शब्दों की अधिकता से परहेज की कविताएं : उम्मीद प्रेम का अन्न है

इस तरह यह कह सकते हैं कि इस संग्रह की कविताएं अत्यंत मार्मिक, प्रेम में भीगी, और संवेदना के धरातल पर जाकर बिम्बों और उपमाओं को महसूस करने वाली कविताएं हैं

By :  Deshbandhu
Update: 2026-01-10 21:39 GMT
  • राजेश सक्सेना

इस तरह यह कह सकते हैं कि इस संग्रह की कविताएं अत्यंत मार्मिक, प्रेम में भीगी, और संवेदना के धरातल पर जाकर बिम्बों और उपमाओं को महसूस करने वाली कविताएं हैं। कुछ पाठक इन्हें क्षणिकाएं भी कह सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि क्षणिकाओं के गंतव्य प्राय: एक होते हैं किन्तु इन कविताओं में मुझे एक से अधिक गंतव्य दिखाई देते हैं। इस तरह ये कविताएं विविधता रखते हुए अपनी जगह बनाती हैं।

उम्मीद, और प्रेम दोनों ही मानव समाज की ऐसी अनुभूतियाँ हैं कि इनके प्रवाह में मनुष्य अपनी निर्मिति के विभिन्न पहलुओं और सामाजिक बोध की अवस्थाओं को एक आकार या मुकाम देता है, लेकिन जब इससे भी आगे जा कर कोई यह कहे कि उम्मीद, प्रेम का अन्न है तो यह बात फिर प्रेम को रोपकर अभिसिंचित करने वाले तत्व का नाम उम्मीद ही उसका अन्न हो जाता है जो उसके पोषण का काम करता है, उम्मीद को इस तरह देखने और समझने का प्रयास करने वाले कवि अनुराग वत्स के कविता संग्रह 'उम्मीद प्रेम का अन्न है' की कविताएं उम्मीद की कविताएं हैं!

अनुराग वत्स की इन कविताओं में शब्द शोर नही करते वहाँ कोई कोलाहल नही है। ये कविताएं शब्दों की अधिकता के भार से मुक्त है लेकिन इनमें अर्थ का गहन एकांत और मौन की शांत साध है, जो इन्हें समर्थ और कलापूर्ण बनाता है। हम यह भी कह सकते हैं कि ये शब्दों की अधिकता से परहेज की कविताएं हैं जिनके आकार की लघुता में अर्थ और भाव की सघनता है। यूँ भी कहा जा सकता है कि ये शब्दों को बचाने की भी कविताएं हैं। शब्दों को बचाने का अर्थ है यह कवि शब्दों को िफज़ूल खर्च नहीँ करता। दरअसल कविता को बोलना कम और कहना ज्यादा चाहिये।

संग्रह की पहली ही कविता 'तुम' बहुत संक्षेप में लेकिन गहरे अर्थबोध और सौंदर्य अनुभूति के साथ की सुन्दर उपमा के साथ ध्वनित होती है, यह सौंदर्य और प्रेम की अनुभूति के बीच एक रसायन की निष्पत्ति से रचे जाने की एक कविता है,,,,,

तुम्हारे चेहरे पर

इकलौते तिल

जैसे सफेद सफे पर स्याही की पहली बूंद

कविता का पहला शब्द

तुम !

यह कितनी सावधानी से कही गई बात है कि कवि अपनी प्रिया के चेहरे पर इकलौता तिल कहता है जिससे वह आगे कविता में एक शब्द केवल तुम से उसकी तुलना कर सके और इस प्रकार कविता की सृजना का पहला शब्द कवि के लिए 'तुम' हो जाता है, यह प्रेम, सौंदर्य और सृजनात्मकता की कलात्मक ऊंचाई है, बूंद और तुम दो की कितनी लघुता में प्रेम का अनंत विस्तार यहाँ रचा गया है।

इसी तरह दूसरी कविता भी कवि ने अपनी प्रिया के सौंदर्य को भाषा से परे बताते हुए कहा है कि तुम्हारे सौन्दर्य को भाषा में नहीँ समाया नहीं जा सकता लेकिन वे समाया की जगह समायी प्रयोग करते है यह शब्द लोक जीवन का से निकलता है और इस तरह वे प्रांजल से परे हटकर लोक बोली में कहते हैँ यह अधिक मानवीय लगता है !

'पूर्ण विराम' जैसी कविता में पूर्ण विराम की उपदेयता को प्रेम हो जाने की अंतिम परिणिति के साथ अंकित किया गया है कि वह एक तरह की पूर्ण प्राप्ति के असीम संतोष का द्योतक हो। यह अपने प्रेम के प्रति कवि का उदार संचेतन है वह पूर्ण विराम की तरह अपने प्रेम को एक लक्षित प्राप्ति का हेतु और संतुष्टि मानते हैं और उसे कविता सुन्दर शिल्प में महिनता के साथ बुनते हैं।

तुम बहुत देर से आई

मेरी पंक्ति में जैसे

बहुतेरे शब्दों के बाद

आता है दुबला लजीला पूर्ण विराम

अपने से पहले का अर्थ भार सम्हाले!

