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आज पंडाल से बाहर वाली पार्टी बनाने की ज़रूरत है – रघु ठाकुर

देशबंधु समूह के एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव ने जाने माने समाजवादी और गांधीवादी नेता, चिंतक और लेखक रघु ठाकुर से आज की राजनीति पर विस्तार से बातचीत की।

देशबंधु समूह के एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव अपने पॉडकास्ट में तमाम शख्सियतों के साथ बेबाक बातचीत करते हैं। रघु ठाकुर ने अबतक 22 किताबें लिखी हैं और देश के तमाम हिस्सों में लगातार घूमते हैं, देश को समझते हैं और समाजवाद की जड़ों को लगातार मज़बूत करने में लगे हैं। पिछले दिनों उन्होंने गांधीवादी चिंतक, समाजवादी नेता, लेखक, चिंतक और राजनेता रघु ठाकुर के साथ लंबी बीतचीत की। इस बातचीत में राजीव रंजन श्रीवास्तव ने रघु ठाकुर से मौजूदा राजनीति, विचारधारा, समाजवाद और गांधीवाद से जुड़े तमाम सवाल किए। पेश है इस बातचीत के महत्वपूर्ण हिस्से –

राजीव रंजन श्रीवास्तव – रघु भाई, बहुत स्वागत है आपका। शुरुआत यहीं से कि आज की राजनीति कैसी चल रही है।

रघु ठाकुर -- आज राजनीति बची ही नहीं है। राजनीति की आज की परिभाषा में और हमारे समय की परिभाषा में बहुत फर्क आ गया है। आज की राजनीति की परिभाषा यह हो गई है कि येन केन प्रकारेण, सही या गलत तरीके से सत्ता पाना ही राजनीति रह गई है। पर हमने 1963 में जब राजनीति की शुरुआत की थी तो हमारे पास सूत्र वाक्य था लोहिया का। लोहिया जी कहा करते थे कि राजनीति दीर्घकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति। तो जितनी पवित्रता धर्म में है, उतनी ही पवित्रता राजनीति में होनी चाहिए। और हमलोलों के मन में भी यही था कि हमलोग राजनीति में इसलिए आए हैं कि हमें देश को कुछ देना है, लेना कुछ नहीं है। तो कहां राजनीति समाज को देने वाली थी और कहां आज राजनीति समाज से लेने वाली हो गई है। तो जब राजनीति देने वाली थी तो समय अच्छा था लेकिन अब राजनीति समाज से लेने वाली हो गई है तो देश बिगड़ रहा है। आज कोई राजनेता बनेगा तो समाज बंटेगा और राजनेता मिटेगा तो समाज बनेगा। तो ये फर्क आया है।

राजीव - लोहिया की राजनीति को आपने करीब से देखा है। गांधी जी के विचारधारा से आप प्रभावित रहे हैं। ज़रा उस दौर में और आज के दौर में आज का बच्चा या युवा कैसे राजनीति को समझे। वो दौर क्या था

रघु ठाकुर - अगर गांधी की राजनीति को समझना है तो उनका 8 अगस्त 1942 का भाषण सुनना चाहिए। अपने उस भाषण में गांधी ने एक तो ये कहा था कि कल से भूल जाओ कि अंग्रेजों का शासन है। हम आज़ाद हैं। तो एक राजनीतिक व्यक्ति के लिए यह ज़रूरी है कि जो उसका सपना है वह उसे जीना शुरु कर दे। दूसरा – निर्भयता। क्या होगा, मारे जाओगे, लाठी गोली चलेगी। भूल जाओ इसे। हम हिंसा तो नहीं करेंगे, पर नहीं मानेंगे। तो ये गांधी का दर्शन था। तीसरा – घृणाविहीन राजनीति औऱ विचार। तो अपने विरोधी से भी घृणा नहीं करना है। यानी जो व्यक्ति हिन्दुस्तान की आज़ादी का नायक है, वो कहने का साहस करता है कि हमारी अंग्रेजों से कोई लड़ाई ही नहीं है, हम तो उसे बुरा मानते ही नहीं। हमें तो इनका जो शोषण है, सभ्यता है या नीतियां हैं उससे मतभेद है। तो व्यक्ति और विचार, दोनों के बीच की जो सीमारेखा है यही गांधी की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। आज के दौर में तीनों चीजें नहीं हैं। आज के दौर में न तो निर्भीकता है। आज आदमी बाहर से जितना नहीं डरता, उतना अंदर से डरता है। आज सत्य की परिभाषा बदल गई है। गांधी के दौर का सत्य निर्मम होता था। सत्य तो हमेशा निर्मम होता है, शब्द उसे थोड़ा ढक सकते हैं, लेकिन सत्य तो सत्य रहेगा। आजकल राजनीति का चलन ये हो गया है कि दूसरे के बारे में सच बोलो, अपने बारे में झूठ बोलो। गांधी या लोहिया की शैली थी कि दूसरे से पहले अपने बारे में सत्य बोलो। यानी जब लोहिया कहते थे कि सबसे अच्छा दिन वह होगा जिस दिन पार्टीवाले पार्टी की आलोचना करना शुरु कर दें। लोहिया लिखते हैं कि अगर समाजवादी पार्टी की सरकार जो लोग चलाएं, उसका विरोध समाजवादी पार्टी के लोग ही करें, कांग्रेस वाले चलाएं, तो विरोध भी कांग्रेसी ही करें। कम्युनिस्ट चलाएं तो विरोध भी कम्युनिस्ट ही करें। तो जब हम अपनी पार्टी की गलतियों को कहना शुरु करेंगे, वहीं जाकर सत्यता और निष्पक्षता नज़र आएगी। तो आज जो राजनीति है, सत्य के खंभे ढह गए हैं और वो असत्य पर खड़ी है। जबकि गांधी या लोहिया के दौर में राजनीति सत्य पर खड़ी थी। तो चार तरह के फ्रक तो आ ही गए। एक पांचवा फर्क जो आया है कि गांधी या लोहिया के दौर में अपना सबकुछ देश को देने को तैयार थे। हमलोग जब कोई सभा करने जाते थे तो हमसे कोई पैसा नहीं मांगता था, हम अपने नेता को खुद पालते थे। गांधी को देश पालता था, लोहिया को समाजवादी पालते थे। और हमलोग गौरवान्वित होते थे कि हमारा नेता कितना ईमानदार है। तो तब की राजनीति ऐसी थी, सबकुछ देश के लिए देने वाली। अब ये दौर है कि राजनीति में तो पाना क्या है – देश का नेता कैसा हो, नोट दिलाए, वैसा हो। या देश का नेता कैसा हो, वोट दिलाए वैसा हो। आज तो पैसा और जाति, पैसा और वोट। तो राजनीति कहां बची है। तो मैं ऐसा मानता हूं कि आज राजनीतिक शून्यता का दौर है। राजनीति एक विचार है जो परिवर्तन का विचार है, बदलाव का विचार है, समता का विचार है। आज क्या है, सिर्फ सत्ता नीति है, विचार नहीं है।

राजीव – अभी तो मैं देख रहा हूं रघु जी कि अगर आप झूठ नहीं बोल रहे तो आप राजनीति नहीं कर रहे। अब इस दौर में तो एक नैरेटिव सेट किया जाता है, और उसे ही बढ़ाया जाता है... बहुत सी ऐसी बाते हैं। अब पिछले 11 सालों को ही देख लें। मोदी जी के भाषणों को ही देख लें। अभी तो प्रासंगिकता नरेन्द्र मोदी की है, पहले देखेंगे तो मनमोहन सिंह का भी दौर रहा है। अटल जी का भी जिक्र आएगा। लेकिन जैसे जैसे हम आगे बढ़ते



जा रहे हैं, राजनीति का क्षरण हो रहा है, राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है। ये स्तर उठाया कैसे जाए

