परीक्षाओं में गड़बड़ियां मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावों पर एक दुखद टिप्पणी
भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का वादा, मोदी सरकार के राजनीतिक संदेशों का एक सबसे लगातार दोहराया जाने वाला विषय बन गया है।;
- के. रवींद्रन
परीक्षाओं से जुड़े ये घोटाले शासन की राजनीतिक संस्कृति में एक परेशान करने वाला रूझान भी उजागर करते हैं। संस्थाएं अक्सर तभी प्रतिक्रिया देती हैं, जब जनता का आक्रोश इतना बढ़ जाता है कि उसे नियंत्रित करना असंभव हो जाता है। स्वीकारोक्ति से पहले इनकार किया जाता है। संकट के बाद ही समितियां गठित की जाती हैं। सुधार के वादे तब किए जाते हैं।
भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का वादा, मोदी सरकार के राजनीतिक संदेशों का एक सबसे लगातार दोहराया जाने वाला विषय बन गया है। इसे राष्ट्रीय पुनरुत्थान के सुबूत के तौर पर पेश किया जाता है।
एक चुनावी नारे के तौर पर इसमें ज़ाहिर तौर पर आकर्षण है। लेकिन राष्ट्रीय प्रगति की असली कसौटी, अर्थव्यवस्था का कुल आकार नहीं है। असली कसौटी यह है कि क्या सरकार निष्पक्ष रूप से काम करती है, क्या सार्वजनिक संस्थानों पर लोगों का भरोसा है, और क्या नियमों की गैर-मौजूदगी में सज़ा पाने के बजाय युवा नियमों द्वारा सुरक्षित महसूस करते हैं?
यही कारण है कि परीक्षाओं को लेकर चल रहे विवाद, प्रशासनिक विफलता से कहीं ज़्यादा गहरी चीज़ पर चोट करते हैं। वे राष्ट्रीय उपलब्धि की बयानबाजी और उन लाखों परिवारों के वास्तविक जीवन के अनुभव के बीच के अंतर को उजागर करते हैं, जो अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सार्वजनिक व्यवस्थाओं पर निर्भर हैं। जिस देश में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता की मुख्य सीढ़ी बनी हुई है, वहां परीक्षा महज़ एक जांच नहीं है। यह अक्सर वर्षों के त्याग की परिणति होती है। माता-पिता अपनी संपत्ति बेच देते हैं, छात्र अत्यधिक मानसिक तनाव झेलते हैं, परिवार शहर बदल लेते हैं, कोचिंग सेंटर घर की जमा-पूंजी खा जाते हैं, और किशोरों पर ऐसी उम्मीदों का बोझ डाल दिया जाता है, जो कई वयस्कों को भी दबा दें। जब ऐसी परीक्षाओं की पवित्रता पर आंच आती है, तो इसका नुकसान सिर्फ़ मार्कशीट या दाखिले तक ही सीमित नहीं रहता। यह नागरिक और सरकार के बीच हुए नैतिक समझौते पर एक हमला होता है।
