सरकारी स्कूलों की चुनौतियां और बदलता शिक्षा परिदृश्य
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति, सामाजिक गतिशीलता और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण की आधारशिला है।;
- अरुण कुमार डनायक
शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण की आधारशिला है। अत: नीतिगत बदलाव के नाम पर अव्यवहार्य योजनाओं को पुनर्जीवित करने और पाठ्यक्रम से छेड़छाड़ करने के बजाय, मौजूदा स्कूल अधोसंरचना, शिक्षक क्षमता और शिक्षण गुणवत्ता में निरंतर निवेश करना अधिक आवश्यक है।
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति, सामाजिक गतिशीलता और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण की आधारशिला है। शिक्षा पर जीडीपी का 6प्रतिशत व्यय करने की दशकों पुरानी सिफ़ारिश के बावजूद भारत अभी भी लगभग 4.6प्रतिशत पर अटका हुआ है। यह निवेश अंतर सीखने की गुणवत्ता को सीमित करने के अलावा भारत की प्रगति की गहराई, समावेशिता और दीर्घकालिक स्थिरता पर भी संरचनात्मक बाधाएं खड़ी करता है।
नीति आयोग की मई 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय स्कूली शिक्षा संरचनात्मक असंतुलन, अवसंरचना की कमी, शिक्षक संकट और शासन कमजोरियों से जूझ रही है। देश में 7.3 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं, जबकि उच्चतर माध्यमिक स्तर पर यह संख्या घटकर मात्र 1.42 लाख रह जाती है। प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक तक निरंतर शिक्षा देने वाले स्कूलों की कमी के कारण छात्रों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है, जिससे ग्रामीण, गरीब और बालिका विद्यार्थियों की शैक्षणिक निरंतरता प्रभावित होती है। कई विद्यालय न्यूनतम नामांकन के कारण आर्थिक व प्रशासनिक रूप से अप्रभावी हैं। कुछ विद्यालयों में नामांकन न होने के बावजूद वे प्रशासनिक संरचना में बने हुए हैं, जिससे संसाधनों की दक्षता पर प्रश्न उठते हैं। एक गंभीर समस्या एकल-शिक्षक विद्यालयों की है — देश में एक लाख से अधिक स्कूलों में एक ही शिक्षक को शिक्षण के साथ प्रशासनिक दायित्व भी निभाने पड़ते हैं, जिससे गुणवत्ता प्रभावित होती है।
अवसंरचना के स्तर पर पिछले वर्षों में सुधार के बावजूद स्थिति अभी भी चिंताजनक है। नीति आयोग के अनुसार लगभग 1.19 लाख विद्यालयों में बिजली उपलब्ध नहीं है। 14,505 विद्यालयों में पीने के पानी की सुविधा नहीं है और लगभग 60,000 विद्यालयों में हाथ धोने की व्यवस्था नहीं है। बालिका शिक्षा के लिए शौचालयों की कमी गंभीर है। करीब 98,592 स्कूलों में कार्यशील बालिका शौचालय नहीं हैं, जिससे किशोरियों की उपस्थिति और निरंतरता प्रभावित होती है।
विज्ञान शिक्षा कमजोर है— मात्र 51.7 प्रतिशत सरकारी माध्यमिक स्कू लों में कार्यात्मक प्रयोगशालाएं हैं। पुस्तकालय मुख्यत: भंडारण तक सीमित हैं। डिजिटल अवसंरचना की असमानता, विशेषकर बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में, नई शिक्षा नीति के लक्ष्यों को प्रभावित कर रही है। राष्ट्रीय शिक्षण आकलन रिपोर्टें दर्शाती हैं कि अनेक विद्यार्थी कक्षा के अनुरूप पढ़ने और गणितीय दक्षता हासिल नहीं कर पा रहे हैं इसलिए केवल नामांकन नहीं, सीखने की गुणवत्ता सुधारना भी आवश्यक है।
बालिकाओं के नामांकन में बढ़ोतरी के बावजूद, घरेलू काम, बाल विवाह, सुरक्षा, परिवहन और सुविधाओं की कमी के चलते माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर अधिक बनी हुई है। प्रवासी बच्चों की स्थिति बदतर है, वे भाषा, दस्तावेजों की कमी और बार-बार स्कूल बदलने से शिक्षा से वंचित हो जाते हैं। शिक्षकों में पर्याप्त जागरूकता व प्रशिक्षण के अभाव के कारण सीखने की अक्षमताएं—जैसे डिस्लेक्सिया और डिस्कैल्कुलिया—अक्सर पहचान से बाहर रह जाती हैं।
भारतीय शिक्षा प्रशासन केंद्र, राज्य, जिला, ब्लॉक और पंचायत स्तरों पर विभाजित है। बहु-स्तरीय प्रशासन में भूमिकाओं की अस्पष्टता और ओवरलैप से निर्णय-प्रक्रिया धीमी हो जाती है। कई राज्यों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं। विद्यालय प्रमुखों की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर होती है, न कि नेतृत्व क्षमता पर। निरीक्षण प्रणाली शिक्षण गुणवत्ता की अपेक्षा कागजी अनुपालन तक सीमित रहती है। शिक्षक गैर-शैक्षणिक कार्यों (सर्वेक्षण, चुनाव ड्यूटी आदि) में व्यस्त रहते हैं, जिससे वास्तविक शिक्षण समय कम हो जाता है।
