तेल के खेल में मोहरा बना भारत

वैश्विक राजनीति पर दबदबा उसी का होता है, जो अर्थव्यवस्था को अपनी मर्जी से नचाना जानता है;

Update: 2026-10-22 01:18 GMT

ट्रंप ने इस बीच एक समझौता रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ भी किया है, जिसके तहत रूसी डीज़ल को वैश्विक बाज़ार में उतारा जाएगा। अब तक तो भारत को रूस से तेल खरीदने पर टैरिफ थोपने की धमकी दी जा रही थी, लेकिन अब ट्रंप ने भी अपना फायदा देखते हुए बात पलट दी है। पिछले सप्ताह ही भारत को भी ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने वाली धमकी से मुक्त किया है।

वैश्विक राजनीति पर दबदबा उसी का होता है, जो अर्थव्यवस्था को अपनी मर्जी से नचाना जानता है। एक समय था जब ग्रेट ब्रिटेन अपनी औद्योगिक क्रांति के कारण एक के बाद एक देशों को अपना गुलाम बनाता गया और औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर खुद की शक्ति और संपत्ति में अकूत इजाफा किया। आज ऐसा ही खेल अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप खेल रहे हैं, फर्क यही है कि भारत को गुलाम बनाए बिना उसे मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इन दिनों अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो भारत आए हुए हैं। बुधवार को रूबियो गुजरात के जामनगर पहुंचे, जहां मुकेश अंबानी का बनाया तेल शोधन संयंत्र है। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के स्वामित्व वाली दुनिया की सबसे बड़ी यह तेल रिफ़ाइनरी रूस और वेनेज़ुएला समेत कई देशों से कच्चा तेल लेती है और उसे रिफ़ाइन करके तैयार ईंधन वैश्विक बाज़ारों में भेजती है। पाठक जानते हैं कि वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का आधी रात में अपहरण कर अमेरिका ने उन्हें अपनी जेल में रखा है और वेनेजुएला में अपने समर्थन से अंतरिम सरकार बना दी है। यानी वेनेजुएला के तेल के खजाने पर अब अमेरिका का अधिकार है। इधर अमेरिका के ही छेड़े युद्ध के बाद ईरान ने जब होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद कर दिया तो दुनिया भर में ईंधन की आपूर्ति पर इसका असर पड़ा और तेल की कीमतों में एकदम से तेजी आई। भारत में कितने दिनों तक लोग खाली सिलेंडरों के साथ सड़कों पर थे, यह तो कोई भूला नहीं है। इस त्योहारी मौसम में भी महंगाई बढ़ने का बड़ा कारण तेल की महंगाई है। अमेरिका में भी ऐसे ही महंगाई आई है, लेकिन अगले महीने वहां मध्यावधि चुनाव है। जिसमें ट्रंप तेल की महंगाई के कारण घिरे हुए हैं।

ऐसे वक्त में रुबियो भारत आए और सीधे मुंबई पहुंच कर वहीं विदेश मंत्री एस. जयशंकर को भी बुलवा लिया। विदेश मंत्रालय कोई सूचना देशवासियों को देता, इससे पहले ही अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने इस बारे में इत्तला दे दी थी कि जब रुबियो मुंबई में रहेंगे तो विदेश मंत्री जयशंकर वहीं उनसे मिलेंगे। अब यही चलन हो गया है कि हमारी सरकार क्या करेगी, यह अमेरिका पहले बता देता है। ऑपरेशन सिंदूर भी अचानक बंद कर दिया गया, यह बात पहले डोनाल्ड ट्रंप ने बताई और उसके कई घंटों बाद नरेन्द्र मोदी ने। राहुल गांधी जब इसे अमेरिका के सामने सरेंडर बताते हैं तो यह महज तंज नहीं, मौजूदा दौर की कड़वी सच्चाई है। एक वक्त था जब भारत के लिए शान से कहा गया था, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। लेकिन अब उसी हस्ती को मोदी सत्ता के लालच में मिटाने पर तुले हैं और शान से बताते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप से उनका कितना गहरा याराना है। हालांकि इसकी बहुत भारी कीमत देश की जनता चुका रही है।

