स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को दूसरा नोटिस, मेला प्रशासन ने स्थायी बैन की चेतावनी दी

प्रशासन ने यह भी पूछा है कि क्यों न अविमुक्तेश्वरानंद को हमेशा के लिए माघ मेले से प्रतिबंधित कर दिया जाए। नोटिस में साफ कहा गया है कि यदि 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो संस्था को आवंटित जमीन और दी गई सभी सुविधाएं वापस ले ली जाएंगी।

Update: 2026-01-22 13:37 GMT
प्रयागराज। प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है। प्रशासन ने 48 घंटे के भीतर दूसरा नोटिस जारी करते हुए संत के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। नोटिस में मौनी अमावस्या के दिन बैरियर तोड़ने, सुरक्षा व्यवस्था भंग करने और जबरन भीड़ के बीच बग्घी ले जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

प्रशासन ने यह भी पूछा है कि क्यों न अविमुक्तेश्वरानंद को हमेशा के लिए माघ मेले से प्रतिबंधित कर दिया जाए। नोटिस में साफ कहा गया है कि यदि 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो संस्था को आवंटित जमीन और दी गई सभी सुविधाएं वापस ले ली जाएंगी।

प्रशासन का सख्त सवाल: क्यों न हो स्थायी प्रतिबंध?

माघ मेला प्रशासन द्वारा जारी दूसरे नोटिस में कहा गया है कि मौनी अमावस्या के पावन स्नान के दिन तय नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ। नोटिस के अनुसार—बैरियर तोड़कर भीड़ के बीच प्रवेश किया गया, प्रशासनिक निर्देशों की अवहेलना की गई, श्रद्धालुओं की सुरक्षा खतरे में डाली गई। इन्हीं आधारों पर प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद से पूछा है कि उन्हें भविष्य में माघ मेले से बाहर क्यों न कर दिया जाए।

नोटिस चस्पा करने को लेकर भी विवाद

अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी शैलेंद्र योगिराज ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया कि “प्रशासन ने बुधवार शाम करीब 7 बजे शिविर के पीछे दूसरा नोटिस चस्पा किया। हैरानी की बात यह है कि नोटिस पर तारीख 18 जनवरी लिखी थी।” उनका कहना है कि यह नोटिस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, शैलेंद्र योगिराज ने बताया कि अविमुक्तेश्वरानंद ने गुरुवार सुबह तीन पन्नों में विस्तृत जवाब तैयार कर मेला कार्यालय भिजवा दिया है।

अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार

दूसरे नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “प्रशासन नोटिस-नोटिस का खेल खेल रहा है। मेरा अभी तक मौनी अमावस्या का स्नान नहीं हुआ है, तो मैं बसंत पंचमी का स्नान कैसे कर सकता हूं? पहले मौनी अमावस्या का स्नान करूंगा, उसके बाद ही दूसरा स्नान करूंगा।” उन्होंने साफ किया कि वह धार्मिक परंपराओं से समझौता नहीं करेंगे और प्रशासनिक दबाव में निर्णय नहीं लेंगे।

सीएम योगी का अप्रत्यक्ष हमला: कालनेमि का जिक्र

इस पूरे विवाद के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान भी सियासी और धार्मिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद का नाम लिए बिना कहा  “किसी को भी परंपराओं को बाधित करने का अधिकार नहीं है। ऐसे तमाम कालनेमि हैं, जो धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं। हमें ऐसे लोगों से सतर्क रहना होगा।” योगी ने कहा कि संन्यासी के लिए धर्म और राष्ट्र सर्वोपरि होते हैं और व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर उठकर आचरण करना चाहिए।

कालनेमि का संदर्भ क्या है?

मुख्यमंत्री योगी ने जिस कालनेमि का जिक्र किया, उसका उल्लेख रामायण में मिलता है। कालनेमि रावण का मामा और मारीच का पुत्र था। जब लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब रावण ने कालनेमि को हनुमान को रोकने के लिए भेजा था। कालनेमि ने साधु का वेश धारण कर हनुमान को भ्रमित करने की कोशिश की थी, लेकिन अंततः हनुमान ने उसका वध कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संदर्भ के जरिए योगी ने धार्मिक आड़ में विवाद खड़ा करने वालों पर इशारों में निशाना साधा है।

डिप्टी सीएम केशव मौर्य का नरम रुख

जहां एक ओर मुख्यमंत्री योगी का बयान सख्त माना जा रहा है, वहीं डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है। आजमगढ़ दौरे पर पहुंचे केशव मौर्य ने कहा “मैं ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में प्रणाम करता हूं। उनसे विनम्र प्रार्थना है कि वह स्नान कर इस विषय का समापन करें।” उन्होंने कहा कि संतों का सम्मान सर्वोपरि है और विवाद का समाधान संवाद से निकलना चाहिए।

मौनी अमावस्या के दिन क्या हुआ था?

इस पूरे विवाद की शुरुआत 18 जनवरी, मौनी अमावस्या के दिन हुई। उस दिन अविमुक्तेश्वरानंद पालकी (बग्घी) में सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। प्रशासन का कहना है कि भारी भीड़ को देखते हुए उन्हें पैदल जाने का अनुरोध किया गया था। लेकिन संत और उनके समर्थक पालकी में जाने पर अड़े रहे। पुलिस द्वारा रोके जाने पर शिष्यों और सुरक्षाकर्मियों के बीच धक्का-मुक्की हुई। हालात बिगड़ने पर अविमुक्तेश्वरानंद नाराज होकर शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। इस घटना के बाद से ही प्रशासन और संत के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया।

मेला प्रशासन की चिंता: सुरक्षा और व्यवस्था

माघ मेला प्रशासन का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी संत का अपमान नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। मौनी अमावस्या जैसे प्रमुख स्नान पर्व पर अत्यधिक भीड़ होती है और किसी भी तरह की ढील बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। प्रशासन का तर्क है कि सभी अखाड़ों, संतों और श्रद्धालुओं के लिए एक समान नियम बनाए गए हैं, जिनका पालन अनिवार्य है।

संत समाज और राजनीति में बढ़ी हलचल

इस विवाद ने न सिर्फ धार्मिक बल्कि राजनीतिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी है। कुछ संत संगठनों ने अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में आवाज उठाई है, जबकि कुछ ने प्रशासन के फैसले को भीड़ प्रबंधन के लिहाज से सही बताया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, खासकर जब माघ मेले के प्रमुख स्नान पर्व अभी बाकी हैं।

सभी की निगाहें

प्रशासन द्वारा भेजे गए दूसरे नोटिस के जवाब पर, प्रशासन के अगले कदम पर और सरकार की मध्यस्थता की भूमिका पर टिकी हैं। क्या अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच सुलह होगी, या यह टकराव और गहराएगा—यह आने वाले 24 से 48 घंटे में साफ हो सकता है। फिलहाल प्रयागराज माघ मेले में धार्मिक आस्था, प्रशासनिक सख्ती और राजनीति का संगम साफ नजर आ रहा है।

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