संघ-समर्थित बौद्धिक दावों की सीमाएँ
रायपुर साहित्य उत्सव के दौरान वरिष्ठ कवि-आलोचक नरेश सक्सेना के इस कथन कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी काल में, अनेक तथाकथित बौद्धिक उत्सव आयोजित करने के बावजूद, ऐसा एक भी बुद्धिजीवी नहीं पैदा कर पाया जिसका नाम संघ के बाहर जाना-पहचाना हो और जिसे व्यापक बौद्धिक समुदाय में गंभीरता से स्वीकार किया गया हो - के साथ एक तीखी बहस का सूत्रपात हुआ
- अरुण कुमार डनायक
इसी प्रकार संघ प्रभावित इतिहास लेखन पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। इतिहास सुधार के नाम पर अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी ऐतिहासिक / औपनिवेशिक दस्तावेज़, पत्र या भाषण से एक पंक्ति को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उसी दस्तावेज़ के शेष भाग में उस कथन की आलोचना या व्याख्या मौजूद होती है।
रायपुर साहित्य उत्सव के दौरान वरिष्ठ कवि-आलोचक नरेश सक्सेना के इस कथन कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी काल में, अनेक तथाकथित बौद्धिक उत्सव आयोजित करने के बावजूद, ऐसा एक भी बुद्धिजीवी नहीं पैदा कर पाया जिसका नाम संघ के बाहर जाना-पहचाना हो और जिसे व्यापक बौद्धिक समुदाय में गंभीरता से स्वीकार किया गया हो - के साथ एक तीखी बहस का सूत्रपात हुआ। इस प्रश्न के उत्तर में संघ समर्थक खेमे से जो प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं, वे प्राय: तथ्यात्मक विवेचन से अधिक भावनात्मक आत्मरक्षा का रूप ले लेती हैं। यही इस विमर्श की मूल समस्या है।
संघ परिवार से जुड़े विचारकों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि 'लेखक' की परिभाषा स्वयं पक्षपातपूर्ण है और अकादमिक जगत ने वैचारिक कारणों से संघ-प्रेरित लेखन को मान्यता नहीं दी। यह आंशिक रूप से सही हो सकता है, किंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि आलोचना निराधार है। किसी भी वैचारिक परंपरा की बौद्धिक क्षमता का मूल्यांकन उसके भावनात्मक प्रभाव से नहीं, बल्कि उसकी पद्धति, प्रमाण और आत्मालोचना की क्षमता से किया जाता है। इस संदर्भ में प्राय: दीनदयाल उपाध्याय के 'एकात्म मानववाद' का उल्लेख केन्द्रीय उदाहरण के रूप में किया जाता है। किंतु अकादमिक दृष्टि से यह स्वीकार करना आवश्यक है कि 'एकात्म मानववाद' एक संक्षिप्त व्याख्यात्मक पाठ है, न कि सम्पूर्ण चिंतन मनन से विकसित दार्शनिक ग्रंथ। इसमें पश्चिमी पूँजीवाद और लोकतंत्र व समाजवाद की आलोचना तो मिलती है, पर भारतीय समाज की जटिल आर्थिक, सामाजिक और संस्थागत समस्याओं के लिए कोई स्पष्ट, परीक्षण योग्य समाधान नहीं मिलता। इसे संपूर्ण वैकल्पिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत करना वैचारिक अतिरंजन है, न कि विश्लेषणात्मक निष्कर्ष। उपाध्याय जी की तुलना में राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी चिंतकों ने भारतीय सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के लिए अधिक ठोस और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किए। किंतु भारतीय संदर्भ में सर्वाधिक समग्र और नैतिक समाधान महात्मा गांधी के लेखन में मिलता है, जिसे संघ परिवार ने प्राय: अनदेखा ही किया है।
इसी प्रकार संघ प्रभावित इतिहास लेखन पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। इतिहास सुधार के नाम पर अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी ऐतिहासिक / औपनिवेशिक दस्तावेज़, पत्र या भाषण से एक पंक्ति को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उसी दस्तावेज़ के शेष भाग में उस कथन की आलोचना या व्याख्या मौजूद होती है। चयनात्मक उद्धरण इतिहास का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि वैचारिक पुष्टि का उपकरण बन जाता है। कई अवसरों पर पौराणिक आख्यानों को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे इतिहास और मिथक के बीच की आवश्यक बौद्धिक दूरी धुंधली हो जाती है। यह पद्धति इतिहास-लेखन की स्वीकृत अकादमिक कसौटियों के विपरीत है।
