रोजी-रोटी भी देती हैं नदियां
सतपुड़ा की नदियां वनजा हैं, हिमजा नहीं। यानी उनका जलस्त्रोत वन हैं, जबकि उत्तर भारत की सारी नदियां हिमालय से निकलती हैं।;
सतपुड़ा की नदियां वनजा हैं, हिमजा नहीं। यानी उनका जलस्त्रोत वन हैं, जबकि उत्तर भारत की सारी नदियां हिमालय से निकलती हैं। यानी हिमजा हैं, बर्फ है। एक समय में सतपुड़ा में घना जंगल हुआ करता था, जो अब नहीं है। मैदानी क्षेत्र का जंगल कम हो गया है। इसका असर नदियों पर भी दिखाई देता है। इन नदियों के किनारे रहने वाले केंवट, बरौआ, मांझी और कहार समुदाय के लोग जो नदियों में मछली पकड़ते थे, अब नदियों के सूखने से परेशान हैं।
बारिश का मौसम आ गया है। सूखी नदी-नाले, तालाब और कुओं में पानी बढ़ गया है। नदियां, जो गर्मी में सूख जाती हैं, गायब हो जाती हैं, बारिश आते ही फिर से बहने लगती हैं। जैसे कोई गुम हुआ व्यक्ति अचानक से मिल जाता है, वैसी ही सुखद अनुभूति इन्हें देखकर होती है। मछुआरों की चहल-पहल बढ़ जाती हैं, क्योंकि नदी उनकी रोजी-रोटी भी है। उनकी आजीविका है। आज इसी परिप्रेक्ष्य में नदी को देखने की कोशिश करेंगे, जिससे नदी को समग्रता में समझा जा सके।
अगर मैं बचपन को याद करूं तो उस समय नदियां सदानीरा थीं, बारह महीनों बहती थीं। मध्यप्रदेश के सतपुड़ा अंचल, जहां मेरा बचपन बीता है, वहां पिछले कुछ सालों में कई नदियां सूख गई हैं। लगातार सूखा या कम बारिश के कारण कई बारहमासी नदियां अब बरसाती नालों में बदल गई हैं। दुधी, मछवासा, पलकमती, शक्कर, छींगरी जैसी नदियां या तो सूख गई हैं या सूखने के कगार पर हैं।
हमारे गांव में दुधी नहीं थी। गांव में ऐसे मछुआरे भी थे, जो सुबह से मछली पकड़ने जाते थे और मछली लाकर पका कर खुद खाते थे, और मोहल्ले व आसपास बेचते थे। वह उनके पोषण व आजीविका दोनों की स्रोत हुआ करती थी। बच्चों के लिए नदी, बहुत ही यादगार होती है।
यहां की बात करें तो सतपुड़ा पहाड़ से कई छोटी नदियां निकलती हैं, और नर्मदा नदी में मिलती हैं। ये सभी नदियां, जो नर्मदा जैसी बड़ी नदियों का पेट भरती थीं, अब या तो दम तोड़ रही हैं। इनका असर नर्मदा पर भी है, अब इसे गर्मी के मौसम में पैदल ही पार किया जा सकता है। जबकि पहले नाव से पार करना पड़ता था।
नदियां और पहाड़ मानव को हमेशा से आकर्षित करते रहे हैं। नदियों के किनारे ही सभ्यताएं पल्लवित-पुष्पित हुई हैं। संस्कृतियां विकसित हुई हैं। कवि, साहित्यकार और ऋ षियों ने भी नदियों की महिमा का बखान किया है। इन नदियों के किनारे कभी सभ्यताएं पल्लवित-पुष्पित हुई हैं।
सतपुड़ा की नदियां वनजा हैं, हिमजा नहीं। यानी उनका जलस्त्रोत वन हैं, जबकि उत्तर भारत की सारी नदियां हिमालय से निकलती हैं। यानी हिमजा हैं, बर्फ है। एक समय में सतपुड़ा में घना जंगल हुआ करता था, जो अब नहीं है। मैदानी क्षेत्र का जंगल कम हो गया है। इसका असर नदियों पर भी दिखाई देता है।
इन नदियों के किनारे रहने वाले केंवट, बरौआ, मांझी और कहार समुदाय के लोग जो नदियों में मछली पकड़ते थे, अब नदियों के सूखने से परेशान हैं। ये लोग मछली पकड़ने के अलावा, किश्ती चलाना और नदी की रेत में डंगरबाड़ी (तरबूज-खरबूज की खेती ) भी करते थे। नर्मदा के बांधों से समय-असमय पानी छोड़ने के कारण नदियों के किनारे जो तरबूज-खरबूज की खेती होती थी, वह भी अब नहीं हो पा रही है।
आखिर नदियों का पानी गया कहां? क्यों सूख रही हैं नदियां? एक तो जंगल कम हो रहे हैं। सतपुड़ा और खासतौर से नर्मदा कछार में काफी घने पेड़ पौधे और झाड़ियां हुआ करती थीं। पेड़, पानी को संभालकर रखते हैं। बारिश के पानी पेड़ अपने सिर यानी पत्तों पर झेलते हैं। पत्तों से बांह यानी डाली पर पानी आता है और डालियों से होता हुआ तने से जड़ों में चला जाता है। पेड़ों के आसपास दीमक वगैरह मिट्टी को पोली और भुरभुरी बनाते हैं। जिससे पानी नीचे जमीन में चला जाता है जिससे धरती का पेट भरता है।