ट्रंप को व्यापारिक और राजनैतिक कोई भी असुविधा न हो, इसका पूरा ख्याल मोदी सरकार रख रही है। चुनाव से पहले अमेरिका को डीज़ल की भारी ज़रूरत है और जामनगर रिफाइनरी यह ज़रूरत पूरी कर सकती है। ध्यान रहे कि वेनेज़ुएला के कच्चे तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार अमेरिका है, जबकि भारत दूसरे स्थान पर है। लेकिन वेनेजुएला में जब अघोषित तौर पर अमेरिका की ही सरकार है, तो यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारत ही वेनेजुएला का तेल खरीद रहा है, अमेरिका तो केवल ले रहा होगा। बहरहाल बीते महीनों में भारत ने वेनेज़ुएला से लगभग 2.90 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया, जिसमें से 90 प्रतिशत जामनगर रिफाइनरी में आया। यहीं से फिर संशोधित तेल वैश्विक बाजार में बेचा जाता है। रिलायंस की एक रिफाइनरी अब अमेरिका में भी खुलने जा रही है। 'अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग' नाम से टेक्सास में बन रही इस रिफाइनरी में सारा काम रिलायंस की मदद से होगा और मार्च में इस पर करीब 300 अरब डॉलर का सौदा हो चुका है। अब अमेरिका चाहता है कि भारत वेनेजुएला से ज्यादा से ज्यादा तेल खरीदे और उसे रिफाइन कर अमेरिका के सुपुर्द कर दे। हालांकि अपनी इस चाहत को कूटनीतिक शब्दों में पिरोकर भारतीयों को बताया जा रहा है। जैसे रुबियो ने मंगलवार को मुंबई में पत्रकारों से कहा कि भारत एक 'रिफ़ाइनिंग सुपरपावर' है और बाज़ार पर पड़ रहे दबाव को कम करने में मदद कर सकता है। हमें रिफाइनिंग सुपरपावर बता कर अमेरिका अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है। मोदी इस बात को अच्छे से समझते हैं, लेकिन अंबानी और ट्रंप से अपनी नजदीकियों को वे ज्यादा महत्व देते हैं।

वैसे ट्रंप ने इस बीच एक समझौता रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ भी किया है, जिसके तहत रूसी डीज़ल को वैश्विक बाज़ार में उतारा जाएगा। अब तक तो भारत को रूस से तेल खरीदने पर टैरिफ थोपने की धमकी दी जा रही थी, लेकिन अब ट्रंप ने भी अपना फायदा देखते हुए बात पलट दी है। पिछले सप्ताह ही भारत को भी ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने वाली धमकी से मुक्त किया है। मोदी इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता सकते हैं, लेकिन असल में ट्रंप बार-बार भारत के सम्मान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। क्योंकि एक तरफ ट्रंप भारत की क्षमताओं का दोहन कर अपनी ऊर्जा सुरक्षा और सत्ता में बने रहने का इंतजाम कर रहे हैं, दूसरी तरफ भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान से भी नजदीकियां बनाए हुए हैं।

मुंबई में मार्को रूबियो ने अमेरिका के लिए पाकिस्तान की अहमियत बताई और देशभक्ति का ढोल पीटने वाले संघी और दक्षिणपंथी लोग इस पर एक शब्द नहीं कह रहे हैं। गौरतलब है कि 2025 में जब मार्को रूबियो केवल सीनेटर थे तो उन्होंने कहा था कि अगर पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ आतंकवाद को बढ़ावा देता है, तो वे पाकिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी सुरक्षा सहायता में कटौती के लिए एक बिल पेश करेंगे। इस बयान पर उनसे मुंबई में सवाल किया गया कि क्या अब आपका रुख़ बदला है? क्या इस नीति में कोई बदलाव हुआ है?' तो रुबियो ने कहा, 'हम दुनिया में कहीं भी होने वाले आतंकवाद के ख़िलाफ़ हैं। लेकिन अब मैं सीनेटर नहीं, विदेश मंत्री हूं। मुझे अमेरिका की विदेश नीति का संचालन करना है। इसके लिए हमें अलग-अलग देशों के साथ संबंध बनाए रखने होते हैं, जिनमें वे देश भी शामिल हैं, जिनके साथ हमारे कुछ मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं। पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जिसके साथ हमें संबंध बनाए रखने होंगे। उसके पास परमाणु हथियार हैं। भौगोलिक स्थिति के लिहाज़ से भी हमें उसके साथ बातचीत और संपर्क बनाए रखने की ज़रूरत है। ठीक उसी तरह, जैसे भारत को ईरान के साथ संबंध रखने पड़ते हैं और वहां के नेताओं से मुलाक़ातें भी होती हैं।'

इस बयान से मार्को रुबियो ने बता दिया कि असीम मुनीर और शाहबाज शरीफ ट्रंप को प्यारे हैं और उनके आगे वे मोदी को अहमियत नहीं देते हैं। रूबियो ने जिस तरह भारत-ईरान संबंधों की तुलना पाकिस्तान से अपने रिश्तों को बताने के लिए की, वह भी सरासर देश का अपमान है, क्योंकि ईरान से हमारे सदियों पुराने संबंध हैं। और वह कोई आतंक फैलाने वाला देश नहीं है, जिसके नापाक इरादों को भारत का समर्थन रहता है। अमेरिका ने तो पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में मदद की, लेकिन भारत ने ईरान के साथ ऐसा नहीं किया। ईरान को आतंकवाद प्रायोजित करने वाला देश बताकर अमेरिका ने उस पर हमला बोला, व्यापक प्रतिबंध लगाए, लेकिन जिस पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन छिपा रहा, वहां ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

अमेरिका भारत की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और इन सबसे बढ़कर हमारे सम्मान पर लगातार किसी न किसी तरह चोट पहुंचा रहा है और सरकार इस पर चुप लगाकर बैठी है। इसके प्रत्यक्ष नुकसान तो नजर आ ही रहे हैं, लेकिन दो-तीन लोगों के फायदे के लिए जो दीर्घकालिक नुकसान देश को मोदी सरकार करवा रही है, वो और घातक साबित होंगे।

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