इन चुनौतियों से परेशान अभिभावक निजी स्कूलों की ओर तेजी से जा रहे हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों का नामांकन 2005 के 71प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 49प्रतिशत रह गया है, जबकि निजी स्कूलों की माध्यमिक स्तर पर हिस्सेदारी 44 प्रतिशत पहुंच गई है। अभिभावक बेहतर अंग्रेजी, अनुशासन और बालकों के भविष्य की उम्मीद में निजी स्कूल चुनते हैं, लेकिन निजी विद्यालयों में भी सीखने के परिणाम कमजोर हैं। कई स्कूल निर्धारित मानकों का पालन नहीं करते तथा निगरानी भी अपर्याप्त है। यह रुझान सरकारी कमियों के साथ-साथ अभिभावकों की बढ़ती आकांक्षाओं और सामाजिक-आर्थिक दबावों का संकेत भी है।
सरकार ने इन चुनौतियों को देखते हुए कुछ कदम उठाये हैं। जवाहर नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर पीएम श्री योजना के अंतर्गत 14,500 स्कूलों को आधुनिक, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी-सक्षम और हरित आदर्श विद्यालयों के रूप में विकसित किया जा रहा है। 27,360 करोड़ रुपये के निवेश से 5 वर्षों में 18 लाख छात्रों को लाभ होने की उम्मीद है, हालांकि कार्यान्वयन राज्यों में असमान है।
नीति आयोग ने 2017 में झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश में सतत कार्रवाई-शिक्षा (एसएटीएच-ई) परियोजना शुरू की, जिसका उद्देश्य शैक्षणिक एवं प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से सीखने के परिणामों में सुधार लाना था। प्रारंभिक चरण में 15-18प्रतिशत तक सुधार तथा कम नामांकन वाले हजारों विद्यालयों के विलय जैसे सकारात्मक परिणाम सामने आए। इसी प्रकार राजस्थान सहित कुछ राज्यों ने भी अपने स्कूल रेशनलाइज़ेशन कार्यक्रम के तहत बिखरे और कम नामांकन वाले विद्यालयों को एकीकृत कर बेहतर संसाधनों वाले बड़े विद्यालयों में परिवर्तित किया, जिससे शिक्षक तैनाती और अवसंरचना में सुधार हुआ। हालांकि, इन पहलों का प्रभाव सीमित और असमान रहा। राज्यों की प्रशासनिक क्षमता की कमजोरी, शिक्षक रिक्तियां, ग्रामीण विरोध, संस्थागत सीमाएं तथा कोविड-19 जैसी बाधाओं ने इनके दीर्घकालिक और व्यापक प्रभाव को बाधित किया।
2016 से शुरू अटल टिंकरिंग लैब्स का उद्देश्य छात्रों को नवाचार आधारित प्रयोगों से जोड़ना था, लेकिन जटिल प्रक्रिया, संसाधन और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी से कई सरकारी विद्यालय इसका लाभ नहीं उठा सके। बेहतर अवसंरचना के कारण निजी विद्यालयों ने इसका अधिक लाभ उठाया, जबकि सरकारी स्कूलों में यह पहल विज्ञान प्रयोगशालाओं की मूलभूत कमी दूर करने में सीमित रही।
इन सभी पहलों का सार यह है कि सरकार शिक्षा प्रणाली को अधिक आधुनिक, सक्षम और परिणाम-उन्मुख बनाने के लिए प्रयासरत है। मॉडल स्कूलों का निर्माण, राज्यों के साथ साझेदारी और विद्यालयों का पुनर्गठन जैसे कदम शिक्षा सुधार की दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं। हालांकि, पिछले अनुभवों से पता चलता है कि ये प्रयास अक्सर नीतिगत दस्तावेजों तक सीमित रह जाते हैं और ज़मीनी स्तर पर प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाते। यही कारण है कि विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था अभी भी कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है।
परिवर्तन के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षक प्रशिक्षण, समावेशी नीतियां और पारदर्शी शिक्षा शासन अत्यंत आवश्यक हैं। इसलिए इन सुधारों को व्यापक, गहन और टिकाऊ रूप देना समय की मांग है।
शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण की आधारशिला है। अत: नीतिगत बदलाव के नाम पर अव्यवहार्य योजनाओं को पुनर्जीवित करने और पाठ्यक्रम से छेड़छाड़ करने के बजाय, मौजूदा स्कूल अधोसंरचना, शिक्षक क्षमता और शिक्षण गुणवत्ता में निरंतर निवेश करना अधिक आवश्यक है।
(लेखक एवं समाजसेवी )