रघु ठाकुर – देखिए। उठाने का तरीका क्या हो, ये इससे खोजना पड़ेगा कि ये पतन हो क्यों रहा है। इस लिए हो रहा है कि आम तौर पर व्यक्ति आज अपने आप को अकेला और डरा हुआ महसूस कर रहा है। चाहे कोई भी सरकार रही हो, एक नैरेटिव तो सेट करती ही है और उस आधार पर चलती है औऱ वह झूठ होता है। परन्तु एक फर्क तो आया ही है। देखिए, पचास के दौर में, साठ के दौर में, सत्तर या अस्सी के दौर में कुछ ऐसी जमातें हुआ करती थीं जो निर्भय होकर सोचती थीं। देखिए, आदमी जितना गोली से नहीं डरता है, उतना अपने आप से डरता है। आजकल एक भय का दौर है और वो है अकेलेपन का। इसको बदलना है तो आपको अकेले चलने का साहस होना चाहिए जो मे कर रहा हूं। गांधी और लोहिया के दौर में अकेले चलने का साहस था। लोहिया एक वाकया सुनाते थे कि जब गांधी जी की हत्या हुई और उनका अस्थि कलश एक ट्रेन से जा रहा था, हर स्टेशन पर हजारों लोग थे। ऐसे ही एक छोटे स्टेशन पर ट्रेन रुकी, एक गांव का गरीब वृद्ध आया अकेले और एक फूल डाल दिया। अकेले हैं, लेकिन भयभीत नहीं। समूह की बहादुरी कायरता होती है, अकेले की बहादुरी बहादुरी होती है। तो आज जो नैरेटिव सेट हो रहे हैं, वो चुनाव के लिए हो रहे हैं। जब कॉरपोरेट, कास्ट, करप्शन, क्राइम और राजनीति जब एक साथ मिल जाते हैं तो नरेटिव जनता सेट नहीं करती। इन छह खेमों से सेट होता है नरेटिव। इंदिरा जीके ज़माने में नैरेटिव सेट हुआ – गरीबी हटाओ, 71 आ गया, फिर नैरेटिव सेट हुआ – बांग्लादेश। 70 में एक नैरेटिव सेट हुआ कि लोकतंत्र को बचाना है। 80 में फिर दूसरा नरेटिव आ गया, जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर। 84 में इंदिरा जी के बलिदान का नरेटिव आ गया, फिर बोफोर्स आया, फिर टू जी, स्वदेशी, राष्ट्रवाद आ गया। तो नरेटिव तो ये लोग सेट करते हैं, जनता का इससे कोई सरोकार नहीं होता। आजादी के समय जो था वो पब्लिर नरेटिव हुआ करता था। समाजवादी या साम्यवादी विचाराधारा जो है, वो सबको साथ लेकर चलने की है। अब जो नैरेटिव सेट होते हैं वो कॉरपोरेट सेट करता है। कॉरपोरेट का मीडिया जो है उसका प्रचार करता है, कॉरपोरेट का पैसा राजनीति को चलाता है। लोग कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। मैं ऐसा मानता हूं कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं हैं, वो कुछ उद्योगपतियों के चाकर हैं। इनको उनका दुक्म बजाना है, बदले में सत्ता पाना है। जिस दिन जनता नरेटिव सेट करेगी, उसी दिन बदलाव होगा। तो कॉरपोरेट के नरेटिव से बचना, अपना नरेटिव खुद सेट करना और समाज को कुछ न कुछ देना, लेना नहीं – ये तीन चीज़ों की आज आवश्यकता है। ऐसे दौर में आज वही जमात लड़ पाएगी जो सबकुछ सहने के लिए तैयार हो। हमने बहुत कुछ सहा है, इसलिए कह रहा हूं। हमने लोकतांत्रिक जनता पार्टी बनाई तो मूल्यों को स्थापित करने के लिए बनाई। हमें भी कई कई ऑफर आए, करोड़ों के, लेकिन हमने कभी समझौता नहीं किया। ये जो पैसे वाले लोग हैं, राजनीतिक पार्टियों को देकर ब्लैक को व्हाइट करते हैं। वैचारिक दलों के लोगों के प्रति क्या भाव है इन लोगों में, ये लोगों को जानना चाहिए। वैचारिक व्यक्तियों के प्रति जो सोच है, जो भ्रष्टाचार की संस्थाएं हैं, वो चाहती हैं कि कोई ईमानदार न रहे। अब ऐसे दोर में अगर आपको ईंनदारी से खड़े होना है तो आपको हर तकलीफ, अपमान और संकट को सहने को तैयार रहना चाहिए। आज जो राजनीतिक दल हैं, उनमें कोई वैचारिक भावना भी नहीं बची है। हमें तो सड़क पर रहकर भी दफ्तर चलाना हो तो चला लेंगे, लेकिन झुकना नहीं है, विचार पर खड़े रहना है। तो अकेले चलने का साहस अगर है तो वैचारिक लड़ाई तभी लड़ सकते हैं। हमारे बहुत सारे समाजवादी साथी हैं. उनमें भी परिवर्तन आए हैं। लोहिया के ज़माने के समाजवादी लोग थे उनमें से कई तो अब ज़िंदा भी नहीं हैं। उनके बाद की जो दूसरी पीढ़ी थी, उसमें भी काफी लोग चले गए। दो राज्यों में जो सरकारें बनीं जिसमें कुछ समाजवादी विचार के लोग थे, तो कुछ लोगों का उनके प्रति कुछ मोह हो गया, कुछ सत्ता का, कुछ जाति का तो कुछ संबंधों का। फिर भी बिहार और यूपी में कई समाजवादी लोग अभी भी हैं, कुछ गांवों में, कुछ दूर दराज़ जो आज भी लोहिया को मानते हैं। तो इस समय की सबसे बड़ी जो आवश्यकता है कि जिसको बदलाव की राजनीति करनी है, वह अकेले खड़े होने का साहस करे।

राजीव – आपने पर तो गांधी और लोहिया पर इतना काम किया है। लोहिया जी के नज़दीक भी रहे हैं औऱ उनके विचारों को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं। हमारे पाठकों दर्शकों को कुछ और बताइए उनके बारे में

रघु ठाकुर – जी राजीव जी। तब वो निर्भीकता थी राजनीति की बुनियाद थी जो गांधी ने सिखाई थी। जब 9 अगस्त 42 का प्रस्ताव पारित हुआ था। तो गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत कहां से की थी? सारे जो दिग्गज लोग थे उनमें से अधिकांश लोग तो यह कह रहे थे कि भाई, अभी नहीं करना चाहिए। मृत राष्ट्र हैं और हिटलर से लड़ रहे हैं। तो गांधी ने एक लाइन में संकेत दे दिया था कि मेरी कांग्रेस पंडाल के भीतर की नहीं बाहर वाली है। हां तो उन नेताओं को बता दिया था कि तुम्हारी हैसियत पंडाल तक है। मानो तो मानो, नहीं मानो तो नहीं मानो। आज राजनेताओं में भी साहस नहीं है। राजनीति समाज को सुधारने के लिए है, बदलने के लिए है। परंतु अभी क्या हो गया है गांधी का दौर था लोहिया का दौर था जो समाज की बुराइयों के खिलाफ बोलते थे। लोहिया का जो चुनाव हुआ कन्नौज से फर्रूखाबाद से। उनकी जो आखिरी सभा थी, वो जिस इलाके में थी वो मुस्लिम माहौल वाला इलाका था। लखनऊ से वो सभा करने के लिए वहां पहुंचे तो रास्ते में रेवती रमण सिंह जी थे जो उस समय जिंदा थे। और भी लोग थे कपिल देव सिंह थे, कैप्टन अब्बास अली साहब थे, अध्यक्ष थे यूपी पार्टी के वो भी थे। तो उन्होंने कहा कि ‘डॉक्टर साहब ऐसा है कि मुस्लिम इलाके में सभा है आज हम चुनाव जीत रहे हैं, तो कॉमन सिविल कोड की चर्चा मत करना नहीं तो ये वोट कट जाएगा। लोहिया ने सुन लिया, कुछ नहीं बोले और सभा में जब गए तो सबसे जाकर पहले उन्होंने चर्चा ही शुरू की कि मैं मानता हूं कि काम बिलकुल होना चाहिए। एक प्रगतिशील विचार के तौर पर होना चाहिए। अपने विचारों को छिपाना भी अपराध है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि मैं इसके आधार पर चुनाव नहीं जीतना चाहता कि आपसे छिपा के जीतूं। आजकल इतनी हिम्मत है लोगों में। वो तो हर हाल में बस यही कहते हैं कि जीतूं, जीतूं। तो आज साहस की जरूरत है। बहुत लोग हैं जो अलग-अलग हैं। जी इसमें मैं आज भी कह रहा हूं। मैं तो घूमता हूं, लोगों को देख रहा हूं। हजारों लाखों लोग हैं। दूसरा पूंजीवादी सत्ता ने कई प्रकार के जाल डाल दिए हैं। राजनीतिक दलों पर जो जाल डाला वो तो हमें आपको पता ही है। खूब पैसा दे रहे हैं पूंजीपति। इलेक्टोरल बॉन्ड है, इलेक्टॉरल ट्रस्ट का पैसा है, बांड का पैसा है, चंदा है। देखिए, राजनीति में जब दफ्तर बड़े हो जाते हैं तो दल बंट जाते हैं। कांग्रेस पार्टी का दफ्तर था एक जमाने में जंतर मंतर पर तो बड़ी पार्टी थी। कांग्रेस देश को रूल कर रही थी। आज कांग्रेस पार्टी का जो नया दफ्तर बना है। पहले सरकारी मकान थे वह भी बहुत बड़े-बड़े थे अकबर रोड पर। फिर अभी और नया बन गया है। पार्टी नहीं है, मकान है। भाजपा भी मकान है, पार्टी नहीं है। फाइव स्टार है बिल्कुल। भाजपा बस मकान है, पार्टी खत्म है। सत्ता है पर जो विचार था जो सोच थी, अच्छी बुरी जो हो, उससे आपकी असहमति हो सकती है, अब वो भी नहीं जी। अब जो बातें वो कहते थे, वो कुछ नहीं बचा उसमें। ना कोई ईमानदारी ना कोई चरित्र ना कोई सवाल। सबमें स्खलन है। हमारे वाम मित्रों के बड़े-बड़े मकान बन गए। दफ्तर बन गए। सीपीएम का दफ्तर बन गया। मकान तो बड़ा बन गया। सरकार चली गई। तो दफ्तर राजनीति नहीं है। दफ्तर कोई विचार नहीं है।

