...और मैंने अमिताभ बच्चन को भेंट की अपनी पुस्तक
अमिताभ बच्चन। नाम एक, उपमाएं अनेक। वह आवाज दें तो पल में हजारों की भीड़ उमड़ पड़े। वह हंसें तो लाखों चेहरे खिलखिला उठें;
फोटो क्रेडिट : विभु गुप्त, वरिष्ठ छायाकार।
अमिताभ बच्चन। नाम एक, उपमाएं अनेक। वह आवाज दें तो पल में हजारों की भीड़ उमड़ पड़े। वह हंसें तो लाखों चेहरे खिलखिला उठें। वह रोएं तो करोड़ों आंखों में आंसुओं का सैलाब आ जाए। ऐसा है उनकी शख्सियत का जादू।
यह उनकी अदाकारी का असर है कि उन्हें जितना ऊंचा मुकाम हासिल है, वह सिनेमा की दुनिया के किसी कलाकार को नहीं। इसीलिए वह भारतीय सिनेमा की दुनिया में सदी के महानायक हैं। कहने को दिलीप कुमार, राजकुमार, राजकपूर, शाहरुख और अनगिनत फिल्मी सितारों के नाम लिए जा सकते हैं लेकिन इन सबके बीच जैसा नाम वैसे तेजस्वी अमिताभ, फिर अमिताभ ही हैं।
उनकी तमाम खामियां-खूबियां एक तरफ, लेकिन उनका अभिनय उन सब पर भारी है। पिछले पचास सालों में सैकड़ों स्टार आए, गए लेकिन अमिताभ अपने अभिनय और शख्सियत का परचम लहराए खड़े हैं। रुपया पैसा कमाने में सिनेमा की दुनिया में और भी नाम नाम हैं लेकिन बादशाहत तो सिर्फ और सिर्फ अमिताभ बच्चन की है।
वह आज से अपनी उम्र के 85वें साल में प्रवेश कर गए हैं। फिर भी वह वैसे ही काम करते नजर आते हैं जैसे कोई युवा। उम्र का असर चेहरे और शरीर पर तो पड़ता ही है लेकिन उनकी आवाज़ का जादू अब भी बरकरार है। उनकी बौद्धिक चेतना विस्तार की ओर है। वह मनो-मस्तिष्क से पूर्ण चैतन्य हैं। उनके दिलो-दिमाग पर उम्र का असर दूर-दूर तक नहीं झलकता। वह जब बोलते हैं तो लगता नहीं कि 85 साल का कोई शख्स बोल रहा है।
आज भी वह कौन बनेगा करोड़पति जैसा मेगा-शो होस्ट कर रहे हैं। युवाओं से बतियाते हैं, चुहलबाज़ी करते हैं, ठठाकर हंसते हैं। थोड़ी बहुत उछल कूद भी कर लेते हैं। लगता है, फिल्म "पा" की तरह वह अपने बेटे अभिषेक के बेटे जैसे ही हैं। ईश्वर की उन पर असीम अनुकम्पा है। सक्रियता और चैतन्यता के मामले में वह लाखों करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत कहे जा सकते हैं।
वह तत्कालीन इलाहाबाद, जो प्रयागराज है, से 1984 में चुनाव लड़े। विजयश्री का परचम लहराया। राजनीति में सफल नहीं हुए। मैदान छोड़ दिया। राजनीति शायद उनके लिए नहीं बनी है। वह खुद भी यह बात कई दफा कह चुके हैं। उन पर अनेक आरोप आए, लेकिन समय की बारिश में धुल भी गए। अब जो अमिताभ दिखते हैं, वह अमित आभामय हैं।
मेरी उनसे कुल तीन मुलाकातें हुईं। एक बार भीड़ में, एक बार आनंद भवन में, जब राजीव गांधी का अस्थि कलश आया था, और एक बार केपी काॅलेज में उस मंच जहां मैंने उन्हें अपनी पुस्तक "तीर्थराज प्रयाग" भेंट की थी। संवाद तीनों बार हुआ लेकिन थोड़ा-थोड़ा ही। तीसरी मुलाकात का श्रेय श्रीमान मुलायम सिंह यादव जी को है, जिन्होंने ज़िद करके मेरी पुस्तक उन्हें भेंट करवाई थी।
