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इंजेक्शन की जगह मुंह से दवा भी उतनी ही असरदार

नई दिल्ली, दुनियाभर में हर साल लाखों बच्चे निमोनिया जैसी खतरनाक बीमारी की चपेट में आते हैं और बड़ी संख्या में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है।

इंजेक्शन की जगह मुंह से दवा भी उतनी ही असरदार
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नई दिल्ली, दुनियाभर में हर साल लाखों बच्चे निमोनिया जैसी खतरनाक बीमारी की चपेट में आते हैं और बड़ी संख्या में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है। गरीब और विकासशील देशों में यह बीमारी बच्चों की मौत का बड़ा कारण बनी हुई है। ऐसे में अब एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि निमोनिया से पीड़ित बच्चे की तबीयत में सुधार होने के बाद इंजेक्शन की जगह मुंह से दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवा देना पूरी तरह सुरक्षित और असरदार है।

दरअसल, सिटी सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, यूसीएल इनोवेटिव क्लिनिकल ट्रायल्स यूनिट और अफ्रीका व यूरोप के कई वैज्ञानिकों ने मिलकर ये रिसर्च तैयार की है। इसके नतीजे दुनिया की प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर भविष्य में इस रिसर्च के आधार पर इलाज के नियम बदले जाते हैं, तो दुनियाभर में लाखों बच्चों को इसका फायदा मिल सकता है।

रिसर्च में बताया गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सलाह के अनुसार, गंभीर निमोनिया वाले बच्चों को कम से कम पांच दिन तक इंजेक्शन के जरिए एंटीबायोटिक दी जाती है। इसके कारण कई बच्चों को अस्पताल में जरूरत से ज्यादा समय तक रहना पड़ता है। कई बार ऐसा होता है कि बच्चे की हालत पहले ही काफी बेहतर हो जाती है, लेकिन इलाज पूरा करने के लिए उसे अस्पताल में ही रखना पड़ता है।

डॉक्टरों का कहना है कि अस्पताल में ज्यादा दिन तक रहने से कई तरह की परेशानियां बढ़ जाती हैं। इलाज का खर्च बढ़ता है, अस्पतालों पर मरीजों का दबाव बढ़ता है और बच्चों में अस्पताल के अंदर होने वाले दूसरे संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। साथ ही, लंबे समय तक अस्पताल में रहने से बच्चे और उनके परिवार मानसिक और आर्थिक दोनों तरह की परेशानी का सामना करते हैं।

इन्हीं समस्याओं को देखते हुए वैज्ञानिकों ने पेडीकैप नाम से एक रिसर्च की। इस रिसर्च में दो महीने से छह साल तक की उम्र के 1,101 बच्चों को शामिल किया गया। इन बच्चों को बीमारी गंभीर होने के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। यह रिसर्च दक्षिण अफ्रीका, युगांडा, जाम्बिया, जिम्बाब्वे और मोजाम्बिक के 13 अस्पतालों में किया गया।

रिसर्च के दौरान सभी बच्चों का इलाज डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन के मुताबिक शुरुआत में इंजेक्शन वाली एंटीबायोटिक से किया गया। इसके बाद डॉक्टरों ने बच्चों की हालत पर नजर रखी। जिन बच्चों की तबीयत में सुधार दिखा, उनमें से कुछ को इंजेक्शन बंद करके मुंह से दी जाने वाली एमॉक्सिसिलिन दवा दी गई। कुछ बच्चों को एमॉक्सिसिलिन-क्लैवुलानेट दी गई, जबकि बाकी बच्चों को पूरे पांच दिन तक इंजेक्शन ही दिया गया।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने तीनों समूहों के बच्चों की सेहत की तुलना की। उन्होंने देखा कि कौन-से बच्चे जल्दी ठीक हुए, कितनों को दोबारा अस्पताल आना पड़ा और कितनों की हालत बिगड़ी। नतीजे चौंकाने वाले थे। जिन बच्चों को इंजेक्शन की जगह मुंह से दवा दी गई, उनकी रिकवरी भी उतनी ही अच्छी रही जितनी इंजेक्शन लेने वाले बच्चों की।

रिसर्च में सामने आया कि इलाज के 28 दिनों के अंदर दोबारा अस्पताल में भर्ती होने या मौत की दर तीनों समूहों में लगभग समान रही। एमॉक्सिसिलिन लेने वाले बच्चों में यह दर 6 प्रतिशत, एमॉक्सिसिलिन-क्लैवुलानेट लेने वालों में 7 प्रतिशत और पूरे पांच दिन तक इंजेक्शन लेने वाले बच्चों में 6 प्रतिशत रही।

रिसर्च में शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि बच्चों को कितने दिन तक एंटीबायोटिक देना सबसे सही रहेगा। इसके लिए चार, पांच, सात और आठ दिन तक इलाज पाने वाले बच्चों की तुलना की गई। नतीजों में पता चला कि चार से पांच दिन का इलाज भी सात या आठ दिन के इलाज जितना ही असरदार था। यानी कई मामलों में बच्चों को जरूरत से ज्यादा दिन तक एंटीबायोटिक देने की आवश्यकता नहीं होती।

रिसर्च में सामने आया कि जिन बच्चों को इंजेक्शन की जगह मुंह से दवा दी गई, उन्हें औसतन एक दिन पहले अस्पताल से छुट्टी मिल गई। इससे अस्पतालों में बेड जल्दी खाली हो सकते हैं और दूसरे गंभीर मरीजों को समय पर इलाज मिल सकता है।


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