इसी प्रकार पहले गांवों में कच्चे मकान होते थे। मकान बनाने के लिए भी मिट्टी वहीं घर के आसपास से लेते थे। मिट्टी निकालने से गड्ढा बन जाता था। फिर मकानों के आगे-पीछे बाड़ी होती थी। घर का कचरा फेंकने के लिए घूरा (कचरा फेंकने का स्थान) होता था। इन सबमें भी पानी एकत्र होता था और नीचे जमीन में समा जाता था। लेकिन अब मकान गांवों में पक्के बनने लगे। सड़कें और नालियां भी पक्की बनने लगी, इसलिए पानी अब नीचे नहीं जाता।
रासायनिक खेती में ज्यादा प्यासे बीजों के आने से भी नदियों के भू-पृष्ठ के पानी को खींचा ही जा रहा है। सीधे नदियों से डीजल इंर्जन या बिजली के मोटर पंपों के माध्यम से पानी उलीचा जा रहा है। दूसरा नदियों के तटों पर जो कुहा (अर्जुन), खकरा (पलाश), गूलर और छोटे बड़े पौधे दूब तथा घास होती थी, तटों के आसपास जो पड़त भूमि होती थी। इससे मिट्टी-पानी का पोषण भी होता है।
देसी बीजों को बचाने में लगे बाबूलाल दाहिया कहते हैं कि जब बारिश के मौसम में नदियों में जब ज्यादा पानी होता है वैसे ही मछलियां ऊपर की ओर हवाई जहाज की तरह पहाड़ों में चढ़ जाती हैं और फिर वहां से तालाबों और खेतों में फैल जाती हैं। वे वहां इसलिए जाती हैं क्योंकि वहां उन्हें भोजन मिलता है। वहां कीड़े-मकोड़ों की बहुतायत होती है।
वे बताते हैं कि पूरी भोजन श्रृंखला बनी हुई है। जलपक्षी मछलियों को खाते हैं। उन्हें सियार लोमड़ी खाते हैं। बाज-सांप खाते हैं। लेकिन जबसे रासायनिक खेती होने लगी है और उसमें बेतहाशा रासायनिक खादों व कीटनाशकों का इस्तेमाल होने लगा है तबसे यह श्रृंखला टूटी है। अब मछलियां मर रही हैं।
ग्रामीण मछलियां कम होने के दो कारण और बताते हैं। एक तो अब मछलियों का शिकार जहरीले रसायनों से किया जाता है जिससे नदी की मछलियों के साथ जीव-जंतु भी मर जाते हैं। इन मछलियों को भोजन के रूप में खाने से लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। दूसरा कारण उथले पानी में मछलियां नहीं रहतीं उन्हें गहरा पानी चाहिए। फिर नदियों के किनारे छायादार पेड़ होते थे, जिनके नीचे मछलियां रहती थी, वो कट गए। जगह-जगह कुंडे गहरे गड्ढे होते थे वह भी अब नहीं रहे।
नर्मदापुरम (पूर्व में होशंगाबाद कहलाता था) और नरसिंहपुर जिले की सीमा विभक्त करने वाली दुधी नदी अब सूख चुकी है। इसके किनारे रहने वाले केंवट, बरौआ और रज्झर समुदाय के लोग नदी में मछली पकड़ते थे, अब बेरोजगार हो गए हैं। यह बारहमासी नदी थी, जो बरसाती नाले में बदल गई है।
यहां के एक मछुआरों का कहना है कि अब दुधी की धार छिटककर बहुत दूर हो गई है। पहले यह नदी बारह महीनों बहती थी। गांव के लोगों का निस्तार होता था। गाय-बैल पानी पीते थे। तीज-त्यौहार पर मेला जैसा लगता था। अब नदी में सन्नाटा पसरा रहता है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पर्यावरण का संकट गरीब समुदायों की रोजी-रोटी छीन रहा है। नदियां सूखने से सबसे गरीब मछुआरों की आजीविका संकट में है। इसलिए हमें नदियों को पानीदार बनाने के बारे में सोचना चाहिए। हमें मिट्टी, पानी, पेड़ और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है। नदियों के तटों के किनारे वृक्षारोपण करना चाहिए। उन्हें प्रदूषण-मुक्त करना चाहिए। जिससे पर्यावरण की रक्षा के साथ उन समुदायों की आजीविका भी सुनिश्चित होगी, जो उस पर निर्भर है। इससे नदियां भी सदानीरा होंगी और मछुआरों की आजीविका भी बचेगी। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए?