खाड़ी युद्ध से निपटने की मोदी की तजबीज
मोदीजी ने एक बार फिर राष्ट्र की जनता को उसके कर्तव्यों के प्रति सचेत किया है।;
- प्रेरणा
अलबत्ता, रह-रहकर यह सवाल उठ जाता है कि इस विकास की मार तो हम खा रहे हैं, इस विकास का अमृत कब चखने मिलेगा? हमारे जंगल-जमीन-खनिज बेचकर लाखों किलोमीटर सड़क आपने बनाई और अब जब हमारे चलने का वक्त आया तो कह रहे हैं कि पेट्रोल बचाइए, गाड़ियां कम चलाइए! तो सड़कें बनीं क्यों? एयरपोर्ट तो इसलिए बने थे न कि 'हवाई चप्पलवाला' भी उड़ सके।
मोदीजी ने एक बार फिर राष्ट्र की जनता को उसके कर्तव्यों के प्रति सचेत किया है। कल तक जो चुनाव का सब्ज़बाग दिखाते हुए, मतदाताओं का नाम काटने-जोड़ने का अलोकतांत्रिक खेल खेलने में मशगूल थे, उन्हें चुनाव खत्म होते ही जैसे इल्हाम हुआ है कि देश से देशभक्ति की मांग की जाए। वे दौड़-दौड़कर, चीख-चीखकर सारे बंगाल, असम, केरल, पुडुचेरी की जनता से कह रहे थे कि भाइयो-बहनो, मैं चंगा हूं, देश चंगा है! न गैस कम है, न तेल; वही चुनाव जीतने के बाद देश से कह रहे हैं कि बड़ा संकट सामने खड़ा हुआ है: कुछ 'शपथ' उठाइए, ताकि आप भी बचे रहें, देश भी बचा रहे: पेट्रोल-डीज़ल मत खर्चिए, सोना-चांदी मत खरीदिए, खाने का तेल कम उपयोग कीजिए, दफ़्तर जाना बंद करके 'वर्क फ्रॉम होम' कीजिए, विदेश यात्राएं मत कीजिए और देशी परिवहन व 'मैट्रो' का उपयोग कीजिए। कुल मिलाकर यह कि चुनाव मैंने संभाल लिया, अब देश आप संभालिए!
यह कला सिर्फ मोदीजी जानते हैं: झूठ बोलो, बोलते चले जाओ, फिर झूठ का सच भुगतने के लिए जनता का गला आगे कर दो! 2026 की फ़रवरी की 28 तारीख़ थी, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला किया था। इससे ठीक दो दिन पहले यानी 26 फरवरी को मोदीजी अकारण इजराइल की दो-दिनी यात्रा पर निकल गए। वहां उनके परम मित्र बेंजामिन ने उनको ऐसा गले लगाया कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अज्ञानी तक साबित कर दिया। बेंजामिन ने मोदीजी को भनक तक नहीं लगने दी कि वह दो दिन बाद अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने जा रहा है। अर्थ-व्यवस्था नहीं, अर्थ-कुव्यवस्था का गहरा अंधकार छाया है जो गहराता जा रहा है। मोदीजी जैसों को जब कुछ नहीं सूझता, तब गांधीजी सूझते हैं: मजबूरी का नाम महात्मा गांधी! इसलिए मोदीजी ने संकट की 'शपथों' की सूची जनता के हाथ में थमा दी है।
प्रधानमंत्रीजी 21 वीं सदी की शुरूआत से ही सत्ता के शीर्ष पर विराजते हैं। तब से आज तक हो यह रहा है कि कभी उनके पांव पर कुल्हाड़ी चल जाती है, कभी वे ही अपना पांव उठाकर कुल्हाड़ी पर दे मारते हैं। नोटबंदी से लेकर देशबंदी तक की याद तो होगी भक्तजनों को। और उसके बीच के कई दूसरे आघात? देश को लगातार आपातकाल में रखना और भूखों-लाचारों-बेरोजगारों की भीड़ से त्याग और कर्तव्य की मांग करना मोदीराज का चरित्र व परंपरा बन गई है।
क्या मोदी-राज में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ? जब आपके सामने लगभग 18 लाख किलोमीटर की नई सड़कें पसरी हों, तब आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? प्रतिदिन औसतन 34 किलोमीटर सड़क का निर्माण हुआ है! उन्होंने कहा: 'हवाई चप्पल पहनने वाला भी क्यों न हवाई जहाज़ में चले!' तो हमने पाया कि हवाई जहाज़ उड़ें कि न उड़ें, एयरपोर्ट तो उड़ने ही लगे। आज की तारीख़ में छोटे-बड़े मिलाकर करीब 90 हवाई अड्डे देश में बने हैं और योजना 220 तक पहुंचने की है। 'जीएसटी' हर महीने नए रिकॉर्ड बना रहा है। 2017-18 में जहां औसतन 90 हज़ार करोड़ रुपयों की हर महीने वसूली हुई थी, अब लगभग 1.85 लाख करोड़ की हो रही है। ख़बर है कि अप्रैल 2026 में यह आंकड़ा 2.43 लाख करोड़ रुपयों तक पहुंच गया है।
जानकारों ने सरकार को बताया कि अगर 'जीएसटी' में इतना विकास हो गया तो जनता की आमदनी की नहीं, सरकार की कमाई की चर्चा देश भर में होने लगेगी, तब इस आंकड़े को थोड़ा पीछे खींचकर रेकॉर्ड जमा किया हुआ विदेशी मुद्रा भंडार दिखाया जा रहा है। वही तो देश को थामे हुए है। नहीं तो हालात और बिगड़े हुए हो सकते थे। ऐसा सरकार कह तो रही है, पर रुपया सम्भाले नहीं सम्भल रहा और अब ये 'शपथें!' धड़ाधड़ बनते मेट्रो, स्मार्ट सिटी, एक्सप्रेसवे आदि से दमकता देश विकास का साइनबोर्ड ही तो बन गया है !
