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राहुल ने रचा इतिहास

कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 22 अगस्त शनिवार को पुणे में इतिहास रच दिया। कोटा, देहरादून, प्रयागराज के बाद राहुल गांधी पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम करने पहुंचे थे

राहुल ने रचा इतिहास
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कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 22 अगस्त शनिवार को पुणे में इतिहास रच दिया। कोटा, देहरादून, प्रयागराज के बाद राहुल गांधी पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम करने पहुंचे थे, जिसके लिए उन्होंने पहले ही ऐलान कर दिया था कि इसमें लड़कियां बोलेंगी और बाकी सब सुनेंगे। यह कार्यक्रम के प्रचार का कोई तरीका नहीं था, बल्कि इस कार्यक्रम का आधार ही यही था। पुणे पहुंचने से पहले ही राहुल गांधी ने महिलाओं से उनके विचार एक सवाल पर मांगे थे कि हिंदुस्तान में महिला होने के क्या मायने हैं। देखने में यह सीधा सा सवाल लगता है, लेकिन इससे समाज में सदियों से चली आ रही लैंगिक गैरबराबरी पर विमर्श का नया पन्ना खुल गया। लड़कियों ने इस पर अपने जवाब राहुल गांधी को भेजे। इसके बाद पुणे में राहुल गांधी ने मंच से जो बातें कहीं, जिस तरह लड़कियों को बुलाकर उनकी रोजमर्रा की दिक्कतों पर बात की, वो अद्भुत, अकल्पनीय, असाधारण और अभूतपूर्व था।

आजाद भारत में आज से पहले कभी किसी नेता ने इस तरह लड़कियों को सशक्त करने की बात नहीं कही, जैसी राहुल गांधी ने पुणे में कही। 1948 में जब संयुक्त राष्ट्र में सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा के अनुच्छेद-1 में 'सभी पुरुष स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं' लिखा जाना था। तब भारत की तरफ से वहां मौजूद प्रख्यात समाज सुधारक हंसा मेहता ने इसका विरोध किया और उन्होंने इसे बदलकर 'सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं' करवाया। दुनिया ने यह समझा कि मानवाधिकार केवल पुरुषों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए हैं। लैंगिक बराबरी की जो बात 1948 में हंसा मेहता ने शुरु करवाई थी, पुणे में राहुल गांधी उसे ही आगे बढ़ाते हुए दिखे।

देश में लाखों बार महिला सशक्तीकरण की बात होती रही है। भाजपा के लिए तो महिलाएं वोटबैंक से ज्यादा कुछ नहीं हैं। इसलिए कभी मातृशक्ति तो कभी लाड़ली बहन के नाम पर उन्हें कुछ रुपए थमाकर भाजपा उनके वोट चाहती है और बदले में उन्हें सशक्त करने के सपने दिखाती है। लेकिन उस सशक्तीकरण की जमीन पर पुरुषों का ही हक होता है। मगर राहुल गांधी जैसा सवाल भाजपा महिलाओं से कभी नहीं कर पाई कि आप केवल मां, बहन, बेटी या पत्नी ही क्यों रहें, आपका महत्व केवल इन रिश्तों से नहीं है, बल्कि इनसे बढ़कर आपकी अपनी अलग पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व है।

राहुल गांधी ने पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता के कुछ उदाहरण पेश किए, जो संयोग से भाजपा और संघ नेताओं के ही निकले। जैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड और दीदी ओ दीदी जैसा बयान, मोहन भागवत का यह कहना कि भारत में रेप नहीं होते, इंडिया में होते हैं, मनोहर लाल खट्टर का बयान कि 80 प्रतिशत रेप लड़कियों के कारण ही होते हैं, ऐसे सारे वीडियो राहुल गांधी ने दिखाए और फिर एक सुलगता सवाल छोड़ा कि जंतर-मंतर प्रदर्शन में लड़कियों के गाली देने पर नरेन्द्र मोदी ने इसे सांस्कृतिक झटका बताया लेकिन लड़कों के गाली देने पर कुछ नहीं कहा, ऐसा क्यों। जनता इन बयानों को पहले सुन चुकी हैं, इन वीडियोज़ को देख चुकी है, लेकिन अलग-अलग वक्त और मौकों पर इन्हें देख कर थोड़ी बहुत चर्चा होती थी, फिर महिला सशक्तीकरण के दो-चार जुमलों के साथ बात वहीं खत्म हो जाती थी। मगर पुणे में राहुल गांधी ने विमर्श को एकदम नयी दिशा दे दी। उन्होंने भाजपा और संघ नेताओं के उदाहरण सामने रखकर कहा कि हमें ऐसा हिंदुस्तान नहीं चाहिए। ये मनुस्मृति वाला हिंदुस्तान है।

