ललित सुरजन की कलम से देशबन्धु के साठ साल-5

'मेरे दादाजी की उम्र के बापा एक दिलचस्प व्यक्ति थे।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-19 21:50 GMT

'मेरे दादाजी की उम्र के बापा एक दिलचस्प व्यक्ति थे। उन्होंने व उनके सुपुत्र कांतिभाई ने गाढ़े वक्तों में कई बार हमें सहायता दी और कभी खाली हाथ नहीं लौटाया। जब ग्यारह वर्ष बाद हम स्वयं के भवन में आए, तब न जाने कितने माहों का किराया बाकी था जो हमने धीरे-धीरे कर चुकाया। बापा थे तो साहूकार, लेकिन उनके संस्कार गांधीवादी थे। नहरपारा की उसी गली में वे स्वयं जहां रहते थे, वह पुरानी शैली का साधारण दिखने वाला मकान था, जिसमें साज-सजावट की आवश्यकता उन्हें कभी महसूस नहीं हुई। एक दिन प्रेस परिसर में एक फियेट कार आकर खड़ी हो गई। तीनेक माह खड़ी रही। हमारे पास तब कार नहीं थी। बाबूजी ने बापा से निवेदन किया कि यह कार हमें मिल जाए। किश्तों में पैसा चुका देंगे। बापा का उत्तर अनपेक्षित था। जिसकी कार है, वह तकलीफ़ में है। ईमानदार आदमी है। जिस दिन हालत सुधरेगी, कर्ज की रकम चुकाकर गाड़ी ले जाएगा। गाड़ी बेचकर उसकी इज्ज़त नहीं उतारूंगा। तकरीबन छह माह बाद वैसा ही हुआ। यह बीते समय की व्यवसायिक नैतिकता का एक उदाहरण है। बापा जैसे लोग शायद तब भी अपवाद ही थे।'

(देशबन्धु में 01 अगस्त 2019 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2019/07/5.html

Tags:    

Similar News