जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग या 'हिंदू राज' की ओर लंबी छलांग!

जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग, जिसका हाल में गठन किया गया है, इस तरह पहचाने गए संदिग्ध घुसपैठियों को 'डिपोर्ट' करने का रास्ता तैयार करने के लिए है।;

Update: 2026-06-08 21:40 GMT

जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग, जिसका हाल में गठन किया गया है, इस तरह पहचाने गए संदिग्ध घुसपैठियों को 'डिपोर्ट' करने का रास्ता तैयार करने के लिए है। चूंकि यही इस आयोग का मुख्य उद्देश्य है, इसीलिए हैरानी की बात नहीं है कि इस आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के बहुत समय पहले सेवानिवृत्त न्यायाधीश को बनाया गया है, जिसको खुद उसके सार्वजनिक बयान के अनुसार, जनसांख्यिकी के बारे में कुछ अता-पता ही नहीं है।

मोदीशाही के इरादों को समझने के लिए, क्रोनोलॉजी समझना कितना जरूरी है, यह अमित शाह खुद अपने मुंह से बता चुके हैं। सो जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग का मकसद समझने के लिए उसके आगे-पीछे की क्रोनोलॉजी से शुरू करना उपयोगी रहेगा। सभी जानते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपने हिसाब से बड़ी कामयाबी और खासतौर पर प. बंगाल में फतेह का झंडा गाड़ने के फौरन बाद, मई के आखिर में मोदी सरकार ने जनसांख्यिकी परिवर्तन पर उच्च स्तरीय कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया।

इसकी दिशा में बढ़ने की औपचारिक शुरूआत, 2025 के प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषण से हुई थी। लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कथित 'घुसपैठ' से देश के लिए भारी खतरा बताते हुए, ऐसे आयोग के गठन के जरूरी होने का ऐलान किया था। इसकी भी एकदम तात्कालिक क्रोनोलॉजी तो यही थी कि 2025 के अप्रैल के आखिर में पहलगाम में आतंकी हमले ने जब जम्मू-कश्मीर में करीब पांच साल से जारी सीधे केंद्रीय शासन में सब कुछ सामान्य हो जाने के झूठे प्रचार की चिंदियां उड़ा दीं, उसके फौरन बाद ध्यान बंटाने के लिए संघ परिवार की ओर से देश के कई हिस्सों में आम तौर पर मुसलमानों और खासतौर पर कश्मीरियों को निशाना बनाया गया था।

और पहलगाम के 'जवाब' के नाम पर मई के शुरू में छेड़े गए 'आपरेशन सिंदूर' के अचानक रोके जाने के बाद, जब ध्यान बंटाने की जरूरत और ज्यादा बढ़ी, देश के विभिन्न हिस्सों में और सबसे बढ़कर उत्तरी भारत में कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों की पकड़-धकड़ के नाम पर, बांग्लाभाषी मजदूरों के खिलाफ सरकारी अभियान छेड़ दिया गया। इस अभियान में संभवत: पहली बार, पुलिस-प्रशासन द्वारा 'घुसपैठिया' बताए जा रहे लोगों को, बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सीमा के विभिन्न हिस्सों से बांग्लादेश में धकेलने की कार्रवाई भी की गयी, जिसमें कुछ मामलों में तो नौकाओं से ले जाकर समुद्र में धकेल आने की कार्रवाई भी शामिल थी। यह सब किस कदर मनमाना था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कम से कम दो मामलों में, उच्च न्यायालयों द्वारा भारतीय नागरिक ठहराए जाने और देश में वापस लाने का आदेश दिए जाने के बाद, एक गर्भवती महिला और एक अन्य बंगाली मुसलमान को बांग्लादेश से वापस भी लाना पड़ा था। यानी यह वह समय है जब मोदीशाही औपचारिक रूप से देश के पैमाने पर कथित 'घुसपैठिया विरोधी' मुहिम छेड़ती है।

बेशक, 'घुसपैठियों' का खतरा किसी न किसी रूप में हमेशा से आरएसएस के प्रचार का एक केंद्रीय मुद्दा बना रहा है। बहरहाल, अपने पहले कार्यकाल के आखिर तक आते-आते और खासतौर पर उत्तर प्रदेश समेत उत्तरी भारत के भाजपा-शासित राज्यों में गोरक्षा-लव जेहाद-धर्मांतरण विरोधी कानून-समान नागरिक संहिता आदि की मुस्लिम-विरोधी पुकारों की आजमाइश से, मोदीशाही इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि आक्रामक मुस्लिमविरोधी पहचान ही उसकी नैया पार लगाएगी। दूसरे कार्यकाल की शुरूआत में ही, संवैधानिक छल-कपट का सहारा लेकर, पहले आरएसएस की बहुत पुरानी मांग को पूरा करते हुए, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ही नहीं राज्य का दर्जा भी खत्म कर, देश के इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य को सजा देने के जरिए, राज्य की नजरों में मुसलमानों का ही दर्जा कमतर करने का संदेश दिया गया। और इसके फौरन बाद सीएए लाकर, मुस्लिम और गैर-मुस्लिम अवैध प्रवासियों में अंतर करने जरिए, मुसलमानों के पराया होने के ऐलान को भारतीय नागरिक की परिभाषा में भी रोप दिया गया। अब परिभाषा से ही 'घुसपैठिया'—जिससे कि खतरा था— मुसलमान ही हो सकता था। हिंदू तथा अन्य धर्म के अवैध प्रवासियों के लिए तो भारतीय नागरिकता आसान बनाकर, उनका स्वागत किया जाना था!

