ललित सुरजन की कलम से वैमनस्य की राजनीति
1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तो यह प्रचारित किया गया कि राजीव गांधी अपनी ससुराल जाकर बस जाएंगे।
'1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तो यह प्रचारित किया गया कि राजीव गांधी अपनी ससुराल जाकर बस जाएंगे। हम जानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ, बल्कि राजीव गांधी इंडियन एयर लाइंस में पायलट की नौकरी बदस्तूर करते रहे। फिर इंदिराजी की हत्या के बाद यह निंदनीय दुष्प्रचार किया गया कि उन्होंने अपनी किसी डुप्लीकेट को मरवा डाला है और वे खुद स्विट्जरलैंड भाग गईं हैं। मैं नहीं जानता कि ऐसी ओछी बातें करने में लोगों को क्या आनंद आता है। मुझे ध्यान नहीं आता कि कांग्रेस अथवा कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े नेताओं ने कभी विपक्ष के बारे में इस स्तर तक उतरकर अशोभनीय टिप्पणियां की हों। भाजपा में भी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता ने भी ऐसी टिप्पणियां नहीं कीं। क्या यह इसकी वजह थी कि वाजपेयीजी राजनीतिक शिष्टाचार का मूल्य समझते थे? भैरोंसिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवानी या मुरली मनोहर जोशी को भी ऐसे निजी आक्षेप करते हुए शायद ही कभी देखा गया हो। अफसोस इस पर कि काश वे अपनी अगली पीढ़ी को राजनीति में सद्भाव, सौमनस्य निभाने के संस्कार दे सकने में सफल हो पाते।'
(देशबन्धु में 08 मई 2014 को प्रकाशित)
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