ललित सुरजन की कलम से चीन, ओबोर और भारत

'चीन ने भारत के जले पर नमक छिड़कने का काम बीजिंग शिखर सम्मेलन के अगले ही दिन किया।

Update: 2026-03-22 22:00 GMT

'चीन ने भारत के जले पर नमक छिड़कने का काम बीजिंग शिखर सम्मेलन के अगले ही दिन किया। विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता सुश्री हुआ चुनयिंग ने 16 मई को प्रेस वार्ता में कहा कि चीन के दरवाजे भारत के ओबोर में शामिल होने के लिए सदैव खुले हुए हैं। भारत जब भी चाहे वह इस परियोजना में साथ आ सकता है। प्रवक्ता ने भारत के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया पर भी कटाक्ष किया कि वे अर्थपूर्ण संवाद की बात करते हैं। संवाद संवाद है, इसमें अर्थपूर्ण का क्या आशय है, हम नहीं जानते। चीन का यह बयान भारत को अवश्य कड़वा लगा होगा। दरअसल, हमें यह अनुमान ही नहीं था कि बीआरआई महासम्मेलन को ऐसी सफलता मिलेगी। कुछेक पर्यवेक्षकों के अनुसार भारत का पांसा उल्टा पड़ गया। उसे उम्मीद न थी कि जिन अमेरिका और जापान के साथ मिलकर वह चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिशों में लगा है, वे ही सम्मेलन में अपने उच्चस्तरीय शिष्टमंडल भेज देंगे। श्रीलंका के प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघ ने भी स्पष्ट कहा है कि प्रस्तावित समुद्री रेशम मार्ग के निर्माण में उनका देश अपने लिए महत्वपूर्ण संभावना देख रहा है। यह वक्तव्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया श्रीलंका यात्रा के तुरंत बाद ही आया। नेपाल तो ओबोर को अंदरूनी मामलों में भारत को रोकने के उपाय के रूप में देख रहा है।'

(देशबन्धु में 25 मई 2017 को प्रकाशित)

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