लोकतंत्र बचाने के लिए जनता की ऐतिहासिक पहल
मोदी हटाओ देश बचाओ। ज्ञानेश कुमार को सजा होगी। उसके बाद मोदी-शाह पर भी कानूनी कार्रवाई होगी

मोदी हटाओ देश बचाओ। ज्ञानेश कुमार को सजा होगी। उसके बाद मोदी-शाह पर भी कानूनी कार्रवाई होगी। रामलीला मैदान बना हल्दीघाटी का मैदान। आज शकुनी अपना खेल खेल रहे हैं तो हमें कुरुक्षेत्र में उतरना पड़ रहा है। मुसलमानों ने इस देश के लिए खून दिया है, अभी भी दे रहे हैं और आगे भी देंगे, हमें पाकिस्तानी कहना बंद करना होगा। जिन्होंने राम मंदिर में चोरी की, वो वोट चोरी करके सरकार बना रहे हैं।
ये तमाम पंक्तियां इंडिया ब्लॉक के अलग-अलग नेताओं के भाषण से ली गई है। सभी को मिलाकर पढ़ें तो लगेगा कि एक ही व्यक्ति ने वोट चोरी और भाजपा की लोकतंत्र खत्म करने की साजिश के खिलाफ कहा है, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम 10 अलग-अलग दलों के नेताओं के ये विचार हैं, जो एक जैसे लग रहे हैं। और यही मजबूत विपक्ष का मोदी सरकार के लिए बड़ा संदेश है।
रविवार एक नवंबर को ये संदेश दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई ऐतिहासिक महारैली से निकला है। इस रैली को हर तरह से ऐतिहासिक कहा जा सकता है, क्योंकि भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद कम से कम 10 लाख लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से इस रैली में शिरकत करने के लिए पहुंचे। दो दिन से दिल्ली का मौसम भी बिगड़ा हुआ था। तेज बारिश के कारण मैदान में कीचड़ और पानी भर चुका था। लेकिन कांग्रेस सेवा दल के लोगों ने गजब जज्बा दिखाते हुए इस कीचड़ को हटाने का काम किया। भाजपा ने व्यापारियों को भी आगे कर के पहले राहुल गांधी और फिर सोनिया गांधी को संदेश भिजवाया कि दीपावली पर व्यापार का नुकसान न होने दें। लेकिन राहुल गांधी ने शनिवार रात ही अपील की कि जो लोग रैली में शामिल होने आ रहे हैं, वे थोड़ी खरीदारी करके लौटें ताकि व्यापारियों का फायदा हो। राहुल की इस अपील से डरी भाजपा ने रैली से कुछ समय पहले ही कनॉट प्लेस की दुकानों को जबरन बंद करवा दिया। इसके अलावा भाजपा ने एक नवंबर को 1984 के सिख दंगों की याद दिलाते हुए कांग्रेस को घेरने के लिए अपने नेताओं से वक्तव्य दिलवाए। खुद गृहमंत्री अमित शाह ने पंजाब की अपनी सभा में कांग्रेस को सिख विरोधी दंगों के लिए घेरा। लेकिन ऐसा करते हुए भाजपा भूल गई कि 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 11 अगस्त को संसद (राज्यसभा) में सिख दंगों के लिए औपचारिक रूप से माफी मांगी थी। इस के ठीक एक दिन बाद, 12 अगस्त 2005 को उन्होंने लोकसभा में भी इस बयान को दोहराया था। संसद में नानावती आयोग की रिपोर्ट पर हो रही बहस के दौरान उन्होंने अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था- 'मुझे सिख समुदाय से माफी मांगने में कोई संकोच नहीं है। मैं न केवल सिख समुदाय से, बल्कि पूरे भारतीय राष्ट्र से माफी मांगता हूं, क्योंकि 1984 में जो कुछ भी हुआ वह हमारे संविधान में निहित राष्ट्रवाद की अवधारणा के खिलाफ था। 'राहुल गांधी ने भी इन दंगों के लिए कई बार माफ़ी मांगी थी। हाल ही में पिछले साल मई में अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान जब एक सिख छात्र ने उनसे सिख विरोधी दंगों पर सवाल पूछा, तो राहुल गांधी ने कहा- 'जब कांग्रेस से कई गलतियां हुईं, तब मैं राजनीति में नहीं था, लेकिन कांग्रेस पार्टी द्वारा जो कुछ भी गलत किया गया, मैं उस की जिम्मेदारी लेता हूं।'
तो भाजपा जो अब दंगों के नाम पर कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही है, वो भी नाकाम हो गई। वैसे भी रामलीला मैदान की महारैली अकेले कांग्रेस की नहीं थी, इंडिया ब्लॉक और कई सामाजिक व छात्र संगठनों की मिली-जुली अभिव्यक्ति थी, जिसका निचोड़ यही था कि एसआईआर को हर हाल में रोका जाए। ज्ञानेश कुमार तत्काल मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से इस्तीफा दें और जितने भी गलत और आपराधिक काम उनसे हुए हैं, उनके लिए कानूनी कार्रवाई का सामना करें। सबसे बड़ा संदेश नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के लिए था कि वोट चोरी करके सत्ता पर बने रहने का यह खेल अब जनता और नहीं होने देगी। जितनी बड़ी संख्या में लोग दिल्ली की इस रैली में जुटे थे, वह अकल्पनीय और अप्रत्याशित थी। इसलिए क्योंकि हाल ही में जितने विरोध प्रदर्शन दिल्ली में हुए, उनमें शामिल लोगों को दिल्ली पुलिस की ज्यादतियों का सामना करना पड़ा। अदालतों के चक्कर लगवाने पड़े। शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाओं से आम लोगों को गुजरना पड़ा। ऐसे में लोगों के मन में डर बैठ जाता है और वे अपने हक के लिए आवाज नहीं उठाते। भाजपा को यही खुशफहमी थी कि लोग डर के मारे ही रैली में नहीं आएंगे। लेकिन लोगों ने डर को नकारते हुए अपने वोट के अधिकार को बचाने के लिए जोरदार आवाज उठाई।
यह सब वक्त और निजाम के बदलने के संकेत हैं। रविवार की रैली से पहले शनिवार को भी वोट चोरी के खिलाफ आवाज उठी थी।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सरकारी आवास के बगीचे में मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया गया था, जिसमें विपक्ष के तमाम नेता और नागरिक संगठनों के लोग सांसदों की तरह बैठे। इस संसद की अध्यक्षता लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। जिस तरह से पूरा सत्र संचालित हुआ, उसे देखकर लोगों को वही पुराने अच्छे दिन याद आए, जब कांग्रेस सत्ता में थी और संसद सत्र गरिमा के साथ संचालित होते थे। बहरहाल, इस मॉक यानी कृत्रिम संसद में भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पारित हुआ। भाजपा ने इसमें भी कांग्रेस को दोषी ठहराने के लिए कहा कि वह संसद का मजाक बना रही है, मॉक पार्लियामेंट आयोजित कर रही है। लेकिन भाजपा को शब्दकोष पढ़ना चाहिए क्योंकि मॉक का मतलब क्रिया रूप में मजाक उड़ाना होता है, लेकिन विशेषण के तौर पर इसे बनावटी या कृृत्रिम के अर्थ में देखा जाता है। जैसे मॉक टेस्ट या मॉक ड्रिल होती है, वैसे ही मॉक पार्लियामेंट भी होती है।
राहुल गांधी ने शनिवार को कहा कि हमें मजबूरन एक बगीचे में यह संसद लगानी पड़ी क्योंकि बाकी सारे दरवाजे बंद हो गए। तो फ्रांसीसी क्रांति के पहले का वह वाकया याद आ गया जब लुई सोलहवें ने संसद के दरवाजे आम जनता के प्रतिनिधियों के लिए बंद करवा दिए थे, तो उन्होंने वहीं टेनिस कोर्ट में 20 जून 1789 को इक_ा होकर शपथ ली थी कि जब तक फ्रांस का नया संविधान तैयार नहीं हो जाता और देश में एक संवैधानिक व्यवस्था लागू नहीं हो जाती, तब तक यह सभा भंग नहीं होगी और वे सब एक साथ डटे रहेंगे।
यह निरंकुश सत्ता के खिलाफ आम जनता का ऐलान था, भारत में टेनिस कोर्ट की शपथ का इतिहास ही अलग प्रसंग में दोहराया गया है।


