बजट: दूर-दूर तक नहीं दिखती विकास की राह
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश बजट के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका भाषण बहुत लंबा और मुद्दों पर प्रकाश डालने वाला कतई नहीं था
- डॉ.इंदिरा हिरवे
कई जरूरी समस्याएं हैं जिन्हें बजट में शामिल नहीं किया गया है। सबसे पहले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (माइक्रो, मीडियम एंड स्माल इंटरप्राइजेस- एमएसएमई) भारत में धन और आय की बढ़ती असमानताओं और जलवायु परिवर्तन से संबंधित हैं। एमएसएमई से भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (ईयू-भारत एफटीए)के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश बजट के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका भाषण बहुत लंबा और मुद्दों पर प्रकाश डालने वाला कतई नहीं था। यह एक थका हुआ सा प्रयास मात्र प्रतीत होता है। लंबा होने के बावजूद भाषण व्यापक रणनीति या असंख्य योजनाओं और संख्याओं के अंतर्निहित समग्र दृष्टिकोण में गोता नहीं लगाता। इन अर्थों में हमने कई विषयों को सुना लेकिन विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल और घरेलू अर्थव्यवस्था पर इसके व्यापक प्रभावों के समय में आवश्यक उन महत्वपूर्ण दिशात्मक मुद्दों पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है। इसके बजाय वित्त मंत्री ने अलग-अलग योजनाओं पर खर्च की बारीकियां बताने में बहुत अधिक समय बिताया। नतीजा यह हुआ कि हम बजट की बड़ी तस्वीर के क्रियान्वयन के बारे में सुनने से चूक गए।
मुख्य व्यय पूंजीगत वस्तुओं पर है। बजट में पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण पर 17.15 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है। यह सकारात्मक है। कैपेक्स भविष्य के लिए बनाता है और एक ऐसा निवेश है जो दीर्घकालिक भौतिक संपत्ति प्रदान करने के लिए है। यह एक गुणक प्रभाव देता है और निजी निवेश को आकर्षित कर सकता है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था में मांग को प्रोत्साहित करता है। जहां तक बजट व्यय का संबंध है, कुल व्यय में सबसे अधिक हिस्सा ब्याज भुगतान या ऋण सेवा 26.20 प्रतिशत पर है। इसके बाद रक्षा (14.67 प्रश), परिवहन (11.2 प्रतिशत) और नागरिक पेंशन (5.54 प्रतिशत) है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण पर (क्रमश:2.60,1.96 तथा 1.17 फीसदी) खर्च कम हैं।
विकसित भारत पर जोर देने का स्वागत किया जाना चाहिए। कौन नहीं चाहेगा कि भारत पूरी तरह से विकसित हो? फिर भी, इस विकास की दिशा के संदर्भ में बड़े सवाल बने हुए हैं। एक ऐसे भारत में विकास की प्रकृति क्या होनी चाहिए जहां असमानता की दर ऊंची है, स्वास्थ्य सेवाएं खराब हैं और शिक्षा के क्षेत्र में कई चुनौतियां हैं जिन्हें बार-बार उजागर किया गया है। विचार करें कि शिक्षा पर कुल प्रतिशत (केंद्र और राज्य का संयुक्त व्यय) सकल घरेलू उत्पाद का केवल 3.3 और स्वास्थ्य पर केवल 1.5 फीसदी है। यह चौंकाने वाले आंकड़े हैं, अविश्वसनीय है। यह एक स्वीकृत तथ्य है कि अस्वस्थ और कम शिक्षित आबादी के साथ देश कभी भी विकसित भारत के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकता। पिछले दशक में हमारा अनुभव बताता है कि जब तक दोनों क्षेत्रों को सरकार के प्रबंधन के तहत नहीं रखा जाता तब तक शिक्षा और स्वास्थ्य आबादी के निचले 40 प्रतिशत तक नहीं पहुंच सकता। इसके बावजूद हाल के वर्षों में मामले विपरीत दिशा में चले गए हैं और बजट इस पर साहसिक रुख अपनाने में असमर्थ रहा है या तैयार नहीं है। ध्यान दें कि स्वास्थ्य के निजीकरण को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति वास्तव में उपचार की लागत बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को कम करने के लिए काम करती है, न कि इसे विस्तारित करने के लिए है। अस्पतालों में निजी इक्विटी निवेश के उदय में यह सबसे अधिक दिखाई देता है।
