शरीर के साथ मन का भी अभ्यास
नई दिल्ली, योग को अक्सर लोग केवल शारीरिक व्यायाम या अलग-अलग आसनों तक सीमित समझते हैं।

नई दिल्ली, योग को अक्सर लोग केवल शारीरिक व्यायाम या अलग-अलग आसनों तक सीमित समझते हैं, लेकिन वास्तव में योग शरीर के साथ-साथ मन को स्वस्थ और शांत रखने का भी अभ्यास है।
योग में धारणा को एकाग्रता का अभ्यास कहा जाता है। इसका सीधा मतलब है अपने मन को किसी एक वस्तु, विचार या विषय पर टिकाना। आमतौर पर हमारा मन एक जगह स्थिर नहीं रहता। कभी हम बीती बातों के बारे में सोचते हैं, तो कभी भविष्य की चिंता में उलझ जाते हैं। ऐसे में किसी एक चीज पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है। धारणा इसी भटकते हुए मन को एक दिशा देने का अभ्यास है। इसमें व्यक्ति अपनी आंखों के सामने जलते दीपक की लौ, दोनों भौंहों के बीच के स्थान या किसी देवी-देवता की तस्वीर को एकाग्रता का केंद्र बना सकता है। लगातार अभ्यास करने से मन को एक जगह टिकाने की क्षमता बेहतर हो सकती है।
वहीं, ध्यान यानी ध्यान लगाने की प्रक्रिया धारणा से एक कदम आगे है। जहां धारणा में मन को किसी एक विषय पर केंद्रित करने की कोशिश की जाती है, वहीं ध्यान में उसी विषय की ओर चेतना का प्रवाह लगातार और बिना किसी रुकावट के बना रहता है। शुरुआत में हमें मन को बार-बार एक जगह लाने की जरूरत पड़ती है, लेकिन जब एकाग्रता गहरी होने लगती है और ध्यान लगातार उसी विषय पर बना रहता है, तो यह ध्यान की अवस्था कहलाती है। इसे धारणा का स्वाभाविक अगला चरण भी माना जाता है।
धारणा और ध्यान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। धारणा मन को एकाग्र करने की तैयारी करती है, जबकि ध्यान उस एकाग्रता को गहराई और निरंतरता देता है। इनका अभ्यास करने के लिए किसी शांत जगह पर बैठकर शुरुआत की जा सकती है। सबसे पहले अपनी सांसों पर ध्यान दें या किसी एक वस्तु को एकाग्रता का केंद्र बनाएँ। इस दौरान मन भटके तो परेशान होने के बजाय धीरे-धीरे उसे वापस उसी विषय पर ले आएं। नियमित अभ्यास के साथ मन को शांत रखने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।


