ललित सुरजन की कलम से पत्रकारिता की मिशनरी परंपरा और पतन

'यदि किसी को उम्मीद थी कि आपातकाल समाप्त होने के बाद प्रेस नए सिरे से प्राप्त स्वतंत्रता और सम्मान का उपयोग बेहतर ढंग से करेगा तो यह आशा निष्फल सिद्ध हुई।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-08 22:10 GMT

'यदि किसी को उम्मीद थी कि आपातकाल समाप्त होने के बाद प्रेस नए सिरे से प्राप्त स्वतंत्रता और सम्मान का उपयोग बेहतर ढंग से करेगा तो यह आशा निष्फल सिद्ध हुई। 1977 के बाद प्रेस के कम से कम एक हिस्से में स्वतंत्रता का स्थान अराजकता ने ले लिया। पहले की पत्रकारिता यदि किन्हीं सिद्धांतों एवं आदर्शों से प्रेरित थी तो नए माहौल में उन्हें तिलांजलि देने का क्रम शुरु हो गया। 1982 में एशियाई खेलों के आयोजन के साथ-साथ दूरदर्शन की मार्फत टीवी एक नए और आकर्षक माध्यम के रूप में सामने आया, जिसने आम जनता के अलावा अखबारों की रीति-नीति, कलेवर, साज-सज्जा इन सबको भी प्रभावित किया। समाचारपत्रों में गंभीर वैचारिक सामग्री के लिए स्थान सिकुडऩे लगा, उसकी जगह हल्की मनोरंजक सामग्री ने ले ली। इसी बीच नई तकनीकी के आगमन ने अखबारों की साज-सज्जा को भी अधिक चमकीला बनाने की प्रेरणा दी। कुल मिलाकर बाह्य कलेवर महत्वपूर्ण और आंतरिक तत्व गौण हो गया। दूरदर्शन पर शुरू में जो सामाजिक संदेश वाले धारावाहिक आते थे, वे भी एक दिन फीके पड़ गए। सामुदायिक एवं संस्थागत स्तर पर एफ एम रेडियो स्टेशन स्थापित करने की नीति लोकशिक्षण के लिए बनाई गई, लेकिन वास्तव में उनका उपयोग व्यापारिक हित संवर्धन के लिए ही किया गया। इस तरह पारंपरिक मीडिया के तीनों अंग अखबार, रेडियो व टीवी पूंजी हितों की सेवा में समर्पित कर दिये गये। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए विवश होता हँू कि भारत में पत्रकारिता का कोई स्वर्णयुग नहीं था।'

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