पिछले साल के बजट की तुलना में इस चालू वर्ष में सभी केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर खर्च बहुत कम है। यानी इन योजनाओं को सरकार द्वारा गंभीरता से नहीं लिया जाता। इन योजनाओं पर बजट में वृद्धि मामूली है। कोई भी यह कह सकता है कि मूल्य वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, कुल मिलाकर केंद्र की प्रायोजित योजनाओं पर खर्च लगभग स्थिर रहा है। यह उन योजनाओं की तस्वीर दिखाता है जो इरादे के मुताबिक या प्रचार के अनुरूप नतीजे नहीं दे सकतीं और न ही देंगी।
वैज्ञानिक विभागों पर खर्च बजट व्यय का मात्र 1.04 फीसदी है। विकसित भारत के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए साक्ष्य-आधारित उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक प्रोत्साहन, वैज्ञानिक सोच और लोगों के सही दृष्टिकोण के निर्माण के प्रयासों में पर्याप्त निवेश नहीं होगा तो देश इन लक्ष्यों को कैसे प्राप्त करेगा? भारत अनुसंधान और विकास में अन्य उभरते देशों से बहुत पीछे है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह अल्प निवेश एक नकारात्मक सोच है। वास्तविक साक्ष्य से पता चलता है कि अनुसंधान पर जो पैसा खर्च किया गया है वह आधुनिक विज्ञान की सख्त मांगों और जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। एक उचित आवंटन और चेतावनी भरी टिप्पणी के साथ यह निर्देशित किया जाना चाहिए कि यह पैसा कहां जाएगा, तभी इस गिरावट को ठीक करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा और भी कई जरूरी समस्याएं हैं जिन्हें बजट में शामिल नहीं किया गया है। सबसे पहले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (माइक्रो, मीडियम एंड स्माल इंटरप्राइजेस- एमएसएमई) भारत में धन और आय की बढ़ती असमानताओं और जलवायु परिवर्तन से संबंधित हैं। एमएसएमई से भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (ईयू-भारत एफटीए)के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है। यूरोपीय संघ-भारत एफटीए के अमलीकरण के संबंध में कई चुनौतियां हैं। ये विशेष रूप से गैर-टैरिफ बाधाओं से संबंधित हैं- एफटीए के लिए आवश्यक है कि माल का उत्पादन मानक गुणवत्ता का होना चाहिए। साथ ही माल का उत्पादन बाल श्रम के उपयोग के बिना होना चाहिए, पर्यावरणीय मानदंडों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए; और इसी तरह की अन्य शर्तें हैं। आज हमारे ज्यादातर एमएसएमई इन मानदंडों का पालन नहीं करते। हालांकि बजट में इन क्षेत्रों में मदद के लिए कुछ भी शामिल नहीं किया गया है।
धन और आय की असमानताओं पर इन दिनों बहुत चर्चा हो रही है। इन व्यापक असमानताओं के साथ विकसित भारत के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। सरकार के अनुसार जलवायु परिवर्तन सौर ऊर्जा तक ही सीमित है। यद्यपि इसमें व्यापक प्रदूषण, लगभग सभी क्षेत्रों में बाढ़ के कारण उत्पन्न स्थिति का अनुभव और हिमालय की बिगड़ती स्थितियों सहित वनों की कटाई भी शामिल है- बजट में इन आपात स्थितियों को संबोधित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है।
भारत में बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, खासकर युवाओं की। बजट में इस ज्वलंत समस्या का •िाक्र तक नहीं है। संक्षेप में, बजट में या तो हमारी गंभीर समस्याओं को बाहर रखा गया है या उन्हें एक तरह की दिखावटी सेवा दी गई है। ऐसे बजट से देश कभी भी सतत विकास को हासिल नहीं कर सकता। रास्ता सही नहीं है और उस हद तक विकास के सपने सिर्फ सपने बनकर रह जाएंगे।
(लेखिका अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)