो यह भी कहा जा सकता है कि अच्युतानंदन को सम्मानित करने का फैसला लेकर सरकार ने अपनी निष्पक्षता दिखाई है। मगर यह बेहद मासूम दलील है। सब जानते हैं कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने हमेशा ही भारत के वामपंथी दलों को देश का दुश्मन माना है। यही नहीं, अच्युतानंदन पर तो उनके शासनकाल में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्या कराने का आरोप भी लगाया था। इसलिए अब दिवंगत अच्युतानंदन को पद्म विभूषण से सम्मानित करने का फैसला शुद्ध रूप से राजनीतिक फैसला है, जो कि उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रख कर लिया गया है। गौरतलब है कि अच्युतानंदन राज्य के एझवा समुदाय के थे, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 24 फीसदी और राज्य की हिंदू आबादी का करीब 50 फीसदी है। यह समुदाय पिछड़ा वर्ग में आता है।
केरल के ही जस्टिस केटी थॉमस को भी पद्म विभूषण देने का ऐलान किया गया है, जो कि स्पष्ट रूप से चुनावी राजनीति से प्रेरित है। इसमें कोई संदेह नहीं कि निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जस्टिस थॉमस का न्यायिक सेवा का रिकॉर्ड बेदाग और शानदार रहा है, लेकिन मोदी सरकार को उनकी याद अब आई है, क्योंकि केरल में चुनाव है। अन्यथा कोई वजह नहीं थी कि 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किए जा चुके 90 वर्षीय जस्टिस थॉमस को अब पद्म विभूषण से सम्मानित किया जाता।
ऐसा नहीं है कि पद्म अलंकरणों के जरिये राजनीति साधने का काम कांग्रेस की सरकारों के दौर में नहीं हुआ। उस दौर में भी ऐसा होता था, लेकिन वह आंशिक पैमाने पर था।
मोदी सरकार ने तो इन अलंकरणों को पूरी तरह से अपने राजनीतिक हित साधने का माध्यम बना लिया है। दो साल पहले लोकसभा चुनाव से पहले पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और बिहार के मुख्यमंत्री रहे समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकु र को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। चरण सिंह को भारत रत्न देने के बदले में उनके पौत्र जयंत चौधरी की पार्टी लोकदल विपक्षी गठबंधन से नाता तोड़कर एनडीए में शामिल हो गई थी और चुनाव के बाद जयंत चौधरी केंद्र सरकार में मंत्री बना दिए गए।
इसी तरह 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और असमिया गीतकार भूपेन हजारिका को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। उसी साल ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बहन गीता मेहता को भी बतौर साहित्यकार पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान किया गया था लेकिन अमेरिका में रहने वाली गीता मेहता ने उसे लेने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह का सम्मान देना या लेना लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। इसके कई मतलब निकाले जाएंगे, जिससे उन्हें और सरकार, दोनों को ही शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है। जाहिर है कि गीता मेहता ने विनम्रतापूर्वक पद्म अलंकरण ठुकरा कर अपने उच्चस्तरीय जीवन-मूल्यों का परिचय दिया था।
