राष्ट्रपति की पार्टी के लिए क्यों है ये 'लिटमस टेस्ट': अमेरिकी मिडटर्म चुनाव
वाशिंगटन, अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म पोल यानि मध्यावधि चुनाव के लिए वोटिंग है। ऐसा चुनाव जिसमें राष्ट्रपति की कुर्सी तो नहीं खिसकती लेकिन उसके लिए खतरे की घंटी जरूर होता है।;
वाशिंगटन, अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म पोल यानि मध्यावधि चुनाव के लिए वोटिंग है। ऐसा चुनाव जिसमें राष्ट्रपति की कुर्सी तो नहीं खिसकती लेकिन उसके लिए खतरे की घंटी जरूर होता है। अमेरिका में मिडटर्म चुनाव को अक्सर राष्ट्रपति के कामकाज का लिटमस टेस्ट होता है। ये जनता की राय का पैमाना माना जाता है। अमेरिकी इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया। वर्ष 1994, 2006 और 2010 के चुनाव इसके तीन बड़े उदाहरण हैं।
इन चुनावों में राष्ट्रपति की पार्टी को नुकसान होने का मतलब केवल कांग्रेस में सीटें कम होना नहीं, बल्कि इससे व्हाइट हाउस की सियासी ताकत, नीतियों और अगले दो वर्षों के एजेंडे पर भी असर पड़ता है।
पहला बड़ा राजनीतिक झटका 1994 में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को लगा था। उनके कार्यकाल के शुरुआती दो वर्षों में अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सुधार की योजना और प्रशासन के फैसलों को लेकर असंतोष बढ़ रहा था। रिपब्लिकन पार्टी ने न्यूट गिंगरिच के नेतृत्व में 'कॉन्ट्रैक्ट विद अमेरिका' नाम से दस सूत्रीय एजेंडा पेश किया। इसमें करों में कटौती, सरकारी खर्च पर नियंत्रण और कल्याणकारी योजनाओं में बदलाव जैसे वादे शामिल थे। चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में 54 और सीनेट में आठ सीटों का इजाफा किया। इस जीत के साथ उसने करीब चार दशक बाद प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया।
इस नतीजे का असर जल्द ही दिखाई दिया। राष्ट्रपति क्लिंटन और रिपब्लिकन नेतृत्व के बीच बजट तथा सरकारी खर्च को लेकर टकराव बढ़ा। क्लिंटन ने रिपब्लिकन प्रस्तावों पर वीटो किया और बजट को लेकर गतिरोध इतना गहरा गया कि नवंबर और दिसंबर 1995 में अमेरिकी सरकार को दो बार कामकाज बंद करना पड़ा। इस दौरान लाखों संघीय कर्मचारियों के काम पर असर पड़ा और सरकारी सेवाएं भी बाधित हुईं। अंततः दोनों पक्षों को समझौते की राह पकड़नी पड़ी। यानी मिडटर्म में मिली जीत ने विपक्ष को कांग्रेस की कमान तो दी, लेकिन राष्ट्रपति के साथ टकराव ने पूरे देश के सरकारी कामकाज पर असर डाला।
दूसरा अहम उदाहरण 2006 का है, जब राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की रिपब्लिकन पार्टी को इराक युद्ध के मुद्दे पर जनता की नाराजगी झेलनी पड़ी। इराक हिंसा और अमेरिकी सैन्य अभियान की दिशा को लेकर सवाल उठ रहे थे। सात नवंबर को हुए मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में 30 और सीनेट में छह सीटें हासिल कीं। इस तरह रिपब्लिकन पार्टी ने दोनों सदनों में अपना बहुमत गंवा दिया।
चुनाव का असर राष्ट्रपति के रक्षा विभाग तक पहुंचा। बुश प्रशासन की इराक नीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने चुनाव के अगले दिन अपने पद से हटने का ऐलान कर दिया। राष्ट्रपति ने उनकी जगह रॉबर्ट गेट्स को नियुक्त किया। दूसरी ओर, डेमोक्रेटिक नेता नैन्सी पेलोसी प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष बनीं। नई कांग्रेस में इराक युद्ध और बुश प्रशासन की नीतियों पर निगरानी तथा जवाबदेही से जुड़े सवाल ज्यादा मुखर हुए। यह चुनाव इस बात का उदाहरण बना कि मिडटर्म में सत्ता का संतुलन बदलने पर राष्ट्रपति की टीम और उसकी नीतियों पर भी दबाव पड़ सकता है।
तीसरा बड़ा उदाहरण 2010 का है, जब बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहते डेमोक्रेटिक पार्टी को मिडटर्म चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने खुद इसे "शेलैकिंग" (एक बड़ी हार) कहा था। दरअसल, तब आर्थिक संकट के बाद रोजगार और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बनी हुई थी। इसी दौरान ओबामा प्रशासन का स्वास्थ्य सुधार कानून, जिसे 'अफोर्डेबल केयर एक्ट' या ओबामाकेयर कहा गया, राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया।
रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े टी पार्टी आंदोलन ने भी सरकार के खर्च और स्वास्थ्य सुधार कानून के खिलाफ विरोध को संगठित करने में भूमिका निभाई। चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा की 63 सीटें गंवाईं और सदन पर रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण हो गया। सीनेट में भी उसे छह सीटों का नुकसान हुआ, हालांकि वहां उसका बहुमत बना रहा।
इस नतीजे ने ओबामा के विधायी एजेंडे को मुश्किल में डाल दिया। रिपब्लिकन बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा ने स्वास्थ्य सुधार कानून को निरस्त करने की कोशिशों के साथ प्रशासन के फैसलों पर कड़ी निगरानी शुरू की। कई मुद्दों पर दोनों दलों के बीच टकराव बढ़ा और राष्ट्रपति के लिए नए कानून पारित कराना पहले से कठिन हो गया। इस चुनाव का एक और दूरगामी असर यह रहा कि रिपब्लिकन पार्टी ने राज्यों की राजनीति में भी अपनी स्थिति मजबूत की।
मध्यावधि चुनाव के बाद जो घटनाक्रम हुए उन्हें इन उदाहरणों से समझा जा सकता है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति को पद से नहीं हटाते, लेकिन उनकी राजनीतिक ताकत और फैसले लेने की क्षमता को जरूर प्रभावित कर सकते हैं। कभी बजट पर गतिरोध पैदा होता है, कभी युद्ध नीति पर सवाल उठते हैं और कभी राष्ट्रपति के घरेलू सुधार कार्यक्रम विपक्ष के निशाने पर आ जाते हैं।
मिडटर्म चुनाव को केवल कांग्रेस की सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि राष्ट्रपति के काम पर जनता की राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जाता है। यही वजह है कि चुनावी रैली में ट्रंप ने पूरी ताकत झोंक दी है। ईरान से लेकर 'मागा' की बात कर रहे हैं। भरोसा दिला रहे हैं कि रिपब्लिकन सरकार ने वो सही किया जिसे पूर्व के डेमोक्रेट्स ने बिगाड़ दिया था।