राहुल ने मोदी का जादू खत्म किया

राहुल ने बिल्कुल सही कहानी सुनाई थी। जादूगर का जादू खत्म हो गया और जादूगर भी खत्म हो गया।;

Update: 2026-04-19 21:40 GMT

शकील अख्तर

सोचिए भारत की एकता और अखंडता के लिए यह कितना जरूरी है कि दक्षिण के राज्यों में ऐसा कोई संदेश नहीं जाए कि उनकी सीटें कम करने की साजिश हो रही है। उन्हें उत्तर भारत के मुकाबले कमजोर करने की कोशिश हो रही है। विपक्ष ने इस माहौल को खत्म कर दिया। देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने के लिए यह विपक्ष का बड़ा योगदान है।

राहुल ने बिल्कुल सही कहानी सुनाई थी। जादूगर का जादू खत्म हो गया और जादूगर भी खत्म हो गया। खत्म हो गया मतलब उसकी वह कला जगलरी खत्म हो गई।

महिला की आड़ में लाया गया परिसीमन बिल तो गिरा ही प्रधानमंत्री मोदी का खेल भी खत्म हो गया। शनिवार रात साढ़े आठ बजे प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी, समर्थकों, मीडिया और खुद को बहलाने के लिए भाषण दिया। नाम तो इसे राष्ट्र के नाम संबोधन का दिया गया था। मगर राष्ट्र के नाम संबोधन बहुत बड़ी चीज होती है। पूरा देश उत्सुकतापूर्वक सुनता है। देश के लिए कोई प्रेरणा होता है। हर कोई राष्ट्र को संबोधित नहीं कर सकता। यह विशेषाधिकार केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ही होता है।

लेकिन मोदीजी ने शनिवार रात इसे शिकवा शिकायत, रोना सहानुभूति पाने की कोशिश का जरिया बना दिया। प्रधानमंत्री मोदी का अब तक सबसे कमजोर भाषण। और यह हम नहीं कह रहे। उनके समर्थक कह रहे हैं। वे समर्थक जिनमें उत्साह भरने के लिए मोदी ने यह भाषण दिया था। कुछ तो इन्दिरा गांधी को याद कर रहे हैं कि कैसे वे हार को जीत के अवसरों में बदल देती थीं। मगर यह भूल गए कि वे इन्दिरा गांधी थीं। झूठ के मंच पर नहीं खड़ी थीं। उनके सिद्धांत थे, मूल्य थे। प्रगतिशील थीं। पूरे देश को साथ लेकर चलती थीं। नफरत और विभाजन की राजनीति नहीं करती थीं।

उन जैसा करने के लिए अंदर से साहस चाहिए। मोदी वह कहां से लाएंगे? नकारात्मक सोच डर पैदा करता है, हिम्मत नहीं। मगर खैर मोदी इन्दिरा की तरह काम करने लगें सब चाहते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने जैसा डरा रखा है सबसे पहले उससे बाहर निकलें और इन्दिरा गांधी की तरह धमका दें जैसे उन्होंने उस समय के राष्ट्रपति निक्सन को हड़काया था कि भारत को क्या करना है यह तुमसे और पाकिस्तान से सीखने की जरूरत नहीं।

कर पाएंगे या नहीं देखना होगा! लेकिन अगर कर दिया तो अगला राष्ट्र के नाम संबोधन रोने गाने के लिए नहीं देश को गर्व कराने वाला होगा। जो देश चाहता है। संबोधन में पाकिस्तान का नाम तो लिया मगर यह नहीं कह सके कि मेरी विदेश नीति की असफलता की वजह से आज वह दुनिया में केन्द्रीय भूमिका में आ गया है। पाकिस्तान का नाम लिया था तो यह भी बताना था कि उसने कोई बड़ा तीर नहीं मारा है। हमारे विश्व रंगमंच से हटने से उत्पन्न शून्य ने उसे मौका दे दिया।

लेकिन प्रधानमंत्री ने यह सब कुछ नहीं बोला कांग्रेस कांग्रेस और बाकी टीएमसी, डीएमके, सपा को कोसते रहे। सोचिए राष्ट्र के नाम संबोधन में यह होता है? यह पार्टियां तो राष्ट्र का हिस्सा हैं। राष्ट्र के बाहर जिनसे चुनौती है उन पर हमला करना था। पाकिस्तान, चीन, राष्ट्रपति ट्रंप जो कहते हैं कि मैं आपका राजनीतिक कैरियर खतम कर सकता हूं उन पर हमला करना था। जनता खुश होती। मगर यहां तो उल्टे आपके समर्थक दुखी और निराश हो गए।

क्या राहुल गांधी की बात सही साबित हो गई। इतनी जल्दी। पहले भी उनकी कई बातें सही साबित हुई हैं कि किसान बिल वापस लेना पड़ेंगे, जाति गणना करना पड़ेगी। और भी कई। मगर यहां तो इतना तत्काल फल (परिणाम) आ रहा है कि कोई सोच भी नहीं सकता। राहुल की शुक्रवार को लोकसभा में कही दो बातें सही साबित हो गईं। एक उन्होंने कहा था कि अभी आधे घंटे में यहीं इनका दक्षिणी राज्यों के साथ साजिश करने का बिल गिराएंगे। और वाकई वह बिल गिरा दिया।

दूसरा उन्होंने कहा था कि जादूगर का जादू खतम हो गया और खुद जादूगर भी। शनिवार को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद यह भी दिख गया। केवल एक गोदी मीडिया है जो अभी भी प्रधानमंत्री में जादू देख रहा है। वह अभी भी बताने में लगा है कि राहुल कांग्रेस, टीएमसी ममता, डीएमके स्टालिन, सपा अखिलेश सब खत्म हो गए। प्रधानमंत्री के एक भाषण ने इन सबकी राजनीति खत्म कर दी।

