ललित सुरजन की कलम से- प्रधानमंत्री की सही लेकिन अधूरी पहल
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि की गाड़ी में लालबत्ती रहे न रहे, इससे क्या फर्क पड़ता है? वे जब भी सडक़ पर निकलेंगे उनके लिए पहले से यातायात रोक दिया जाता है;
'प्रधानमंत्री ने जो ठोस निर्णय लिया वह वीआईपी वाहनों से लालबत्ती हटाने का है। इसका आम जनता पर अनुकूल प्रभाव पड़ा है किन्तु यह भी एक आधी-अधूरी कवायद है। मुझे खुशी है कि इस निर्णय में जो कमियां हैं उनकी ओर जनता का ध्यान गया है और उन पर सोशल मीडिया में तर्कपूर्ण बातें हो रही हैं। सबसे अहम प्रश्न है कि क्या लालबत्ती हटने से अपने आपको वीआईपी मानने वाले नेताओं का घमंड कम हो जाएगा। उत्तर है कि ऐसा होने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है। यह तो हमारे देश की परंपरा है कि जो अपने से कमजोर है उस पर धौंस बनाए रखो।
हमारे जनतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि की गाड़ी में लालबत्ती रहे न रहे, इससे क्या फर्क पड़ता है? वे जब भी सडक़ पर निकलेंगे उनके लिए पहले से यातायात रोक दिया जाता है और वह भी दो-चार मिनट के लिए नहीं, बल्कि कई-कई घंटों तक। मैंने जापान से लेकर अमेरिका तक देखा है कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के लिए कभी भी यातायात दो या तीन मिनट से ज्यादा नहीं रुकता। मेरे जेहन में तो 1970 के दशक के 'द गार्जियन' अखबार में छपी वह तस्वीर आज तक बसी है कि प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ ट्रैफिक जाम में फंस जाने के कारण कार से उतरे और अपना ब्रीफकेस लेकर पार्लियामेंट के लिए पैदल चल पड़े।'
(देशबंधु में 27 अप्रैल 2017 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2017/04/blog-post_27.html