वैसे यह पहला मौका नहीं था जब किसी ने यह सम्मान लौटाया हो। इससे पहले भी कई हस्तियां अलग-अलग कारणों से पद्म अलंकरणों को ठुकराती रही हैं। इस सिलसिले में पहला नाम आता है ओडिशा के पहले मुख्यमंत्री नवकृष्ण चौधरी का, जो 1958 में मुख्यमंत्री का पद छोड़कर विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन से जुड़ गए थे। उन्होंने पद्म विभूषण लेने से इनकार कर दिया था। खुद विनोबा ने भी अपने जीवनकाल में पद्म विभूषण लेना स्वीकार नहीं किया था। बाद में साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु, बाबा नागार्जुन, कहानीकार कृष्णा सोबती और रंगकर्मी बादल सरकार आदि भी यह अलंकरण लौटा या ठुकरा चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मजदूर नेता दत्तोपंत ठेगड़ी ने भी 2003 में पद्म विभूषण लेने से इनकार कर दिया था। हालांकि उनका यह इनकार अलग वजह से था। उनका कहना था कि जब तक आरएसएस के संस्थापक डॉ. केबी हेडगेवार और एमएस गोलवलकर को भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया जाता, तब तक वे कोई भी राजकीय सम्मान स्वीकार नहीं करेंगे।
मोदी सरकार ने 2016 में प्रख्यात गांधीवादी नारायण देसाई को भी मरणोपरांत पद्म भूषण देने का ऐलान किया गया था लेकिन उनके परिवारजनों ने यह कहते हुए वह सम्मान ठुकरा दिया था कि नारायण देसाई इस तरह के सरकारी सम्मानों के हमेशा विरोधी रहे थे। पद्म अलंकरण ठुकराने के इन चंद उदाहरणों के साथ ही अन्य कई कारण भी हैं, जो इन अलंकरणों की सात्विकता पर सवाल करते हुए इनकी निरर्थकता को साबित करते हैं। ये अलंकरण अब अपनी रंगत और गरिमा इसलिए भी खो चुके हैं क्योंकि इन्हें हासिल करने के कई लोग तरह-तरह की तिकड़में भिड़ाते हैं, दिल्ली में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की चिरौरी करते हैं।
दरअसल भारत रत्न और पद्म अलंकरणों के नाम पर नागरिक सम्मान की जैसी बंदरबांट भारत में होती है, वैसी दुनिया के किसी और देश में नहीं होती। ब्रिटिश हुक्मरानों, राजाओं और नवाबों की तर्ज पर लोकतांत्रिक सरकार द्वारा ठेठ सामंती अंदाज में दिए जाने वाले ये अलंकरण गणतंत्र दिवस के अवसर पर पिछले 73 वर्षो से दिए जा रहे हैं परन्तु इन्हें देने में कभी भी भारत की विविधताओं का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। इसी वजह से 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने ये अलंकरण बांटने बंद कर दिए थे। जनता पार्टी की सरकार का यह फैसला संविधान निर्माताओं की सोच के अनुरूप ही था।
गौरतलब है कि इस तरह के अलंकरणों का प्रस्ताव संविधान सभा में भी आया था पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद संविधान सभा ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। जनता पार्टी की सरकार ने इन अलंकरणों पर रोक लगाने का फैसला लेते हुए संविधान सभा के फैसले का हवाला भी दिया था। फिर भी 1980 में कांग्रेस ने सत्ता में लौटने पर इन अलंकरणों को देना फिर शुरू कर दिया था। हालांकि बाद में कांग्रेस की ही पीवी नरसिंहराव सरकार ने बगैर किसी औपचारिक ऐलान के इन अलंकरणों को बांटना बंद कर दिया था और संयुक्त मोर्चा की एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल सरकार ने भी इन अलंकरणों की निरर्थकता को समझते हुए उस फैसले को जारी रखा। इस प्रकार 1992 से 1998 तक इन अलंकरणों का बंटना बंद रहा। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में बनी एनडीए सरकार के दौर में इन अलंकरणों को बांटने का सिलसिला फिर शुरू हो गया जो अब भी जारी है।
दरअसल किसी भी पुरस्कार या सम्मान की सार्थकता तभी होती है जब उसको लेकर समाज के गौरवान्वित होने का अहसास भी हो। वरना पुरस्कार और उसे पाने वाले दोनों ही हास्यास्पद बन जाते हैं। पद्म अलंकरणों के मामले में भी आम तौर पर यही होता है। जिन लोगों को यह मिलता है, उनमें से कुछ को देखकर तो सहानुभूति होती है, कुछ को देख कर घिन आती है और कुछ के लिए गुस्सा आता है। बेहतर होगा कि इन अलंकरणों को स्थायी तौर पर बंद कर दिया जाए।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)