पाठक जानते हैं कि मनुस्मृति को लेकर भी आजादी के समय से कांग्रेस और संघ के बीच संघर्ष चलता रहा है। संघ का बस चलता तो संविधान लागू ही नहीं होता और मनुस्मृति ही देश में लागू हो जाती। संघ के इस एजेंडे को पूरा करने के लिए भाजपा अब भी लगातार कोशिश कर रही है। याद कीजिए 2024 का लोकसभा चुनाव जब भाजपा ने चार सौ पार का नारा दिया ही इसलिए था ताकि वो संविधान बदल सके। जब भाजपा इसमें नाकाम रही तो कभी संविधान हत्या विरोधी दिवस, कभी वंदे मातरम का कार्ड खेलकर कांग्रेस को राष्ट्रविरोधी बताने की कोशिशें की और अब भी कर रही है। लेकिन राहुल गांधी भाजपा की चालों का जवाब देने की जगह उन मुद्दों को राजनैतिक बहस के केंद्र में ला रहे हैं, जो सीधे आम लोगों से जुड़े हैं। पेपर लीक, बेरोजगारी इन सबके साथ अब राहुल गांधी ने लड़कियों के हक की बात बिल्कुल नए अंदाज में उठाई है। राहुल मनुस्मृति का जिक्र कर सीधे उस जड़ पर प्रहार कर रहे हैं, जहां से लड़कियों को लड़कों के नीचे रखने और समाज में दबाने की शुरुआत हुई।

भाजपा के लिए राजनीति का मतलब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, उग्र राष्ट्रवाद, हिंदुत्व का गौरवगान यही सब है, राहुल गांधी ने भाजपा को इस बार उसके पाठ्यक्रम के बाहर के सवालों में उलझा दिया। अब भाजपा को बताना ही पड़ेगा कि उसके लिए संविधान प्राथमिकता है या मनुस्मृति। अगर संविधान प्राथमिकता है, तो फिर प्रधानमंत्री मोदी को केवल लड़कियों के गाली देने से दिक्कत क्यों हुई, लड़कों के लिए यही बात उन्होंने क्यों नहीं की। भाजपा को बताना पड़ेगा कि अगर संविधान प्राथमिकता है, तो मोदी-शाह एक भी दिन सदन में आकर क्यों नहीं बता पाए कि जंतर-मंतर पर लाठी चार्ज और पैलेट गन चलाने के आदेश किसने दिए। बीजेपी को बताना पड़ेगा कि एक साथ दो पीढ़ियों यानी जेन ज़ी और जेन अल्फा को शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार के लिए सड़कों पर क्यों उतरना पड़ा है। क्या यही उसके बारह सालों के शासन का हासिल है कि उसने देश के बच्चों को संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया। ऐसे सारे सवाल अब देश में गूंज रहे हैं।

राहुल ने छात्रों की गूंज में महिलाओं की बराबरी का एक ऐसा राग छेड़ दिया है, जिसके सुर पकड़ पाना भाजपा के लिए लगभग नामुमकिन है। अगर भाजपा ऐसी कोशिश करेगी तो उसके पुराने तार सब टूट जाएंगे। क्योंकि संघ लड़के और लड़कियों की ऐसी बराबरी कभी मंजूर नहीं करेगा। संघ हिंदुस्तान को मध्ययुग में ले जाने का हिमायती है, जहां वर्ण व्यवस्था भी चले और मनुस्मृति भी मान्य हो। लेकिन राहुल गांधी ने एक नए किस्म की आजादी का ख्याल नयी पीढ़ी के साथ साझा किया है। अगर भाजपा राहुल के इस खयाल का विरोध करेगी तो लड़के-लड़कियों की गैरबराबरी को बढ़ावा देगी, जिसे नयी पीढ़ी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी।


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