राजीव - वो पंडाल से बाहर वाली वाली पार्टी बनानी होगी, जो गांधी जी ने कहा।

रघु ठाकुर - इसलिए लोगों को ये साहस करना चाहिए कि हमको इस पैसे के आकर्षण में नहीं पड़ना। हम राजनीति में काम करेंगे तो हमारे पास जो कुछ है वो लगाएंगे। हमें समाज को पालना हो तो पाले। मैं इसलिए कर पा रहा हूं राजीव भाई कि मुझसे ज्यादा अमीर आदमी हिंदुस्तान में कोई नहीं है। क्या अंबानी या अडानी। मेरे सामने कोई नहीं लगते। इसलिए कि इनको पैसा कमाने के लिए तमाम चोरी करनी पड़ती है। तमाम धंधे करना पड़ते हैं। झूठ बोलते हैं। पता नहीं क्या करते हैं। हवाई जहाज चाहिए, सुरक्षा चाहिए। हमें खाना हमारे साथी खिलाते हैं। पिछले 40-45 साल से हमने घर का खाना नहीं खाया। ये कपड़े जो हैं, हमारे साथी देते हैं। जहां जाते हैं, वहां के साथी लोग हमको अगले जगह का टिकट दे देते हैं। तो बताइए, कि हमारे पास टिकट है आने जाने का। हमारे पास में कपड़े हैं। हमारे पास में खाना है। इलाज करा देते हैं। बीमार पड़ जाएं तो वो दवा कर देते हैं। तो जिस आदमी के लिए बगैर किसी चिंता के ना टैक्स की चोरी के करना है, न सरकार की जी-हुजूरी करनी है और जितनी जरूरतें हैं, हमको मिल रही है तो हमसे बड़ा अमीर कोई हो सकता है। अब ऐसी अमीरी सबको महसूस करना चाहिए। और समाज को भी चाहिए कि समाज उन लोगों को जिंदा रखे। अभी जो कठिनाई आ रही है कि राजनीति हो गई है पूर्णकालिक। और कार्यकर्ता हो गए वैतनिक। तो वो कर्मचारी हो गया ना। आज नेताओं का नौकर हो गया है। वो पैसा दे रहे हैं कि जाओ, सभा करना है, ये पैसे ले जाओ, सभा कर लेना। तो जब आपका कार्यकर्ता व्यतिगत नौकर हो गया तो सारी राजनीति जो है वह बंधुआ मजदूरी की हो गई आज की तारीख में। अगर मैं आपसे कहूं कि बंधुआ मजदूरों से ज्यादा बड़ा संकट है। राजनीति को बंधुआ मजदूरी से मुक्त करना होगा। जिस पार्टी का जो नेता हो गया है वो पैसा दिलाता है और वो पैसा कमाता है और उसके ही सहारे पार्टी चलती है। कहते हैं ये लोग, अरे साहब उनके पास पैसा है इसलिए उनकी राजनीति है। तो अगर पैसे वाले की ही राजनीति आपको करनी है तो भाई इसके बदले नौकरी कर लो। कॉर्पोरेट की नौकरी करो। राजनीति छोड़ दो। इसको बदनाम तो मत करो कम से कम। और समाज को भी चाहिए कि जो अच्छे लोग हैं उनका समर्थन करे। हमने एक योजना बनाई जो चल नहीं पाई ज्यादा, पर प्रयास कर रहे हैं। आज इस देश में, देश का कौन है? अभी मान लीजिए कि हम राजनीति में आए, तो उस जमाने का दौर अलग था। आज बदलाव आए तो। बिरादरी वाले कहते हैं, अच्छा भाई ठाकुर साहब चलो अपनी बिरादरी की बात करो। रिश्तेदार अफसर होते तो कहते, चलो पैसा दो, आने जाने का खर्च करो, चलो पैसा दे दो, तो कोई एक घर के माता-पिता का बेटा है, कोई जात का बेटा है, कोई धर्म का बेटा है, कोई पैसेवाले का बेटा हो गया। तो इस देश का कौन है? तो अगर सियासत को बदलना है तो कोई बड़ा काम नहीं। एक कॉलोनी में, एक मोहल्ले में, आप एक लड़के को तय कर दो कि हम सब लोग मिलकर महीने का ₹50-50 इकट्ठा करेंगे और ₹100 तुम्हें देंगे। और ये छिप के नहीं देंगे। खुलेआम दो। जैसा हमने आपसे कहा कि हमें तो भैया कुर्ता भी दूसरा दे रहा है, कपड़ा दूसरा दे रहा है। तो हमारी अकाउंटेबिलिटी है ना, वो हमको सहयोग कर रहे हैं तो हमारा दायित्व है के हम उनके प्रति वफादार रहें। हम तो उनके प्रति समर्पित हैं। बिल्कुल खुल के हैं। व्यक्तिगत तौर पर देना चोरी है। सार्वजनिक देना उत्तरदायित्व है। और आपका यह कर्तव्य है। तो अगर ऐसे 1 लाख लोग तैयार कर दें जो ना घर के होंगे ना, एक बाप माता के होंगे। उनका पूरा देश होगा और ना कोई जाति के होंगे, ना धर्म के होंगे। कोई समाज पाल रहा है आपके लिए और तुम करो। कल बदलाव हो जाएगा। कहां मोदी लगते हैं?

राजीव – रघु जी, ये बताइए इस दौर में चुनाव को चुनाव में धांधलियों की बात हो रही है बहुत ज्यादा। अभी तो एसआईआर चल रहा है। और आपने उस दौर को भी देखा। चुनाव में धांधलियां तो होती थी उस दौर में भी होती थीं। लेकिन आज के दौर में जो चल रहा है इस पर जरा आपका नजरिया भी समझना चाहूंगा। और चुनाव आयोग की भूमिका पर भी थोड़ी टिप्पणी आपकी चाहूंगा।

रघु ठाकुर – देखिए, एक तो मैं कहूंगा कि जो धाधलियां पहले होती थीं, वो कम नहीं थीं। हमने तो कितने चुनाव में देखे। जहां हम लुटे-पिटे मिले। मधुलिमय का चुनाव हुआ बांका से। अगर रामदेव यादव मधुलिमय के ऊपर लेट नहीं जाते तो मधुनिमय मर गए थे, हत्या हो जाती उनकी। एक खबर भी उड़ी कि उनकी मौत हो गई। और बूथ कैप्चरिंग भी हुई थी विरोधियों द्वारा फिर भी जीते। मैं दो बार प्रभारी रहा ज़ॉर्ज फर्नाजिस का। दोनों बार बूथ लूटी गई। हमने शरद यादव को खड़ा किया अमेठी से 1982 में जब संजय गांधी की मौत हुई थी उसके बाद, तो सुबह पुलिस ने हमको गिरफ्तार कर लिया। और हम सब लोग जेल में थे। सारे बूथ पर कब्जा हो गया। हम खुद जब लड़े थे एक बार चुनाव भिंड से, तो उस समय भी यही हुआ था। हम तो पहले बूथ कैप्चरिंग होती थी, उसका स्वरूप अलग था। अब उस ढंग की बूथ कैप्चरिंग तो नहीं होती। जिस प्रकार की भूमिका चुनाव आयोग पिछले कुछ वर्षों से अपना रहा है तो मेरा यह चुनाव आयोग पर आरोप है कि चुनाव आयोग इस देश की राजनीति को दो दलों की राजनीति में बांटना चाह रहा है और उसका एक परिणाम यह हो रहा है कि वो आज एक दलीय की तरफ जा रहा है। हालांकि बंगाल में मैं समझता हूं कि जितनी चिंता व्यक्त की जा रही है वो चिंता का कारण नहीं है। तथ्य भी कुछ भिन्न प्रकार के हैं। । देखिए मैं यह मानता हूं कि चुनाव आयोग में जो अधिकारी हैं वो सत्ता के अत्यधिक प्रभाव और दबाव में है। परंतु जो चुनाव की मशीनरी है वो चुनाव आयोग की नहीं होती। वो तो स्टेट गवर्नमेंट की होती है। जो का मुख्य चुनाव अधिकारी है तो उसे दिल्ली सरकार बनाएगी। बिहार में बिहार सरकार ने बनाया। बंगाल में बंगाल सरकार। यही बात तो कर्नाटक के मंत्री ने बोल दी ना। अब आप बताइए कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के मंत्री ने बोली, तो आपने उसको बाहर कर दिया। भाई, बात तो सही कही थी। इसी लिस्ट पर तो हम जीत के आए। आपको इशू भी बनाना है तो आप उसको निकाल तो नहीं सकते हो। ये लोकतांत्रिक भावना नहीं है किसी के प्रति। सच्चाई यह है वह सच को नहीं सुनना चाहते। तो बंगाल में हमने कहा कि खतरा हमको कम लगता है। ममता जी बोल रही हैं, ठीक है। एक पॉलिटिकल स्टेटमेंट उनका है। ज्यादा से ज्यादा चुनाव आयोग यही करता है कि भाई, तीन साल पुराने कौन है, दो साल पुराने कौन है, इनको हटा दो। उनकी लिस्ट दो। तो सबको पता है कि उसे निकल देना है। हां बाहर से ले नहीं जा सकते। हां इनके जो पर्यवेक्षक बाहर से आते हैं वो थोड़ा बहुत पक्षपात कर सकते हैं, पर बहुत ज्यादा नहीं कर सकते। स्टेट मशीनरी तो राज्य सरकार की है। कल ये खतरा यूपी में हो सकता है। अब इसको लेकर जो बेचैनी है लोगों में और मतदाताओं में भी है वो आक्रोश हर जगह पर दिख रहा है। चुनाव आयोग की जो भूमिका है वो सबसे गंदी है। और एक जिस स्तर पर आप कह रहे हैं वो तो है ही। जिस प्रकार से चुनाव एक पक्ष बन रहा है ये शर्मनाक है। भाई ठीक है आपकी नियुक्ति किसी ने की हो पर आप भी संविधान की संस्था हैं। आपने भी संविधान की शपथ ली है। पर आजकल तो क्या हो गया कि हर संविधान को तोड़ने वाला संविधान की शपथ लेता है। मेंबर ऑफ पार्लियामेंट शपथ लेता है कि मैं संविधान की शपथ लेता हूं या ईश्वर की शपथ लेता हूं या कोई अल्लाह की शपथ लेता है, जिसको जो कहना हो कहे। और करता है 20 करोड़, बताता है 40-50 लाख। सरकार का मंत्री है, वह शपथ लेता है, प्रधानमंत्री शपथ लेता है कि हम शपथ लेते हैं कि हम संविधान के प्रति समर्पित रहेंगे। और बनने के बाद पता चलता है कि निष्ठा संविधान के प्रति नहीं थी। निष्ठा देश के प्रति नहीं थी। भाजपा सरकार में है तो संघ के प्रति निष्ठा है। अगर कांग्रेस सरकार थी तो एक परिवार के प्रति निष्ठा है। अगर यूपी की सरकार बन जाए और एक ज़माने में हमारे मित्र रहे मुलायम सिंह के बेटे की सरकार बन जाए, तो फिर उनके प्रति निष्ठा है। तो जो लोग आज शपथ लेते हैं, शपथ लेने वाले आम तौर पर झूठ बोलते हैं। बगैर शपथ वाला तो थोड़ा सच हो सकता है। आजकल लोग शपथ लेकर झूठ बोलते हैं। तो जो चुनाव आयोग है, चुनाव आयोग भी संविधान की शपथ लेकर भी, जो काम कर रहा है, उस काम के चलते चुनाव आयोग की साख गिरी है। चुनाव आयोग एक अविश्वसनीय संस्था बन रहा है। और अगर चुनाव आयोग अविश्वसनीय संस्था बन जाएगा तो उनका क्या होगा। ये महत्वपूर्ण नहीं है। ज्ञानेश कुमार जी रहेंगे जाएंगे तो अलग बात है। पर लोकतंत्र की प्रणाली के प्रति अविश्वास बढ़ जाएगा। वो चिंता की बात है। और लोकतंत्र की प्रणाली के प्रति अगर अविश्वास हुआ तो फिर देर सवेरे लोग हिस्सा क्यों जाएंगे? चुनाव आयोग के साथ-साथ न्यायपालिका को लेकर एक अलग छवि रहती थी। उसके प्रति भी धारणा जो है वो कहीं ना कहीं कि अब वो भी निष्पक्ष न्यायपालिका नहीं रही।

राजीव - तो न्यायपालिका के प्रति निष्पक्ष धारणा रहे। कैसे? बताइए आप?

रघु ठाकुर - अगर हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश एक छोटे से पुदुचेरी जैसे राज्य का राज्यपाल बन जाए। एक मुख्य न्यायाधीश राज्यसभा का मेंबर बन जाए। और सरकार ने क्या किया है कि सरकार ने खरीदने के लिए, माल को बेचने के लिए, कई दुकानें खोल दीं। अब हमारे यहां प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया। क्या लिखा है कानून में? सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड जज जो है उसका चेयरमैन होगा। तो जज साहब जो हैं वह रिटायरमेंट की पहले से नजर मारते हैं कि भाई, 65 साल 70 साल में जब रिटायरमेंट हो जाएगा तो कार-बंगला कहां रहेगा? तो यहां चलना है। तो न्यायपालिका जो है जिसको निष्पक्ष होना चाहिए, वो न्यायपालिका अपनी कुर्सी खोज रही है। और जब यह मुख्य न्यायाधीश लोग मामूली-मामूली पदों पर जा रहे हैं, या स्वीकार कर रहे हैं तो भला न्यायपालिका की निष्पक्षता कहां रहेगी। कोई प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के नाम पर जा रहा है, तो कोई ह्यूमन राइट कमीशन के नाम पर जा रहा है तो कोई कहीं जा रहा है। सरकार ने जो दुकानें खोलीं, उसका कोई अर्थ नहीं है। सारी दुकान है। तो इसको अगर मिटाना है तो मैं तो सबसे पहले कहता हूं कि सुप्रीम कोर्ट को यह कह देना चाहिए कि कोई भी सुप्रीम कोर्ट का जज, अब रिटायरमेंट के बाद किसी उस पद पर नहीं जाएगा। किसी भी ऐसे पद पर नहीं जाएगा। लाभकारी पद पर। तब तो हम मान सकते हैं। जी, पर सब वही कर रहे हैं। तो इसलिए न्यायपालिका की साख गिरी है। दूसरा, फैसलों में जो विसंगतियां हैं। आज न्यायपालिका के फैसले अगर आप देखें तो आप मान सकते हैं भाई कि ठीक है अलग नज़रिया जज का भी हो सकता है। पर 50 साल के बाद 40 साल के बाद कहीं आप मिलकर एक नजीर तो बनाओ कि साहब, ये है डिस्कस के लायक कसौटी का मामला नहीं है। अब आजकल ईडी की बड़ी चर्चा चल रहा है। हमारा जो दफ्तर है राजीव भाई, एक दिन हम आपको बुलाएंगे, कभी आप आना, हम आपको चाय पिलाएंगे। हमारा किराए का मकान है। कर्मचारी का किराए को कट रहे हैं। कुल मिला कर डेढ़ कमरा है और एक किचन है। हम तो लोगों से कहते हैं कि यार ईडी हमारे यहां आ जाए तो सारे हिंदुस्तान को मालूम तो पड़ जाए कि हम जिंदा हैं। क्योंकि बहुत साल से दिख नहीं रहा है चेहरा ना। लोग हमसे कहते भी हैं कि यार आपकी तो फोटो नहीं आती कभी टीवी पर। हां, तो भैया ऐसे घर में ईडी नहीं आई। आये भी तो किताबें हैं, भैया देखो, कितना पैसा है ₹700 ₹600 ₹300 जो भी पड़ा होगा। अभी वो भी है देख लो। परंतु जो ईडी का जो कानून है, वो कानून ही मेरी राय में असंवैधानिक है। और अगर सुप्रीम कोर्ट इंपार्शियल है तो ये दायित्व संविधान में उसको दिया गया है कि कोई कानून अगर संविधान संगत नहीं है तो उस कानून को रद्द करना चाहिए। अकेले बहुमत से कानून पारित करना ये महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है कि संविधान संगत है कि नहीं? न्याय का एक मौलिक सिद्धांत रहा है। मैं वकील भी हूं। मैंने लॉ पास किया है। और मैंने कई सारे वकालत भी की है। न्याय का मूल सिद्धांत रहा है। फंडामेंटल रहा है कि बर्डन ऑफ़ प्रूफ आरोप लगाने वाले पर है। ईडी के कानून में बर्डन ऑफ़ प्रूफ जो है वो आरोप लगाने वाले का नहीं है। हमने आरोप लगा दिया। आप देखो, क्या दोषी है क्या नहीं है। इससे बड़ा कोई मजाक हो ही नहीं सकता है। अगर कल मान लो कोई दमदार अफसर ईडी आ जाए जो कि, हालांकि कठिन लगता है, पर मान लो आ जाए, और कहे कि मोदी को पकड़ रहे हैं, प्रधानमंत्री को। आप सीधे कहिए कि आप ईमानदार हैं तो भी। हम जानते हैं कि संविधान में आपको भी ये आजादी नहीं दी गई है कि प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी कर सकते हैं। पर मैं एक काल्पनिक चर्चा कर रहा हूं। तो बर्डन ऑफ प्रूफ जो है, यह सदैव आरोप लगाने वाली एजेंसी पर होना चाहिए। एक दूसरा कि जमानत तब होगी जब ईडी अपोज नहीं करेगी। अगर ईडी मे अपोज की जमानत नहीं होगी। भाई, आप आए, आपने कागजात जप्त कर लिए। जो है आपने जब्त कर लिया। आपने बयान ले लिए। वहां और क्या मिलना है? भाई, कोई मर्डर केस हो तो उसमें हम एक बार समझ भी सकते हैं कि भैया, इनका बयान लेना है और यहां तक कोई डरा धमका कर। ये तो सब पेपर्स का मामला है। तो जो आपने जो कारवाई की उस कारवाई के बाद कोई और जरूरत ही नहीं बची। ये दूसरी बात हुई। तीसरा, कोई समय सीमा नहीं साहब। सालों के बाद चले आ रहे हैं। मैं तो कहना चाहता हूं सुप्रीम कोर्ट से कि सुप्रीम कोर्ट को सबसे पहला काम यह करना चाहिए कि कुछ चीजों के फंडामेंटल्स को तय करना चाहिए। अब आप देखिए कि पुलिस का थाना जो है, वो कारवाई करता है। तो पुलिस के थाने की कारवाई का स्ट्राइक रेट सब जानते हैं कि पुलिस वाले भ्रष्ट होते हैं। अमूमन अपवाद छोड़ दीजिए। कुछ अच्छे भी होते हैं। ऐसा नहीं कहता कि सब होते हैं। पर अमूमन होते हैं। पर 30% 40% 50% तो वहां दंड मिलता ही है ना। ईडी का स्ट्राइक रेट तो 1% भी नहीं है। तो जिन अधिकारियों ने यह कार्रवाइयां की हैं क्या वो दोषी नहीं है? आपने अगर केवल एक झूठा केस बना कर प्रताड़ित किया और एक साल, डेढ़ साल, दो साल किसी व्यक्ति को जेल में रखा है तो यह ‘रॉन्ग डिटेंशन’ करने के अपराधी हैं ये। इनके खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट को तय करना चाहिए कि जमानत का संबंध इनके पक्षजनों से क्या है? भाई, जमानत क्या होती है? खुद सुप्रीम कोर्ट का कहना रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने लगातार कहा है कि बेल इज द राइट। हां। रिजेक्शन इज़ द एक्सेप्शन। और ये नियम में लिखा है, कानून में लिखा हुआ है कि साहब ईडी विरोध करोगे तो तो कानून ही गलत है ना ये कानून तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ यह तो फंडामेंटल के खिलाफ है। यह तो बेसिक ह्यूमन राइट के भी खिलाफ है। यह तो फंडामेंटल राइट के भी खिलाफ है। इसको कोर्ट को करना चाहिए। तीसरी बात ये कि कानून की मान्यता अभी तक ये रही है कि 100 बेगुनाह छूट जाए पर एक गुनहगार को सजा मिले यानी 100 गुनहगार छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलने चाहिए। अब एक नई परंपरा बन गई है कि साहब, 100 गुनहगार छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सज़ा जरूर मिलनी चाहिए। यही न्याय हो गया है। चौथी बात, जो कमी सुप्रीम कोर्ट में आई है कि सुप्रीम कोर्ट बापू आसाराम बन गया है। आजकल बाबा लोग हैं रोज उपदेश देते हैं। और पिछले 20- 30 साल में तो बाबाओं की बाढ़ आ गई है। अब तो शंकराचार्यों की भी संख्या बढ़ गई है। पहले तो चार शंकराचार्य होते थे। अभी तो कई शंकराचार्य पर कोर्ट के मुकदमे चल रहे हैं कि हम हैं कि तुम हो। अब आप बताइए. कि ये धर्म गुरु हैं या बाबा लोग हैं। बाबा लोग आकर उपदेश दे रहे हैं। भाषण दे रहे हैं। उनके सामने सब लोग बैठे हैं। सोने के सिंहासन पर बैठे हैं। तो सुप्रीम कोर्ट जो है वह केवल शाब्दिक मैसेज दे रही है। शाब्दिक मैसेज फैसला नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट में टिप्पणियां हो रही हैं। मैं कहना चाहता हूं कि सुप्रीम कोर्ट को टिप्पणी करना बंद करना चाहिए। उसके कई परिणाम होते हैं। नंबर एक परिणाम यह होता है कि देश में एक गलत विश्वास जगता है जो बाद में आपके खिलाफ जाएगा। आप रोज जो बोल रहे हैं रोज आपका जो झूठ छप रहा है वह वज़ह बनेगा। झूठ छप रहा है आपका वो और उसकी कोई कानून की मान्यता नहीं है। आप जो बोल रहे हैं वो आदेश में नहीं है। वो आदेश नहीं है। तो सुप्रीम कोर्ट जो है ये उपदेश की संस्था नहीं है। ये आसाराम बापू नहीं है। ये निर्णय की संस्था है। आप निर्णय करिए ना। आप पेशी पर पेशी बढ़ाते जाते हैं। आप समय देते जाते हैं। क्यों देते जाते हैं आप? आप कहते हैं साहब पेशी बढ़ रही है। अरे आप पेशी कम अरें, आप रद्द करिए ना कि नहीं हम नहीं ले रहे। हमने इसको रद्द कर दिया। ये कानून गलत है। इसको हम रद्द कर रहे हैं। फंडामेंटल राइट के खिलाफ है ये। जस्टिस के बेसिक प्रिंसिपल के खिलाफ है। तो सुप्रीम कोर्ट की जो क्रेडिबिलिटी है, देखिए, सारी संविधानिक संस्थाओं की क्रेडिबिलिटी आज खत्म है। सरकार की कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है। पार्लियामेंट की क्रेडिबिलिटी नहीं है। चुनाव आयोग की क्रेडिबिलिटी नहीं है। ब्यूरोक्रेसी सरकार की गुलाम नौकर बन चुकी है। तो कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है। बस ब्यूरोक्रेसी है। सुप्रीम कोर्ट बचाता है उसे। कोई क्रेडिबिलिटी नहीं बच रही है। तो अगर सारी संस्थाएं अविश्वसनीय हो जाएंगी, जो लोकतंत्र की संस्थाएं हैं, तो फिर लोकतंत्र नहीं बचेगा। अब लड़ाई संस्थाओं को बचाने की नहीं है। अब लड़ाई व्यक्तियों की नहीं है। अब लड़ाई भारतीय लोकतंत्र की स्थापना का जो मूल विश्वास है - जनविश्वास, उसकी है, वो कैसे कायम रहे उसको बचाने की।

राजीव - इस बीच देखिए ऑपरेशन सिंदूर भी हुआ। थोड़ा थोड़ी चर्चा विदेश मामलों की। आपप विदेश नीति को बहुत नजदीक से आप जानते हैं। आपने सार्क कंट्रीज का आपने लीड किया है। उस हिसाब से भी, आपसे समझना चाहता हूं। पिछले कुछ साल में हमने देखा कि हमारा रिलेशन पाकिस्तान के साथ और चीन के साथ तो खराब रहा ही है। शुरुआत से ही। लेकिन हमारा रिलेशन जो है, नेपाल के साथ खराब हुआ, भूटान के साथ खराब हुआ, अभी पिछले दिनों बांग्लादेश के साथ खराब हुआ। म्यांमार के साथ, फिर उधर मालदीव के साथ, फिर श्रीलंका के साथ। ऐसे दौर में पाकिस्तान के साथ जो ऑपरेशन सिंदूर हुआ उस पर आपकी टिप्पणी चाहता हूं।