मगर गोदी मीडिया के अलावा किसी को नहीं लग रहा कि मोदी में अब बाजी पलटने की क्षमता है।

जिसे महिला बिल कह रहे हैं उसकी असलियत सबकी समझ में आ गई है कि उसका महिलाओं से कोई संबंध नहीं था। वह तो मनमाने ढंग से अपने लिए जीतने वाली सीटें बढ़ाने का परिसीमन बिल था। दक्षिण के राज्यों में सौतेला समझने की भावना फैलाने वाला बिल।

सोचिए भारत की एकता और अखंडता के लिए यह कितना जरूरी है कि दक्षिण के राज्यों में ऐसा कोई संदेश नहीं जाए कि उनकी सीटें कम करने की साजिश हो रही है। उन्हें उत्तर भारत के मुकाबले कमजोर करने की कोशिश हो रही है।

विपक्ष ने इस माहौल को खत्म कर दिया। देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने के लिए यह विपक्ष का बड़ा योगदान है। प्रधानमंत्री महिलाओं की आड़ में अपने राजनीतिक उद्देश्य छुपाना चाह रहे थे। 12 साल बाद भी उन्हें दक्षिण में स्वीकृति नहीं मिली। इसके लिए वाजपेयी की तरह वहां की पार्टियों का नेताओं का विश्वास जीतकर धीरे-धीरे जगह बनाते। लेकिन उन्होंने सीधे दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटें कम करने का षड्यंत्र रच डाला।

राहुल ने पकड़ लिया। क्या इंटेलिजेंट कहानी थी। एकदम सामयिक। जो लोग उस समय लोकसभा में थे वही समझ सकते हैं कि सरकार के मंत्रियों और खुद लोकसभा अध्यक्ष ने राहुल को किस तरह यह कहानी सुनाने से रोकने की कोशिश की। बाहर तो जितना लिमिटेड संसद टीवी से आता है वही दिख रहा था। मगर अंदर प्रेस गैलरी से वह सब दिख रहा था कि किस तरह राहुल का मजाक उड़ाने से लेकर चिल्लाकर उन्हें रोकने, बार-बार व्यवधान करने याने कि हर तरह डिस्करेज करने की कोशिश हुई। राहुल को कई बार बैठ जाना पड़ा। लोकसभा अध्यक्ष ने मर्यादा का पाठ पढ़ाने की कोशिश की। यहां तक बोल गए ओम बिरला कि अगर सत्ता पक्ष इन्हें नहीं रोकेगा तो मैं रोकूंगा।

और सबसे मजेदार बात यह कि राहुल ने एक बार भी प्रधानमंत्री शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था। मोदी नाम लेना तो दूर की बात। केवल मैजिशियन कह रहे थे। लेकिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू और लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि आप प्रधानमंत्री के लिए ऐसा नहीं बोल सकते। राहुल ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री का नाम ही नहीं लिया। मगर सत्ता पक्ष कहता रहा कि मोदी की तुलना जादूगर से करना प्रधानमंत्री का अपमान है। जिनकी समझ में नहीं आ रहा था उनकी भी आ गया कि राहुल मोदी का जादू खतम होने की बात कर रहे हैं।

और शनिवार रात को उनके भाषण के बाद उनके समर्थक भी मान गए कि जादू खत्म हो गया। शब्दों का खोखलापन उजागर हो गया। बहुत नाटकीय भाव भंगिमाएं बनाने की कोशिश की मगर दर्शकों में कोई भावनाएं नहीं जगा पाए।

अब बंगाल और तमिलनाडु में मतदान होना है। 23 अप्रैल को तमिलनाडु में पूरा और बंगाल के पहले फेज का। शनिवार को प्रधानमंत्री इसलिए बार-बार शायद 8-10 बार तो लिया होगा टीएमसी और डीएमके का नाम लिया। इतनी ही बार और ले लेते मगर फिर भी कुछ नहीं होता। तमिलनाडु में कहीं मुकाबले में ही नहीं हैं। बंगाल में भी हार पक्की है।

मोदी की आखरी कोशिश बंगाल पर ही टिकी है। यहां की हार के बाद भाजपा संघ के अंदर भी उनका जादू खत्म होने की घोषणा हो जाएगी।

महिला बिल भाजपा संघ की विचारधारा के अनुकूल नहीं है। अगर होता तो 1989 में जब राजीव गांधी पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल लाए तो राज्यसभा उसका विरोध करके उसे नहीं गिराते। राष्ट्र के नाम संबोधन में भी और उससे पहले अपने लोकसभा के भाषण में भी मोदी पंचायत में महिलाओं के आने का जिक्र कर रहे थे। मगर यह नहीं बता रहे थे कि वह राजीव गांधी की देन थी। भाजपा ने तो विरोध किया था।

ऐसे ही 2010 में महिला बिल राज्यसभा में पास हो गया था। मगर लोकसभा में उनकी महिला ही नेता सुषमा स्वराज ने इसका विरोध किया था। इसलिए बीजेपी संघ मोदी के इस बिल के लाने के पक्ष में नहीं थी। मगर मोदी ने इसे मास्टर स्ट्रोक बताते हुए अचानक बजट सत्र की अवधि बढ़ाकर इसे पेश कर दिया।

मास्टर स्ट्रोक फेल हो गया। बाल सीधे कप्तान राहुल के हाथ में चली गई।

कॉट एंड बोल्ड (Caught and bowled)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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