यह शायद अक्टूबर 2002 की बात है। निकट भविष्य में विधानसभा के चुनाव होने थे। अमर सिंह के कारण मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी के हित में बड़ी बुद्धिमत्ता से अमिताभ बच्चन की शख्सियत का इस्तेमाल कर रहे थे। इसी कड़ी में नगर निगम इलाहाबाद की ओर से अमिताभ बच्चन का अभिनंदन समारोह केपी काॅलेज में रखा गया था। मेयर थे आज के भाजपा एमएलसी डॉ. केपी श्रीवास्तव। तब वह सपा के पाले से जीते थे।
समारोह से एक दिन पहले होटल कान्हा श्याम में चार बजे मुलायम सिंह यादव की प्रेस कांफ्रेंस हुई। दैनिक जागरण की ओर से मैं प्रेस कांफ्रेंस कवर करने गया था। मुलायम सिंह जी मुझसे पूर्व परिचित थे, और ठीक से परिचित थे। यह परिचय जनेश्वर मिश्र जी और बाबू जवाहर सिंह यादव के जरिए हुआ था। प्रेस कांफ्रेंस के बाद चाय पीते वक्त मुलायम सिंह जी ने मुझे संकेतों से अपने नजदीक बुलाया। कहा, आप कल सुबह छह बजे मेरे पास सर्किट हाउस आइए। कुछ बातें करनी हैं। मैंने कहा, अध्यक्ष जी रात में आऊं तो कैसा रहेगा। बोले, देर रात तक नेता ही डटे रहेंगे, बात कहां हो पाएगी।
खैर, मैं सुबह सर्किट हाउस पहुंचा। वह इंतजार ही कर रहे थे। जो बातें होनी थीं, हुईं। इसी बीच उन्होंने कहा कि आप अपनी इलाहाबाद वाली वो किताब अमिताभ बच्चन को भेंट कीजिए। मैंने कहा, ठीक नहीं लगेगा। लोग कहेंगे कि सपा के मंच पर पत्रकार कैसे? नेताजी ने बीच में ही टोंका। आप ऐसा क्यों कह रहे हैं। अभिनंदन समारोह अमिताभ का, आयोजक नगर निगम, इसमें सपा कहां से आ गई। उनकी बात ठीक थी।
सुबह के 11 बजे मैं केपी काॅलेज पहुंचा। साथ में मेरी बेटी भी थी। बाल हठ के आगे उसे ले गया था। मेरे पहुंचते ही पुराने समाजवादी श्रीमान विनोद चंद्र दुबे दौड़े-दौड़े आए। बोले, आपको नेताजी मंच पर बुला रहे हैं। मैं उनके पीछे पहुंच गया। उस मंच पर जहां एक से बढ़कर एक हस्तियां विराजमान थीं। अमिताभ बच्चन की आवाज में गाने वाले सुदेश भोंसले ''अंधेरी रातों में, सुनसान राहों पर..हर ज़ुल्म मिटाने को..एक मसीहा निकलता है, जिसे लोग शहंशाह कहते हैं...'' गा रहे थे। मशहूर शायर और सिनेमा के स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर मंच संचालन कर रहे थे।
केपी काॅलेज का मैदान खचाखच। अमिताभ हों और लाखों लोग उन्हें देखने-सुनने न आएं, यह कैसे हो सकता था। नेताजी ने इशारा किया तो पीछे की एक कुर्सी पर मैं भी विराजमान हो गया। मुलायम सिंह जी ने अपना भाषण दिया फिर अमिताभ बच्चन जी से परिचय कराकर अपनी कुर्सी पर जा विराजे। आगे का काम यानी पुस्तक मुझे ही भेंट करनी थी। जावेद अख्तर ने एनाउंस किया और मैंने उन्हें अपनी पुस्तक भेंट की। उन्होंने और जया जी ने पुस्तक स्वीकार की। वादा किया कि यह पुस्तक इलाहाबाद पर है, हम इसे जरूर इसे पढ़ेंगे।
बहरहाल, आज 11 अक्टूबर है। अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है। उनसे जुड़ी यादों का यह वाकया याद आ गया तो टूटे-फ़ूटे शब्दों में बयान कर दिया। आज से नवरात्र का भी शुभारम्भ हो रहा है। शक्तिदायिनी मां दुर्गा से प्रार्थना है कि वह अमिताभ बच्चन की आभा ऐसे ही अमित रखें।
शुभस्तु पंथानं....जय जय।