रघु ठाकुर - देखिए, क्या है कि हमारे भारत की जो विदेश नीति है आप माफ़ करना थोड़ा मैं पुराने दिनों में जा रहा हूं। आजादी के बाद से स्वतंत्र विदेश नीति नहीं रही। ये जवाहरलाल जी के टाइम भी नहीं रही। कहने को उन्होंने गुटनिरपेक्ष नीति बनाई। परंतु दिमागी तौर पर हम लोग कहीं ना कहीं रूस के पिछलग्गू बने रहे। और ज्यादा नजदीक हमारा रूस है। हम एक क्रांतिकारी कृत्रिम आवरण बनाना चाहते हैं। अब देखिए कि रूस में क्रांति हुई। तो रूस का क्या परिणाम हुआ वो आप सब देख रहे हैं। उसके बाद एक दौर बदला। और उस समय चीन के साथ भी उन्होंने दोस्ती की। हालांकि मैं फिर कहूं कि एक और आदमी लोहिया था। आप देखिए कि आदमी का आकलन और दृष्टि क्या थी। जिस दिन हिंदुस्तान में पंचशील का समझौता हो रहा था। नेहरू और चाऊ एन लाई के जिंदाबाद के नारे लग रहे थे इसी दिल्ली शहर में। एक अकेला आदमी, दो चार लोगों को लेकर. झंडा ले खड़ा हुआ था कि चीन से धोखा होगा। वो लोहिया था। और जो लोहिया ने कहा था वो पांच साल बाद ही सही हो गया। तो, किसी देश के बारे में आकलन करना कि उस देश के लोगों का मानस और सोच का तरीका क्या है? काम करने का तरीका क्या है? ये लोग पढ़ते थे। विदेश नीति खाली व्यक्ति पर नहीं होती। एक मानसिकता भी होती है। कलेक्टिव मानसिकता भी होती है। उसके बाद का फिर दौर आया तो चीन से धक्का खाया। रूस से मित्रता रही, परंतु बहुत लाभ नहीं हो पाए। तो अमेरिका की तरफ चले गए। तो भारतीय विदेश नीति की जो स्थिति आज के दौर में है वह शटल काक की तरह है। तीन प्लेयर हैं जो शटल कॉक के बड़े खिलाड़ी हैं। और भारत जो है ये शटल कॉक को उठाने वाला है। तो यही हमारे प्रधानमंत्री जी हैं, मोदी जी, जो पहले गलबहियां कर रहे थे ट्रंप के साथ। मोदी ट्रंप जिंदाबाद। हमारा बड़ा भाईचारा है। हमारे परम मित्र हैं ट्रंप। देखिए, दुनिया का किसी भी देश की विदेश नीति का सबसे बड़ा आधार क्या होता है? एक तो विदेश नीति को ऐसे लेना चाहिए जो एक दौर में लोहिया कहते थे कि हमको दुनिया को एक ऐसी दिशा में ले जाने का प्रयास करना चाहिए जो विश्व संसद की ओर जाए। सबसे अच्छी दुनिया उस दिन बनेगी जिस दिन विश्व की एक संसद बन जाए। 18 साल के लोगों के वोट देने का मामला हो। ना आतंकवाद रहेगा, ना सीमा का विवाद रहेगा, ना निर्वासन का झगड़ा रहेगा ना कोई झगड़ा रहेगा। और शायद पूंजीवाद भी ना रहे। दूसरा, भारत पाकिस्तान के बीच भी शायद इस तरह का झगड़ा न रहे दैसा लोहिया ने कहा था। लोहिया ने उस जमाने में ये बात कही थी - भारत पाक महासंघ की और मैंने उसको और आगे बढ़ाया था। शायद आपको याद हो कि 1997- 98 में हमने इसी दिल्ली शहर में एक सार्क सिटीजन फोरम का सम्मेलन किया था जिसमें बर्मा को छोड़ के सब देशों के प्रतिनिधि आए थे। पाकिस्तान से लोग आए थे। बांग्लादेश से लोग आए थे। आपके नेपाल से आए थे। हिंदुस्तान के तो थे ही, अफगानिस्तान से आए थे। खाली बर्मा के नहीं आ पाए थे। कि इन देशों को एक होना चाहिए। पहले आप क्या कर रहे थे? पहले आप पश्चिम की ओर देख रहे थे। तो एक दौर में आप देखिए. कि अटल जी जो हैं वो बस ले जा रहे हैं। हमारे देश की याददाश्त बड़ी कमजोर है। और दूसरा, मैं एक बात और कहूं कि हिंदुस्तान में लोग कितना भी कहें। जाति कुछ हद तक टूट रही होगी शादी विवाह में मामूली तौर पर। पर जो जातीयता की सोच है वो नहीं टूट रहा। वो अंदर बैठा हुआ है। हिंदुस्तान की संसद पर हमला हुआ किसके कार्यकाल में?

राजीव - अटल जी के टाइम में....

रघु ठाकुर - और देखिए। अटल जी भाजपा के लिए भी महान हैं और कांग्रेस के लिए भी महान हैं। अब देखिए, ये जो कांग्रेस भाजपा के लोग कहते रहते हैं, जो लड़ते रहते हैं, परंतु, नहीं, अटल जी महान हैं जिनके कार्यकाल में कांधार हुआ. कारगिल की लड़ाई क्या थी, कोई लड़ाई थी? भाई, हमारे घर में डाकू घुसा है, ये कोई लड़ाई है क्या? अरे चोर निकाल दिया उसकी लड़ाई है। वो कह रहे हैं यहां युद्ध हो गया।

राजीव - ये वैसे ही डोकलाम में हुआ कि जैसे कोई घुस आया...

रघु ठाकुर - तो इस देश में कहीं ना कहीं वैचारिक तौर पर तो मनुस्मृति काम कर रही है न? यही अपराध कोई और करता, मान लीजिए कि मनमोहन सिंह जी के कार्यकाल में हो जाता, मान लीजिए कि ये आज के कार्यकाल में हो जाता तो ज्यादा गालियां पड़तीं। लेकिन वो तो अटल जी थे। मंगल भवन मंगल हारी, अटल बिहारी अटल बिहारी। तो देखिए, कोई नहीं बोला। और देखिए आज जो लोग कह रहे हैं ना कि साहब कांग्रेस वाले ये कह रहे हैं साहब भाजपा को और सब झगड़ा है। काहे का झगड़ा है। अरे भाई, तुम्हारा तो दोनों का एक ही गुरु है न - अटल जी के लिए जितनी जोर से भाजपा वाले बोलते हैं उससे ज्यादा जोर से कांग्रेस वाले बोल रहे हैं – जिंदाबाद। क्या अंतर है? ये काहे को बेवकूफ बनाते हो लोगों को? पर हम लोगों से बचने वाले नहीं है। तो वो जो था जब हम लोगों ने सार्क सिटीजन फोरम किया था, एक प्रयास किया था वो भी, उस समय सरकार का रुझान अलग प्रकार का था। अब सरकार का ये आ गया कि - ब्रिक्स। ये ब्रिक्स क्या है? तो इनके इनके दिमाग में भारतीय विदेश नीति का कोई नक्शा नहीं है। एक तो कटु सत्य हुआ कि हिंदुस्तान में इस समय दो प्रधानमंत्री काम कर रहे हैं, जो अभी तक नहीं होते थे।

राजीव - कौन-कौन है?

रघु ठाकुर - एक प्रधानमंत्री वो हैं जो प्रधानमंत्री फॉर नैटिव वर्क हैं, और एक प्रधानमंत्री जो हैं वह फॉर आउटसाइड वर्क। तो इस समय मोदी जी जो हैं ये विदेशी प्रधानमंत्री हैं और अमित शाह जी हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री हैं। तो मोदी जी घूम रहे हैं। अब ऐसा लगता है कि शायद उनको कुछ कह दिया हो, चाहे संघ वालों ने कहा हो कि भाई, तुम यहां मत देखो। तुम वो देखो। तो वह यहां ठहरते नहीं है। यहां मणिपुर में आग लग जाए तो उनको कोई मतलब नहीं है। यहां देश जल जाए तो उनको कोई मतलब नहीं है। विदेश देख रहे हैं।