इस कविता में कवि ने पूर्ण विराम की उपमा से नायिका को निरुपित किया है जैसे पूर्ण विराम वाक्य विन्यास या पैरेग्राफ को एक अर्थबोध देता है वही स्थिति कवि ने नायिका के लिए कही है कि जब वह आती है तो उससे पहले के जीवन को भी एक अर्थबोध से भर देती है यह कवि नायिका या प्रेयसि के प्रति कृतज्ञ भाव भी ज्ञापित कर रहा है।

संग्रह की 'गुदगुदी' शीर्षक की कविता में कवि ने प्रेयसी की हंसी और स्वयं की नींद के बीच एक सुन्दर और भावपूर्ण स्थापत्य रचा है, जिसमें कवि नींद, प्रेयसी की हँसी की अलगनी पर सूखने की कल्पना का बिम्ब है और इसे वह सपने की तह में अनुभूति से गुदगुदी की तरह महसूस करता है, इसमें अलगनी कितना सुन्दर और लोक का शब्द है उसे इस तरह प्रयोग कर कवि ने अद्भुत शिल्प तैयार किया है।

'फिर से कहो' ऐसी कविता है जिसमें एक कान से कम सुनाई देने वाली तरफ प्रेम के अभय द्वार होने का संकेत दिया है जहाँ सुनाई कम देता है तो वहाँ कुछ निवेदन, प्रार्थना, शुभकामनायें रखी जा सकती हैं और नायिका पूछेगी फिर से कहो इस तरह यह शब्दों को स्थान देने की प्रेम में डूबी कविता है जिसकी एंद्रीकता बहुत अद्भुत है!

'खुशबू' शीर्षक की बहुत छोटी सी कविता में कवि ने प्रेम, बारिश, आँसू, खुशबू और स्पर्श को साथ लेकर बेहद सघन और भावनात्मक विन्यास रचा है :-

तुम्हारा स्पर्श

उसकी खुशबू बचाता हूँ

बारिश सबसे पहले

यही मिटाती है

आँसूओं की हो या आसमानी

प्रेयसी के स्पर्श की गंध को बचाने की कोशिश करती यह कविता कवि की ईमानदारी के साथ प्रेम के उस उदार भाव को दर्शाती है जिसमें कवि के लिए वह स्पर्शगंध अमूल्य बन जाती है। 'अस्तित्व' कविता भी प्रेम की ऐसी ही अभिव्यक्ति की कविता है जिसमें प्रिय की पुकार या बुलाने में ही कवि अपने अस्तित्व को महसूस कर रहा है और यदि पुकार मौन हो जाए तो स्वयं के मिट जाने की परिणीति सा महसूस करता है यह प्रेम में इस कदर डूबने की कविता है।

'उम्मीद प्रेम का अन्न है' शीर्षक कविता में कवि ने अपने प्रेम को प्रारम्भ और अंत के बीच में ठहरकर प्रारम्भ को याद कर, बीच को दोहराते हुए अंत से भय की सिहरन महसूस की है और यहीं से फिर वह उम्मीद भी करता है कि सब ठीक हो इसलिए वह उम्मीद को प्रेम का अन्न बताकर प्रेम के पोषण की बात करता है।

इस संग्रह में पिता को लेकर दो कविताएं महत्वपूर्ण हैं, चि_ियां, चुप्पियाँ, हिचकी, हाथ की कांप, भूलना, दुलार, इंतजार, अनुपस्थिती, निगाह, एकांत, दो दिनांक जैसी अन्य कविताएं भी इसी तरह से इस संग्रह को कलापूर्ण, भावभिव्यक्ति के साथ सुन्दर और सृजनात्मक ऊंचाई पर ले जाती हैं।

विद्या सिन्हा के लिए भी एक कविता है जिसमें विद्या सिन्हा की िफल्में और उनकी जीवन यात्रा का बहुत सुन्दर और यथार्थपरक चित्र कवि ने रचा है। रजनीगंधा के फूल, बस स्टॉप, कार्यालय की मेज इन सब में से कवि ने प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति की है। वैसे, विद्या सिन्हा पर व्योमेश शुक्ल की भी एक कविता है लेकिन वह अलग विषय पर है।

'ऐसे भी सम्भव है मृत्यु' के छोटे से आधे पेज के पैरा में अनुराग ने जिन प्रसिद्ध लेखकों,दार्शनिको फिल्मकारों, संगीतकारों की मृत्यु का जि़क्र किया है। वह बेहद दिलचस्प और विस्मयकारी हैं। मृत्यु की ऐसी जानकारी और छोटा सा राइट अप बहुत अच्छा लगा कि मृत्यु की संभावना को कवि ने तलाश करके एक जगह रखने का उद्यम किया है। कितने तरीकों से इन लोगों की मृत्यु हुई है जिनमें अल्बेयर कामू, राबर्ट म्यूजिल, रेनर वर्नर फासबिन्डर, रोलां बार्थ आदि की मृत्यु का उल्लेख किया है।

इस तरह यह कह सकते हैं कि इस संग्रह की कविताएं अत्यंत मार्मिक, प्रेम में भीगी, और संवेदना के धरातल पर जाकर बिम्बों और उपमाओं को महसूस करने वाली कविताएं हैं। कुछ पाठक इन्हें क्षणिकाएं भी कह सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि क्षणिकाओं के गंतव्य प्राय: एक होते हैं किन्तु इन कविताओं में मुझे एक से अधिक गंतव्य दिखाई देते हैं। इस तरह ये कविताएं विविधता रखते हुए अपनी जगह बनाती हैं।

अनुराग बेहद संजीदा, गंभीर और सृजनशील रचनाकार ही नहीं बल्कि बहुत जि़म्मेदार सम्पादक भी हैं जो उन्हें अपने भीतर के चयन और आलोचना की दृष्टि से सम्पन्न करता है। उन्हें बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं। उम्मीद है ये कविताएं पाठकों को शब्दाधिक्य से परहेज और नए बिम्ब, उपमा और रुपकों से रूबरू करायेगी।

लेखक सुप्रतिष्ठित कवि हैं। 

Similar News

देहरी

दहलीज़