यहीं से आरएसएस के घुसपैठ के पुराने राग को वर्तमान शासन की विचारधारा के रूप में नयी ऊंचाई पर पहुंचाने की शुरूआत होती है। सीएए के व्यापक जनतांत्रिक विरोध को मोदीशाही अपने दमनतंत्र के सहारे तो पूरी तरह से नहीं कुचल सकी, पर उसका जवाब उसने मुस्लिमविरोधी आक्रामकता बढ़ाने के जरिए दिया। खासतौर पर बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव के समय, गृहमंत्री अमित शाह ने न सिर्फ चर्चित तरीके से अपने राज की क्रोनोलॉजी समझायी कि कैसे पहले सीएए से मुसलमानों को नागरिकता अधिकार से परे कर के 'घुसपैठिया' बनाया जाएगा और फिर, हिंदुओं आदि अन्य को नागरिकता दी जाएगी, बल्कि उन्होंने कहा कि घुसपैठिये 'दीमक हैं, उन्हें चुन-चुनकर, एक-एक को निकाल बाहर करेंगे।' बंगाल से ही इस घुसपैठिया राग को संघ-भाजपा के प्रचार की मुख्य थीम बनाने की शुरूआत हुई, जिसे 2024 के आम चुनाव तक आते-आते मोदीशाही ने देश के पैमाने पर प्रचार की अपनी एक मुख्य थीम बना लिया। बेशक, इस आम चुनाव में मोदी खुद खासतौर पर मतदान के शुरूआती चरणों में बिहार, बंगाल, झारखंड में घुसपैठियों के खतरे के राग से शुरूआत करने के बाद, बाजी हाथ से निकलती नजर आने की हताशा में जल्द ही, विरोधी 'मंगलसूत्र छीन लेंगे और ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों (मुसलमानों) के दे देंगे' पर पहुंच गए, जबकि आदित्यनाथ जैसे उनकी पार्टी के अन्य प्रमुख प्रचारक 'बंटोगे तो कटोगे' के अपने नारों के साथ, सीधे मुस्लिमविरोधी नारों से शुरूआत ही कर रहे थे।

इसके बाद भी जब सत्ता संघ-भाजपा के हाथ से जाती-जाती बची, एक ओर चुनाव आयोग पर पूरी तरह से कब्जा करने के जरिए, चुनावों को ही मैनिपुलेट करने के मुकम्मल इंतजामात किए गए, जिनमें मतदाता सूचियों को ही सत्ताधारी पार्टी के फायदे के हिसाब से काटना-छांटना-उनमें नाम जोड़ना खास है, तो दूसरी ओर वक्फ संशोधन कानून लाने तथा समान नागरिक संहिता की चर्चा देश के स्तर पर लाने के जरिए, मौजूदा सत्ता के मुस्लिमविरोधी चेहरे को और चमकाया गया। इस दौरान, सिर्फ गोरक्षा के नाम पर ही नहीं, किसी भी बहाने से और बहुत बार तो बिना बहाने के मुसलमानों की लिंचिंग से लेकर, शासन के व्यवहार में भेदभाव तक, सब को सामान्य बनाया ही जा चुका था। इसी सब की पृष्ठïभूमि में 2025 के 15 अगस्त के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने राष्टï्र की सुरक्षा, संस्कृति, धर्म, सब के लिए 'जनसांख्यिकी परिवर्तन के खतरे' का बखान किया था और उससे निपटने के लिए उच्चस्तरीय आयोग की जरूरत का ऐलान किया था।

इससे कुछ पहले ही, उनके शासन की चिंताओं और धारणाओं से संचालित चुनाव आयोग मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) की घोषणा कर चुका था, जिसका असली मकसद मतदाता सूचियों के कथित रूप से भर गयी, 'घुसपैठियों' की विशाल संख्या की छंटनी करना बताया जा रहा था। हैरानी की बात नहीं है कि एसआईआर को शुरू से ही खासतौर पर मुसलमान मतदाताओं की नागरिकता की जांच में बदल दिया गया। लेकिन, बिहार में जहां से एसआईआर की प्रक्रिया की शुरूआत हुई, इस प्रक्रिया ने दस फीसद के करीब मतदाताओं की छंटनी तो कर दी, पर घुसपैठियों की पहचान तथा छंटनी करने में पूरी तरह से विफल ही रही। वहां मुसलमान तो मिले और कुछ इलाकों में काफी मिले, पर उन्हें घुसपैठिया साबित नहीं किया जा सका।