राजीव - मतलब ये भी माना जाए कि असल में ये सरकार संघ चला रहा है।

रघु ठाकुर – देखिए, इसमें तो कोई छिपा है ही नहीं। और मोहन भागवत जी ने जो बयान दिया अभी अभी उनकी एक प्रश्नोत्तरी हुई तीन दिन की। हालांकि वो प्रश्नोत्तरी क्या होती है? वो तो एक पक्षीय होती है। हमारे एक मित्र हैं, वह संघ में हैं। तो वह जा रहे थे, बोले कि साहब, हम जा रहे हैं.. मोहन जी की आज प्रश्नोत्तरी है। तो हमने कहा, भाई आप लोग तो प्रश्न कर ही नहीं सकते, क्योंकि आपका तो सिद्धांत ही अलग है। संघ का जो सिद्धांत है वो क्या है, संघ का सिद्धांत है एक चालकानु वरतित्व... और गुरु गोलवकर जी ने अपनी किताब में विचारनीति पर लिखा है कि जिस प्रकार से एक गढ़रिया होता है और 100 भेड़ों का झुंड उसके पीछे चलता है। जहां मुड़ जाएगा, वहां मुड़ेंगे। उसी प्रकार से संघ के कार्यकर्ता के लिए है कि वो अपने मुखिया के पीछे चलें। तो मानसिक तौर पर इंसान को भेड़ में बदल दिया जाता है तब वो संघ वाला बन जाता है। इसका तो यही मतलब हुआ ना? मैं तो नहीं कहता, उन्होंने ही कहा है। और एक दृष्टिकोण उनका बन जाता है कि उन्हें तो पीछे चलना है। तो उन्होंने कहा कि भाई, संघ जो है वो सरकार की बात का समर्थन करता है, सरकार से कहता नहीं है। और संघ वाला जो है, सरकार में है, वो संघ की बात को समझता है लेकिन पूछता नहीं है। देखिए, कितना बढ़िया तारतम्य है। कि आप हमसे सवाल पूछ रहे हैं तो हम उत्तर दे रहे हैं पर आप पूछ भी नहीं रहे लेकिन हम समझ रहे हैं कि आप क्या पूछ रहे हैं और हम उत्तर दिए जा रहे हैं। इससे बढ़िया कुछ हो सकता है? ये तो गजब का तारतम्य है इनके बीच में। तो नियंत्रण तो उन्हीं का है। विज्ञान भवन में कुछ समय पहले संघ की बैठक हुई। तो संघ सरकारी नहीं है? आप बताइए कि जब संघ है, अगर ये संस्था गैर सरकारी संस्था है तो विज्ञान भवन में बैठक कहां से हो गई? तो ये तो सिद्ध हो गया कि पहले जो सर संघसंचालक थे उनकी विचारधारा से भिन्नता थी। गुरु जी के विचार से हम लोग भिन्न हैं। संघ से भिन्न हैं। पहले वो लोग जाते थे तो बगैर सुरक्षा के रहते थे और किसी कार्यकर्ता के यहां रहते थे। अब कहां ठहरते हैं? अब तो संघ का मामूली प्रचारक जो है, वो भी फाइव स्टार में ठहर रहा है। मोहन भागवत जी के लिए जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त है। मोदी ने बहुत चतुराई से काम किया। मोदी बड़े चतुर आदमी हैं इस मामले में। वो समझ रहा है कि भाई, बाहर का खतरा तो उन्होंने निपटा लिया। कुछ अपना एक हिंदू छवि बना कर निपटा लिया। कि साहब ये बड़ा बढ़िया हिंदू है। ये हिंदू राष्ट्र कायम करेगा - वगैरह वगैरह। कुछ मशीन से निपटा लिया, कुछ चुनाव आयोग से निपटा लिया, कोई इडी के डर से निपटा लिया। तो अब खतरा है भीतर का। तो भीतर वालों को कैसे ठीक करो? तो भीतर वालों को पैसे से ठीक करो। इनको पैसे दिलाओ। इनकी आदतें बिगाड़ दो। जैसा ब्रिटिश काल में, ब्रिटिश साम्राज्य में अपने साम्राज्यवाद को स्थापित करने के लिए, अपनी संस्कृति को लाए थे। तो मोदी जी ने संघ में अब पैसा संस्कृति ला दी है। संघ को मिटाने का काम हमलोग नहीं कर पाए। हम गुनहगार हैं। पर मोदी जी को धन्यवाद देना चाहिए कि मोदी जी संघ की उस पूंजी को मिटा रहे हैं। और मिटा दिया उन्होंने। जब तक अब सत्ता है, तब तक संघ है, जिस दिन सत्ता नहीं रहेगी, उस दिन कोई पता नहीं कि क्या होने वाला है

राजीव - और फिर जो पार्टी है बीजेपी, वो तो दो ही लोगों की पार्टी बची है…

रघु ठाकुर - दो ही लोगों की तो छोड़िए, राजनीति का फंडामेंटल है वह भी नहीं बचा न... हम जब 63 में संयुक्त समाजवादी पार्टी यानी संसोपा के मेंबर बने राजीव भाई, तो हमारे लिए जो बनने की शर्तें थीं मालूम है क्या थी? हम जिले के कन्वीनर बने और पहले छोटी सी पार्टी थी। पर शर्त थी लोहिया की कि वो पदाधिकारी बनेगा, सक्रिय मेंबर बनेगा जो तीन बार आंदोलन में जेल गया हो और तीन शिविर में शामिल हुआ हो। तो हमारी कसौटी थी कि भैया, तीन बार कम से कम जेल जाना है, इंकलाब जिंदाबाद बोलो, जेल जाओ। और तीन शिविर अटेंड करो। तब हम पद पर बन पाएंगे। भारतीय जनता पार्टी तो अब टेलीफोन मेंबरशिप पार्टी है। मिस्ड कॉल दीजिए, मेंबर बन जाइए। तो मिस्ड कॉल की मेंबरशिप है। जिस दिन सरकार नहीं होगी, मिस्ड कॉल वाले कहीं और मिस्ड कॉल कर देंगे। तो जो सवाल आपने किया था कि जहां तक हमारी विदेश नीति का सवाल है तो आज भारत की जो स्थिति है हम लोग सबसे बद्तर स्थिति में हैं। मैं बांग्लादेश के मामले में थोड़ा सा भिन्न राय इसलिए रखता हूं। क्योंकि बांग्लादेश में जो घटनाक्रम हुआ है उसमें भारत सरकार का थोड़ा एक वैचारिक पक्ष तो हो सकता है पर बांग्लादेश के भीतर भी एक सांप्रदायिक दौर आ रहा है और आया है। वहां लड़ाई भारत की नहीं थी। लड़ाई तो हसीना की और उनकी हुई है ना। और उसके जो कारण है उसको भारत को समझना जरूर चाहिए। मैं इसलिए कह रहा हूं कि अभी वहां पर यह हुआ कि हसीना ने जो लोग मुक्ति वाहिनी के थे, उनके थर्ड जनरेशन के लिए आरक्षण दिया। इसका कुछ छात्रों ने विरोध किया। मैं ये मानता हूं कि ये अकेले छात्रों का विरोध नहीं था। इसके पीछे इंटरनेशनल लाबीज हैं। पैसा है। सब कुछ काम कर रहा है। और उनको लगा अभी हसीना के लिए... देखिए जो दुनिया के कॉरपोरेट हैं न.. वह सरकारों को स्थिर नहीं रहने देते क्योंकि उनको तो अपने लिए ब्लैकमेल करना है। तो वो कभी हसीना को लाएंगे, तो कभी यूनुस को लाएंगे तो कभी किसी और को ले आएंगे फिर याहिया की पत्नी को लाएंगे, फिर इनको लाएंगे। क्योंकि ये कमजोर रहेंगे.. फिर कहेंगे, कि देखो तुम्हें रहना है ना तो आओ, हमारी शरण में आ जाओ।

राजीव - भारत में भी ऐसा होता है क्या...

रघु ठाकुर - भारत में भी ऐसा हो रहा है और हुआ है। उसकी चर्चा करेंगे। पर ये चर्चा पहले थोड़ी सी कर लें... वहां का थोड़ा भिन्न मामला है... परंतु आज भारत का दोस्त कौन है। आप कह सकते हैं, कहते हैं बहुत पुराना जुमला है कि साहब, हमारा दोस्त रूस है। हमारी बड़ी पुरानी मित्रता है। परंतु रूस जो यूक्रेन में कर रहा है क्या उचित है? और जो लोग आज रूस को फिर से अपना मानने लगे हैं, हमारे वामपंथी मित्र, उनसे मैं कहना चाहता हूं कि रूस अब कम्युनिस्ट नहीं बचा है। रूस कैपिटलिस्ट से भी बदतर हो गया है। क्योंकि कैपिटलिज्म जहां है वहां पर कम से कम कैपिटलिज्म की डेमोक्रेसी है। बेशक नाम की ही सही। पर वोट देने का अधिकार तो है ना। अमेरिका में वोट देने का अधिकार है। हिंदुस्तान है। हमारे यहां पूंजीवाद नहीं है लेकिन पूंजीवादी नौकर हैं। परंतु हमारे यहां वोट देने का अधिकार है। परंतु जहां कम्युनिस्ट देश डिक्टेटर बन गए हैं वहां पर तो केवल व्यक्ति की तानाशाही है। चीन है। दूसरा, यूक्रेन पर जो वो हमला कर रहा है। ये कैसे आप जस्टिफाई करेंगे? आपको तेल सस्ता मिल सकता है। मैंने मान लिया है। परंतु आप उसके लिए कल्पना करिए कि साहब, यह हमारा है, इसलिए हम इस कब्जा करके रहेंगे। कल मान लो चीन कहे कि साहब अरुणाचल हमारा है, हम कब्जा करके रहेंगे। तिब्बत पर कब्जा करके बैठा है। फिर आप क्या करेंगे? तो दुनिया में किसी भी ऐसे सिद्धांत का समर्थन कभी नहीं करना चाहिए जो सिद्धांत मानवता के भविष्य के लिए खतरा है। पर भारत की स्थिति ये है कि भारत में जो भी हमारे सत्ताधीश हैं, ये बड़बोले हैं। और ये क्या है कि ये हिंदुस्तान में पिछले 11 साल से सत्ता में है और 15 साल लाचारी है। तो ये बड़बोलेपन में सत्ता में हैं।

राजीव - लेकिन रूस के साथ भी अभी थोड़ी नजदीकियां बढ़ रही हैं। पिछले 10 11 साल से रूस काफी नाराज दिख रहा था। क्या है? क्योंकि भारत ने अपनी जो सैन्य आपूर्ति के लिए जितने फंड थे भारत के वो डिस्ट्रीब्यूट कर रहा था। भारत ने अमेरिका को दिया। भारत ने इजराइल को काफी आगे बढ़ाया। इजराइल से खूब हमने इंपोर्ट किए। हमने रफाइल फ्रांस से इंपोर्ट किया। हमने जर्मनी को पैसा दिया। हमने ब्रिटेन को पैसा दिया।