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) इस टूटन का प्रतीक बन गई है। इसका उद्देश्य उच्च-दांव वाली परीक्षाओं में मानकीकरण, दक्षता और विश्वसनीयता लाना था। इसके बजाय, इसे बार-बार विवादों के केंद्र में धकेल दिया गया है। इसे न्यायिक जांच, जनता के गुस्से और छात्रों के बीच भरोसे में भारी कमी का सामना करना पड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणियों ने उसी बात को ज़ाहिर किया है, जो कई परिवार पहले से ही महसूस कर रहे थे कि जिस संस्था पर युवा नागरिकों के भविष्य की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है, वह लापरवाही, अपारदर्शिता या बचाव की मुद्रा वाले नौकरशाही रवैये के साथ काम नहीं कर सकती। जब उम्मीदवार और माता-पिता निराशा में डूब जाते हैं, जब अनिश्चितता हफ़्तों तक खिंचती रहती है, जब पेपर लीक और गड़बड़ियों के आरोपों का जवाब पहले इनकार से दिया जाता है और बाद में डैमेज कंट्रोल (नुकसान की भरपाई) से, तो विश्वसनीयता को हुए नुकसान की भरपाई करना मुश्किल हो जाता है।
बड़ा मुद्दा यह नहीं है कि क्या टेक्नालॉजी लाई जा सकती है, क्या परीक्षाओं को डिजिटल फ़ॉर्मेट में बदला जा सकता है, या क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल को और ज़्यादा विस्तृत बनाया जा सकता है? ये ज़रूरी सुधार हो सकते हैं, लेकिन ये ईमानदारी का विकल्प नहीं हैं। एक भ्रष्ट कागज़ी प्रक्रिया की जगह एक भ्रष्ट डिजिटल प्रक्रिया ले सकती है। एक दोषपूर्ण मानवीय श्रृंखला की जगह एक दोषपूर्ण तकनीकी श्रृंखला ले सकती है। अगर सिस्टम को डिज़ाइन करने वाले, ठेका देने वाले, निगरानी करने वाले और ऑडिट करने वाले लोग जवाबदेह नहीं हैं, तो टेक्नालॉजी एक और ऐसी परत बन जाती है जिसके पीछे ज़िम्मेदारी छिप सकती है। भारत की शासन-प्रशासन से जुड़ी विफलताएं अक्सर नियमों के न होने की वजह से नहीं, बल्कि नियमों को चुनिंदा तरीके से तोड़ने-मरोड़ने, सुरक्षा उपायों को कमज़ोर करने, और सार्वजनिक संस्थानों को जनता के भरोसे का संरक्षक मानने के बजाय अपनी सुविधा का ज़रिया समझने की प्रवृत्ति से पैदा होती हैं।
सीबीएसई विवाद इसी चिंता को और मज़बूत करता है। पहली नजऱ में जो चीज़ परीक्षा के संचालन या मूल्यांकन में एक तकनीकी विफलता लगती है, उसे महज़ एक दुर्घटना कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, अगर $फैसलों की श्रृंखला कुछ ज़्यादा ही सोची-समझी साज़िश की ओर इशारा करती हो। जब कोई ठेका ऐसी कंपनी को मिलता है जिसे पहले ही ब्लैकलिस्ट किया जा चुका हो, और जब आरोप लगते हैं कि नियमों में इस तरह से बदलाव किए गए जिससे ऐसा नतीजा मुमकिन हो पाया, तो यह मामला महज़ अकुशलता का एक साधारण मामला नहीं रह जाता। यह संस्थागत धोखे का सवाल बन जाता है। क्या शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक खरीद एक ऐसी प्रक्रिया बनकर रह गई है, जहां पात्रता की शर्तों को ढीला किया जा सकता है, सुरक्षा उपायों को नजऱअंदाज़ किया जा सकता है, और नुकसान हो जाने के बाद जवाबदेही को खत्म किया जा सकता है?