इसीलिए, एसआईआर के अगले चरण में और खासतौर पर प. बंगाल में चुनाव आयोग ने, एसआईआर में ही सुधार कर लिया और'तार्किक विसंगति' की अनोखी श्रेणी का आविष्कार कर, खासतौर पर सुनिश्चित किया कि मुसलमान जैसे लगने वाले नामों को छांटकर संदिग्ध घुसपैठियों के खाने में डाला जाए। इसी का नतीजा, न सिर्फ 27 लाखों के जिनमें मुसलमानों का फीसद बहुत ज्यादा है, न्यायाधीन होते हुए भी मताधिकार से वंचित किए जाने के रूप में सामने आया बल्कि 72 चुनाव अधिकारियों के ही सिर्फ इसलिए मताधिकार से वंचित कर दिए जाने के रूप में भी सामने आया कि वे सभी मुसलमान थे।

इस तरह, गृहमंत्री अमित शाह बार-बार, तथाकथित घुसपैठियों के लिए अपने राज की जिस 'डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट' नीति का ऐलान करते रहे हैं, उसके डिटेक्ट और डिलीट के पहले दो चरण मोदीशाही के अंगूठे के नीचे दबे चुनाव आयोग ने एक प्रकार से संभाल लिए हैं। पर इसमें एक समस्या है। चुनाव आयोग भी ईमानदारी से डिटेक्ट करे, तो उसे किसी उल्लेखनीय संख्या में वास्तविक घुसपैठिए नहीं मिलेंगे। क्यों? क्योंकि बड़े पैमाने पर विदेशी घुसपैठ और उसमें भी मुसलमानों की घुसपैठ, एक मिथक है, जो आरएसएस के सांप्रदायिक प्रचार से निकला है। उल्टे बांग्लादेश की स्थापना के समय की उथल-पुथल के बाद से, वहां से अवैध रूप से आकर भारत में बसने वालों में हिंदुओं की ही संख्या ज्यादा है। दूसरी ओर, आमतौर पर बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए ऐसे देश में जाकर बसने का क्या आकर्षण हो सकता है, जिसकी प्रतिव्यक्ति आय तथा मानव विकास का दर्जा, उनके अपने देश से कुछ न कुछ नीचे ही है और जहां मुसलमानों के लिए असुरक्षा बढ़ती जा रही है। इस सच्चाई के सामने यही आसान और वर्तमान सत्ताधारियों के लिए उपयोगी है कि घुसपैठिया और मुसलमान को समानार्थी बना दिया जाए।

और जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग, जिसका हाल में गठन किया गया है, इस तरह पहचाने गए संदिग्ध घुसपैठियों को 'डिपोर्ट' करने का रास्ता तैयार करने के लिए है। चूंकि यही इस आयोग का मुख्य उद्देश्य है, इसीलिए हैरानी की बात नहीं है कि इस आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के बहुत समय पहले सेवानिवृत्त न्यायाधीश को बनाया गया है, जिसको खुद उसके सार्वजनिक बयान के अनुसार, जनसांख्यिकी के बारे में कुछ अता-पता ही नहीं है। अन्य सदस्यों में भी सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस अफसरों से लेकर, जनगणना आयुक्त तथा एक अर्थशास्त्री तक को रखा गया है, पर जनसांख्यिकी के एक भी जानकार को शामिल नहीं किया गया। जनसांख्यिकी का जानकार, न सिर्फ इस गुब्बारे को ही पंचर सकता था बल्कि जनसांख्यिकी से जुड़ी वास्तविक चिंताओं को सामने ला सकता था, जैसे देश की प्रजनन दर का आबादी की पूरी भरपाई की दर से नीचे जाना, आबादी में बुुजुर्गों का बढ़ता हिस्सा आदि, जो गंभीर नीतिगत विचार तथा बदलावों की मांग करती हैं। इस आयोग के मकसद में अगर किसी को संदेह हो भी तो इस तथ्य से दूर हो जाना चाहिए कि आयोग की विचार शर्तों में 'अवैध आप्रवास' से निपटने की जरूरत को प्रमुखता दी गयी है। और अमित शाह ने इस कदम के सिलसिले में बाकायदा बयान दिया है कि, 'अवैध घुसपैठ तथा अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव के दूसरे कारण, किसी राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए, एक बहुत बड़ी चुनौती हैं।'

अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव के 'दूसरे कारण' का इशारा लगता है कि मुसलमानों की कुल प्रजनन दर की ओर है, जिसके खतरा माने जाने के निहितार्थ और भी अनिष्टïकर लगते हैं। क्या इस आयोग का उपयोग, डिपोर्ट होने से बच गए मुसलमानों के अधिकारों को और कमतर करने का रास्ता बनाने लिए किया जाएगा? पर इसकी चर्चा फिर कभी और।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)

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