एक समय सरकार के मंत्री कहते थे: भारत चीन इसलिए नहीं बन पा रहा, क्योंकि यहां 'टू मच डेमोक्रेसीÓ है। यह समस्या भी काफी हद तक सुलझ चुकी है। सरकार की नज़र में सारी जनता बराबर है, सो पहले मुसलमान युवाओं को 'सबक़' मिलता था, अब मध्यप्रदेश, ओडिशा आदि में सरकारी योजनाओं का विरोध कर रहे हिंदू युवाओं को भी जेल का रास्ता दिखाया जा रहा है। पाकिस्तान को 'घर में घुसकर' कई बार मारा जा चुका है, मंदिर पहले से ज़्यादा भव्य बनते जा रहे हैं; राष्ट्रवाद इतना प्रबल हो चुका है कि नागरिकों को कैसा भी त्याग, कठोर कर्तव्य और महंगा पेट्रोल-गैस-तेल सब स्वीकार है।
अलबत्ता, रह-रहकर यह सवाल उठ जाता है कि इस विकास की मार तो हम खा रहे हैं, इस विकास का अमृत कब चखने मिलेगा? हमारे जंगल-जमीन-खनिज बेचकर लाखों किलोमीटर सड़क आपने बनाई और अब जब हमारे चलने का वक्त आया तो कह रहे हैं कि पेट्रोल बचाइए, गाड़ियां कम चलाइए! तो सड़कें बनीं क्यों? एयरपोर्ट तो इसलिए बने थे न कि 'हवाई चप्पलवाला' भी उड़ सके, अब टिकट के दाम इतने उड़ रहे हैं कि हवाई चप्पलें भी हवाई हो गई हैं! स्मार्ट सिटी, मेट्रो, बुलेट ट्रेन के सामने लोग खड़े नहीं हो पा रहे हैं। गैस, तेल, राशन-पानी, किराया, रोज़मर्रे के खर्च इतने बढ़ गए कि उड़ना तो दूर, टिकना मुश्किल हो रहा है। झुग्गियां जल रही हैं, लोग उजड़ रहे हैं, भूखे शहर चमकेंगे भी तो कितना? स्कूल बंद हो रहे हैं, मंदिर खुल रहे हैं; लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं, गगनचुंबी मूर्तियां बन रही हैं। करोड़ों की लागत से बनी निजी शिक्षा संस्थाएं चीनी माल को अपना बता कर 'आत्मनिर्भर' हुई जा रही हैं। बनारस में मंदिर तोड़कर 'रिवरफ्रंट' बनाया गया है, ताकि धर्म आए, न आए, पर्यटक तो आएं!
पिछले पांच सालों में कच्चे तेल के दाम दुनिया में 116 डॉलर से गिरकर 56 डॉलर प्रति बैरल हुए, फिर वापस 100 डॉलर के पार पहुंच गए, लेकिन मोदीजी के भारत में पेट्रोल कभी 100 रुपये लीटर से कम नहीं हुआ! जब कच्चा तेल 56 डॉलर सस्ता था तब भी तेल कंपनियों को फायदा था, अब जब 100 डॉलर हो रहा है तो एक्साइज टैक्स घटाकर कंपनियों को राहत दी जा रही है। इसे कहते हैं 'सूट-बूट की सरकार'! विकास, उद्योग, शहर, शिक्षा, स्वास्थ्य सब दूसरों के लिए, जनता के लिए त्याग, कर्तव्य, देशभक्ति! सन् 74 से जनता के लिए 'अनुशासन पर्व' ही चल रहा है। हम पूछते हैं तो सिर्फ इतना ही कि यह 'अनुशासन पर्वÓ कभी आपके लिए भी तो आए, सरकार?
(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी-अर्थशास्त्र की अध्येता हैं।)