रघु ठाकुर - आप यह कह रहे हैं, यह एक अर्थ में सही है। इसका दूसरा अर्थ ये हुआ कि भारत के पास अपना कुछ नहीं है। और ना अपना दोस्त है। है ना? जो दोस्त रूस था वो आज की तारीख में वो आपका दोस्त नहीं है। रूस तो आपको अपना तेल बेच रहा है। अमेरिका ने पाबंदी लगाई। तो अमेरिका की पाबंदी लगाने के कारण से कुछ देश हैं जो अमेरिका के प्रभाव वाले देश हैं, जो नाटो वाले देश हैं, वो उनका तेल नहीं ले रहे। वो आपको कह रहा है कि सस्ता लो, हमसे लो। परंतु यह आपकी दोस्ती नहीं है। कल मौका पाएगा तो आपकी क्या मदद करने वाला है... और दूसरा क्या है कि जिस दिन नाटो के देश चाह लेंगे उस दिन तेल हिंदुस्तान आएगा कहां से... अगर स्वेज नहर बंद कर दी जाए तो कहां से तेल आएगा... तो आपके पास तेल कहां बचेगा... तो दुनिया में कोई किसी का दोस्त नहीं है। आज की जो स्थिति उसमें वही देश सफल है जिसकी विदेश नीति सबसे सफल है। हिंदुस्तान की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता ये मानता हूं कि हिंदुस्तान के शासक दुनिया के दोस्त हैं पर अपने देश के दोस्त नहीं। ये है फंडामेंटल कमी.. बुराई। ट्रंप जो है वो अपने देश के लिए कर रहा है। उसको पता है कि भाई, हमारे यहां बेरोजगारी बढ़ रही है। हमें लोगों को काम देना है। अब हमें जरूरत नहीं है। हम लोगों को हटा रहे हैं। दूसरे देश भी हटाएंगे। दुबई भी हटाएगा और देश भी हटाएंगे। तो वो अपने देश के लिए तो कर रहा है ना। ये किसके लिए कर रहे हैं? अब आप चीन के पास गए। तो चीन के साथ क्या होगा? कल प्रधानमंत्री की फोटो छपेगी। खड़ा रहेंगे। शिन जिन पिंग एक तरफ रहेंगे। एक तरफ से मोदी जी हो जाएंगे। फोटो आ जाएगी और कहेंगे हम लोगों की बड़ी पुरानी मित्रता है। तुम क्या बोल रहे थे 5 साल पहले... अभी छ महीने पहले.. तुम क्या बोल रहे थे कि चीनी माल का बहिष्कार करो ....अब तुम चीन के लिए दरवाजा खोल रहे हो और चीनी माल का बहिष्कार जब तुम कर रहे थे तब भी तुम क्या कर पा रहे थे? हिंदुस्तान का व्यापार करने वाला जो व्यक्ति है, वो व्यापारी भाई बुरा ना माने... मैं आपको प्रमाण के आधार पर कह रहा हूं। उनको भी बताना चाह रहा हूं कि उसका ईमान धर्म क्या है? हमारे यहां एक कहावत चलती है राजीव भाई। एक सेठ जी थे वे मरे तो फैसला होने के लिए गए भगवान के पास। भगवान ने पूछा कि भाई तुम कहां जाना चाह रहे हो सेठ .... नरक में कि स्वर्ग में... तो वो बोला.. भगवान, जहां दो पैसा मिले वहां भेज दो। कोई चिंता नहीं आप नरक भेजो, स्वर्ग भेजो। इनका राष्ट्रवाद क्या है... मेरा एक कार्यकर्ता था. वो गरीब परिवार का था.. तो दिवाली पर दुकान लगाता था। तो उस साल भी ये चीन के साथ बड़ा झगड़ा हुआ था। बात चल रही थी कि उसकी दुकान पर जो बेचारा काम करता था पर मालिक दूसरा था.. तो उसमें दो स्टार लगे थे। तो जो भारतीय माल था वो महंगा था और चीनी वाला सस्ता था। जैसे चीन का पटाखा है, मान लीजिए कि एक बम है, चीनी वाला बम है.. फोड़ने वाला.. तो वह ₹20 का है और भारत वाला ₹60 का है। तो हमसे उससे पूछा कि क्यों है भाई ये... उसने कहा कि कुछ नहीं है हमारा। हमसे मालिक ने कहा है कि इसपर चीन का लेबल लगा दो। इसपर भारत का। तो वो ₹20 का पटाखा वो ₹60 में बेच रहा है। वो कह रहा कि चीन वाले ले लो तो ₹20 का ले लो। ₹60 वाले ले लो तो यह भारत का। तो हिंदुस्तान के जो ये राष्ट्रवादी लोग हैं जो अपने आप को कहते हैं, यह तो भैया ₹40 के मुनाफे में देश बेच देते हैं। तो क्या कोई राष्ट्रवादी हैं ये। अरे राष्ट्रवादी तो हिंदुस्तान का किसान है, गरीब है, मजदूर है। जो बगैर किसी स्वार्थ के भी अपने देश के लिए लगा रहता है। बेचारा उसकी चिंता करता है। तुम्हारे राष्ट्रवाद के चक्कर में आकर तुम्हें वोट दे देता है। भले गुमराह होकर देता है पर दे देता है। तुम तो बेच रहे हो ना। काहे का तुम्हारा राष्ट्रवाद? अब कहां तुम्हारा चला गया स्वदेशी का काम? अब कह रहे थे कि स्वदेशी होना चाहिए। अभी क्या कह रहे थे? आपकी स्वदेशी की सफलता, आप इसमें देख लीजिए। आपने चर्चा की शुरूआत की थी ऑपरेशन सिंदूर की। ऑपरेशन सिंदूर के समय ही आपको याद होगा कि आईएमएफ ने बहुत बड़ा पैसा दिया पाकिस्तान को। और हिंदुस्तान के समर्थन में एक भी देश नहीं आया। ना रूस, ना अमेरिका, ना चीन, ना कोई। कोई नहीं आया। पाकिस्तान को पैसा दिया कि लड़ो। तो इनको ये भी समझ में नहीं आ रहा। आज के समय में और पहले के समय में फर्क यह है जवाहरलाल जी की विदेश नीति गलत थी, उसमें भावुकता थी, उनकी भावुकता जो थी या उनके मन में एक भाव था कि हम दुनिया में बड़े डेमोक्रेट कहलाएं। तो वो जो जमीनी स्तर से उनको भूल जाते थे दिखावा था, हिपोक्रेसी थी। परंतु दिवालियापन नहीं था। पर आज की तारीख में हमारे यहां दिवालियापन है। कोई पता नहीं है कि क्या होना है। यहां बैठ के बोल रहे हैं। अरे साहब, ये इकॉनामी हमारी बढ़ रही है। 6 से 7% हुई है। लेकिन खबर आई और हमारे देश के कॉरपोरेट ने कहा है कि जैसा कोरोना काल में मदद उन्हें की थी, हमें वही मदद करो। अगर इक़नॉमी बढ़ रही है तो कॉरपोरेट पैसे काहे को मांग रहा है। क्यों मांग रहे हो? और तुम क्यों दे रहे हो? ₹25000 करोड़ की एक पहली किस्त दे भी दी गई उनकी मदद के लिए। तो आप बताइए कैसे बढ़ रही है इकॉनॉमी। इस समय विदेश नीति बहुत दिवालीपन की ओर है। हम कहीं भी भटक रहे हैं। हमें अमेरिका ने लात लगाई तो हम चीन के पास चले गए जो हमको कल तक लातें मारता रहा। अब अगली बार मौका आएगा तो हमको एक लात अमेरिका मारेगा एक लात चीन। दोनों मिलकर साथ मारेंगे। फिर पीछे एक पाकिस्तानी हुक्का मारेगा कहां जाओगे? भारत एक बहुत दुखद स्थिति में खड़ा है। निपट अकेला है। ना देश में एकजुटता है। ना भारत के पास कोई समझ है। एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है। भारत का कोई साथी और भारतीय विदेश नीति भी इस प्रकार की है। और भारत का प्रतिपक्ष भी उतना ही दिवालिया है। क्योंकि उनके पास इस बात को लेकर कोई सोच नहीं है। हम एक बड़े संकट के दौर में है। ये संकट है हमारे यहां का।

राजीव – बेशक, बहुत संकट के दौर से गुजर रहे हैं हम... बातें बहुत सी करने की है लेकिन आपका काफी वक्त लिया... रघु ठाकुर जी आप हमारे साथ आए, इतने विस्तार सेऔर दिलचस्प तरीके से स्थितियों को समझाया, इसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।


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