वॉशिंगटन: अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के बीच अब अमेरिकी विश्वविद्यालयों का आकर्षण कम होता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त आव्रजन नीतियों, वीजा नियमों में बदलाव और विदेशी नागरिकों की बढ़ती जांच का असर भारतीय छात्रों के फैसलों पर पड़ने लगा है। पिछले एक साल में अमेरिका में सक्रिय भारतीय छात्रों की संख्या में करीब 50 हजार की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, इस कमी के बावजूद भारत अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (डीएचएस) के स्टूडेंट एंड एक्सचेंज विजिटर इंफॉर्मेशन सिस्टम (एसईवीआईएस) के आंकड़े इस बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2026 में अमेरिका में सक्रिय भारतीय छात्रों की संख्या घटकर 3,16,893 रह गई, जबकि अक्टूबर 2025 में यह आंकड़ा 3,66,258 था। यानी एक साल के भीतर 49,365 भारतीय छात्र कम हुए हैं। प्रतिशत के लिहाज से यह गिरावट लगभग 13.5 फीसदी है।
अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में भी आई गिरावट
अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में आई कमी वैश्विक स्तर पर विदेशी विद्यार्थियों की घटती मौजूदगी से भी जुड़ी हुई है। हालांकि, भारतीय छात्रों की गिरावट राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक रही है। एसईवीआईएस के अनुसार, अक्टूबर 2025 में अमेरिका में सभी देशों के कुल 12,83,240 सक्रिय अंतरराष्ट्रीय छात्र थे। अक्टूबर 2026 में यह संख्या घटकर 11,92,572 रह गई। इस तरह कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में लगभग 7.1 फीसदी की कमी आई। अमेरिका में भारतीय छात्रों के बाद दूसरे बड़े स्रोत चीन से आने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई। एक साल में चीनी छात्रों की संख्या 10.2 फीसदी कम होकर 2,20,157 रह गई। इससे स्पष्ट है कि अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था में विदेशी छात्रों की भागीदारी प्रभावित हो रही है।
मास्टर्स पाठ्यक्रमों से सबसे ज्यादा दूरी बना रहे भारतीय
भारतीय छात्रों की संख्या में सबसे बड़ी गिरावट मास्टर्स डिग्री कार्यक्रमों में देखने को मिली है। अक्टूबर 2025 में अमेरिका में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों की संख्या 2,92,929 थी, जो अक्टूबर 2026 में घटकर 2,34,034 रह गई। यानी इस श्रेणी में लगभग 20 फीसदी की कमी आई है। इसके विपरीत, पीएचडी कार्यक्रमों में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़ी है। अक्टूबर 2025 में अमेरिका में 28,609 भारतीय पीएचडी छात्र थे, जबकि अक्टूबर 2026 में यह संख्या बढ़कर 41,729 हो गई। वहीं, स्नातक पाठ्यक्रमों में भी भारतीय विद्यार्थियों की संख्या 38,522 से घटकर 36,011 रह गई। आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2026 में अमेरिका में सक्रिय भारतीय छात्रों में 1,95,341 पुरुष और 1,21,552 महिलाएं शामिल थीं। यह आंकड़ा अमेरिका में भारतीय विद्यार्थियों की कुल मौजूदगी में आए बदलाव को दर्शाता है।
ग्रीन कार्ड की कतार में 91 फीसदी भारतीय
अमेरिका में पढ़ाई और नौकरी के बाद स्थायी रूप से बसने की इच्छा रखने वाले भारतीय पेशेवरों के सामने भी बड़ी चुनौती है। ग्रीन कार्ड की लंबी प्रतीक्षा सूची में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे अधिक बनी हुई है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (यूएससीआईएस) के जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, एडवांस्ड डिग्री वाले पेशेवरों के लिए निर्धारित ईबी-2 श्रेणी में वीजा नंबर का इंतजार कर रहे 3,91,296 स्वीकृत आवेदनों में से 3,56,360 भारत में जन्मे लोगों के हैं। यह कुल आवेदनों का लगभग 91.1 फीसदी है। वहीं, चीन में जन्मे आवेदकों की संख्या 34,936 है। इससे पता चलता है कि भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में स्थायी निवास हासिल करना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है। बड़ी संख्या में आवेदन स्वीकृत होने के बावजूद वीजा नंबर उपलब्ध होने का इंतजार लंबा खिंच रहा है।
ट्रंप प्रशासन ने रद किए तीन लाख से ज्यादा वीजा
अमेरिकी प्रशासन की सख्त आव्रजन नीति का एक और संकेत बड़ी संख्या में वीजा रद किए जाने से मिला है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, विदेश मंत्री मार्को रूबियो के कार्यकाल में तीन लाख से अधिक वीजा रद किए जा चुके हैं। विभाग ने इसे अमेरिकी इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई बताया है। विदेश विभाग ने शनिवार देर शाम अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर यह जानकारी साझा की। इसके अनुसार, सबसे अधिक लगभग 4,000 वीजा उन लोगों के रद किए गए, जो बर्थ टूरिज्म के उद्देश्य से अमेरिका पहुंचे थे। बर्थ टूरिज्म के तहत विदेशी नागरिक अमेरिका में बच्चे को जन्म देने के लिए वहां जाते हैं, ताकि बच्चे को अमेरिकी नागरिकता मिल सके। ट्रंप प्रशासन विदेशी नागरिकों को जारी किए गए वीजा की व्यापक समीक्षा कर रहा है। ऐसे में भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए अमेरिका जाने तथा वहां लंबे समय तक रहने की योजना बनाना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, मौजूदा आंकड़े यह भी बताते हैं कि अमेरिका में उच्च शिक्षा के प्रति भारतीयों की रुचि पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, खासकर पीएचडी जैसे शोध आधारित पाठ्यक्रमों में उनकी भागीदारी बढ़ी है।