ललित सुरजन की कलम से

'हमें अक्सर यह सुनने मिलता है कि हिन्दी में कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा और कुछ लिखा ही नहीं जाता।;

By :  DB Desk
Update: 2026-05-12 22:00 GMT

'हमें अक्सर यह सुनने मिलता है कि हिन्दी में कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा और कुछ लिखा ही नहीं जाता। इस शिकायत में दम तो है, लेकिन यह बात पूरी तरह सच नहीं है। दरअसल हुआ यह है कि जिस समय में साहित्यिक कृतियों से ही समाज अनभिज्ञ बना हुआ है, उसमें साहित्येत्तर लेखन लोगों तक पहुंचे भी तो कैसे, एक तो नयी पीढ़ी में हिन्दी अथवा भारतीय भाषाओं के साहित्य के प्रति एक तरह से दुराव तथा अवज्ञा का भाव उत्पन्न हो गया है। इसमें दोष युवाओं का नहीं बल्कि उनके अभिभावकों का है, जिन्होंने अपने बच्चों को साहित्य तथा जीवन के अन्य बेहतरीन मूल्यों से विमुख कर उन्हें पैकेज के चक्रव्यूह में ढकेल दिया है। सामान्यजन की बात क्या करें, ऐसे हिन्दी साहित्यकार बिरले ही होंगे जिन्होंने कभी अपने परिवार के सदस्यों, विशेषकर बच्चों के साथ बैठकर साहित्य चर्चा की होगी, बच्चों में हिन्दी के प्रति अनुराग जगाने के प्रयत्न किए होंगे। हम सबको अंग्रेजी से बहुत कोफ्त है, लेकिन बच्चों का करियर बनाने के लिए उन्हें तथाकथित कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने को हम अनिवार्यता मानकर स्वीकार कर लेते हैं।'

(अक्षर पर्व मई 2016 की प्रस्तावना)

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