यह बात इसलिए मायने रखती है, क्योंकि परीक्षाएं उन कुछ जगहों में से एक हैं जहां आम नागरिकों को अब भी यह उम्मीद होती है कि पैसा, रसूख और पहुंच के ऊपर योग्यता की ही जीत होगी। इस स्तर पर शासन की गुणवत्ता के आधार पर ही इसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सरकार के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि भारत के विशाल आकार के कारण ऐसी असफलताओं से बचना मुश्किल है। भारत की परीक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे जटिल प्रणालियों में से एक है। लेकिन विशाल आकार को लापरवाही का बहाना नहीं बनाया जा सकता। बल्कि, विशाल आकार तो और भी अधिक कड़े सुरक्षा उपायों की मांग करता है, न कि कमज़ोर उपायों की। एक ऐसा देश जो उन्नत डिजिटल भुगतान प्रणालियां बना सकता है, बड़े पैमाने पर कल्याणकारी डेटाबेस लागू कर सकता है, और देशव्यापी राजनीतिक अभियानों का प्रबंधन कर सकता है, वह तब अपनी बेबसी का रोना नहीं रो सकता, जब छात्रों का भविष्य दांव पर लगा हो। प्रशासनिक जटिलता केवल चुनौती को स्पष्ट करती है; यह असफलता का औचित्य सिद्ध नहीं करती।
परीक्षाओं से जुड़े ये घोटाले शासन की राजनीतिक संस्कृति में एक परेशान करने वाला रूझान भी उजागर करते हैं। संस्थाएं अक्सर तभी प्रतिक्रिया देती हैं, जब जनता का आक्रोश इतना बढ़ जाता है कि उसे नियंत्रित करना असंभव हो जाता है। स्वीकारोक्ति से पहले इनकार किया जाता है। संकट के बाद ही समितियां गठित की जाती हैं। सुधार के वादे तब किए जाते हैं, जब परिवार पहले ही चिंता और अपमान झेल चुके होते हैं। ज़िम्मेदारी शायद ही कभी शीर्ष स्तर पर तय की जाती है। जवाबदेही की भाषा का इस्तेमाल तो किया जाता है, लेकिन इसके परिणाम समितियों, जांचों और प्रक्रियागत समीक्षाओं के बीच बंटकर रह जाते हैं।
इसका मानवीय मूल्य बहुत भारी होता है। इन विवादों में फंसे छात्र केवल 'जनसांख्यिकीय लाभांश' के कोई अमूर्त लाभार्थी मात्र नहीं हैं। वे ऐसे युवा हैं, जो अत्यधिक मानसिक दबाव में जी रहे हैं। भारत अक्सर अपनी युवा आबादी को एक आर्थिक लाभ के रूप में देखता है, लेकिन यदि आकांक्षाओं को सही दिशा देने वाली प्रणालियां ही अविश्वास पैदा करने लगें, तो यह लाभ व्यर्थ हो सकता है। एक युवा, जो ईमानदारी से पढ़ाई करता है, लेकिन उसे प्रश्न-पत्र लीक होने, ठेकों में हेरा-फेरी होने या मूल्यांकन की अपारदर्शी प्रणालियां देखने को मिलती हैं, तो वह एक खतरनाक सबक सीखता है कि केवल मेहनत करना ही शायद काफी न हो। यह सबक लोकतांत्रिक आस्था को कमज़ोर करता है। यह निराशावाद को बढ़ावा देता है, परिवारों को निजी कोचिंग पर और भी अधिक निर्भर बना देता है, और उन लोगों के बीच की खाई को और चौड़ा कर देता है, जो अनिश्चितता से सुरक्षा खरीद सकते हैं और जो ऐसा नहीं कर सकते। मोदी सरकार का आर्थिक नज़रिया काफ़ी हद तक महत्वाकांक्षा, पैमाने और राष्ट्रीय आत्मविश्वास पर टिका है। ये चीज़ें महत्वहीन नहीं हैं। देशों को महत्वाकांक्षा की ज़रूरत होती है, और वैश्विक आर्थिक रैंकिंग में भारत का ऊपर उठना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन विकास को सि$र्फ रैंकिंग तक सीमित नहीं किया जा सकता। कोई देश तब प्रगति करता है, जब उसके नागरिक राज्य के साथ अपने रोज़मर्रा के व्यवहार में निष्पक्षता का अनुभव करते हैं। वह तब प्रगति करता है, जब कोई छात्र इस डर के बिना परीक्षा में बैठ पाता है कि कहीं पेपर लीक तो नहीं हो गया; जब उत्तर-पुस्तिका का मूल्यांकन ठीक से होता है; जब कोई ठेका पूरी पारदर्शिता के साथ दिया जाता है; और जब कोई सार्वजनिक संस्था, अदालतों या विरोध-प्रदर्शनों के दबाव के बिना ही, अपनी असफलता को स्वीकार कर लेती है।