भारतीय बौद्धिक इतिहास में राष्ट्रवाद कोई एकरेखीय या एकरूप अवधारणा नहीं रही है। यह विभिन्न वैचारिक धाराओं - उदारवाद, समाजवाद, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, नैतिक राजनीति और औपनिवेशिक प्रतिरोध - के संवाद और संघर्ष से विकसित हुआ है। ऐसे में किसी भी संगठन या विचारधारा द्वारा यह दावा करना कि वही राष्ट्रवाद की एकमात्र प्रामाणिक अभिव्यक्ति है, अकादमिक दृष्टि से अस्थिर प्रतीत होता है। इस संदर्भ में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू का लेखन आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक धुरी के रूप में देखा जाना चाहिए। गांधी का राष्ट्रवाद नैतिकता, अहिंसा, सामाजिक समावेशन और आत्मालोचन पर आधारित था। उनके लिए राष्ट्र कोई धार्मिक या सांस्कृतिक एकरूपता नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच नैतिक सह अस्तित्व की परियोजना था। इसी प्रकार नेहरू का राष्ट्रवाद वैज्ञानिक चेतना, आधुनिकता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और बहुलतावादी समाज की कल्पना से जुड़ा हुआ था। इसके विपरीत, संघ समर्थित विमर्श में राष्ट्रवाद का स्वरूप प्राय: सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान तक सीमित दिखाई देता है। 'राष्ट्र' को बहुधा 'हिन्दू राष्ट्र' के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें नागरिकता, अल्पसंख्यक अधिकार, और वैचारिक बहुलता के प्रश्न गौण हो जाते हैं। यह राष्ट्रवाद आधुनिक राष्ट्र-राज्य की जटिलताओं से अधिक, सांस्कृतिक एकरूपता की आकांक्षा से संचालित प्रतीत होता है। इसी कारण इसे अकादमिक स्तर पर 'छद्म राष्ट्रवाद' कहा जा सकता है - ऐसा राष्ट्रवाद जो भावनात्मक रूप से प्रभावी है, पर वैचारिक रूप से अपूर्ण।
संघ समर्थित लेखन का एक और संरचनात्मक दोष यह है कि वह स्वयं को नैतिक रूप से 'आलोचना से परे' घोषित करने की प्रवृत्ति रखता है। यह कहा जाता है कि यह लेखन पुरस्कार, अकादमी या विश्वविद्यालयों के लिए नहीं, बल्कि 'संस्कार' के लिए है। किंतु अकादमिक विमर्श में यह तर्क स्वीकार्य नहीं है। यदि कोई लेखन सार्वजनिक सत्य का दावा करता है, तो उस पर प्रश्न, परीक्षण और असहमति का अधिकार भी उतना ही वैध है।
संघ परिवार के बौद्धिक लेखन में एक और उल्लेखनीय समस्या 'वामपंथ' की परिभाषा को लेकर दिखाई देती है। वामपंथ को अक्सर साम्यवादी या मार्क्सवादी विचारधारा तक सीमित कर दिया जाता है और उसे एक समरूप, षड्यंत्रकारी और राष्ट्रविरोधी शक्ति के रूप में चित्रित किया जाता है। यह दृष्टिकोण न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि बौद्धिक रूप से भी संकीर्ण है। वामपंथी विचारधारा वास्तव में एक व्यापक वैचारिक स्पेक्ट्रम है, जिसमें समाजवादी, प्रगतिशील, मानवतावादी, स्त्रीवादी, रूढ़ि विरोध और लोकतांत्रिक विचारधाराएँ सम्मिलित हैं। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर संविधान निर्माण तक, वामपंथी और प्रगतिशील विचारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्हें केवल विदेशी आयात या राष्ट्रविरोधी विचार कहकर खारिज करना बौद्धिक सरलीकरण है, न कि विश्लेषण। सबसे गंभीर प्रश्न सत्यनिष्ठा का है। कई अवसरों पर संघ-परिसर से जुड़े लेखकों द्वारा ऐसे तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं जिनके स्रोत अस्पष्ट हैं या जो बाद में असत्य सिद्ध हुए हैं। विचारधारात्मक प्रतिबद्धता तथ्यात्मक शिथिलता का औचित्य नहीं बन सकती। राष्ट्रवादी भाषा में कही गई असत्य बातें भी असत्य ही रहती हैं और अंतत: उसी वैचारिक परंपरा की विश्वसनीयता को क्षति पहुँचाती हैं।
यह कहना आवश्यक है कि यह आलोचना किसी एक विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि बौद्धिक ईमानदारी के पक्ष में है। यदि संघ-परिसर वास्तव में वैचारिक परिपक्वता का दावा करता है, तो उसे सबसे पहले अपने ही लेखन को कठोर अकादमिक कसौटी पर कसने का साहस दिखाना होगा। बिना आत्मालोचना के कोई भी बौद्धिक परंपरा दीर्घकालिक प्रभाव नहीं छोड़ सकती। अंतत:, लेखक की पहचान भावनात्मक प्रभाव से नहीं, बल्कि विचार की संगति, प्रमाण की विश्वसनीयता और पद्धति की ईमानदारी से बनती है। जब तक इस बुनियादी सत्य को स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक संघ-समर्थित बौद्धिक दावे आलोचना से मुक्त नहीं हो सकते।
(लेखक गांधीवादी विचारक व समाजसेवी हैं)