मुंबई/रामपुर। उर्दू गजल और शायरी की दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ ग़ज़लकार इंतेख़ाब हुसैन उर्फ़ ताहिर फ़राज अब हमारे बीच नहीं रहे। 72 वर्षीय फ़राज ने शनिवार शाम मुंबई के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। रविवार शाम सांताक्रुज कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनके निधन की खबर से साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। परिवार के अनुसार, ताहिर फ़राज पिछले सप्ताह एक पारिवारिक शादी समारोह में शामिल होने मुंबई आए थे। शनिवार सुबह उन्हें अचानक सीने में तेज दर्द महसूस हुआ, जिसके बाद उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया। तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उन्हें नहीं बचा सके। उनके इंतकाल ने न सिर्फ उनके चाहने वालों को बल्कि उर्दू अदब को भी अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।
जन्मदिन की खुशियां मातम में बदलीं
ताहिर फ़राज के निधन का समय परिवार के लिए विशेष रूप से पीड़ादायक रहा। 26 जनवरी को उनकी पत्नी नाज बी का जन्मदिन होता है। जन्मदिन की तैयारियां घर में चल ही रही थीं कि उससे ठीक दो दिन पहले फ़राज का इंतकाल हो गया। खुशियों का माहौल अचानक गहरे ग़म में तब्दील हो गया। परिवार और करीबी रिश्तेदारों के लिए यह सदमा बेहद भारी रहा।
बदायूं से रामपुर तक का साहित्यिक सफ़र
ताहिर फराज का जन्म 29 जून 1953 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में प्रसिद्ध शायर शाकिर फ़राज के घर हुआ था। साहित्य और शायरी उन्हें विरासत में मिली। बचपन से ही उनका माहौल कविता, ग़ज़ल और मुशायरों से जुड़ा रहा। सात–आठ वर्ष की उम्र से ही वह अपने वालिद के साथ शायरी के कार्यक्रमों में जाने लगे थे, जहां वे उनकी ग़ज़लों को तरन्नुम में पढ़ते थे। महज 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल कह दी थी। यही वह दौर था, जब यह साफ़ हो गया था कि ताहिर फ़राज आने वाले समय में उर्दू शायरी का एक बड़ा नाम बनेंगे। इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अपने नाना इशाक हुसैन ख़ां के पास रामपुर चले आए और यहीं के होकर रह गए। रामपुर की साहित्यिक और सूफ़ियाना परंपराओं ने उनके काव्य व्यक्तित्व को गहराई और आध्यात्मिक रंग दिया।
शिक्षा, किताबें और रचनात्मक योगदान
ताहिर फ़राज ने एमए (उर्दू) तक शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने न सिर्फ मुशायरों में शिरकत की, बल्कि लेखन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘कशकोल’ और ‘आहट आंसुओं की’ शामिल हैं। उनकी पहली ग़ज़ल “काश ऐसा कोई मंजर होता” ने उन्हें पहचान दिलाई, जबकि उनकी अंतिम ग़ज़ल “तारीकियों ने खुद को मिलाया है धूप में” उनके रचनात्मक सफ़र का भावपूर्ण समापन मानी जाती है। उनकी शायरी में कोमल भावनाएं, इंसानी रिश्तों की संवेदना और आध्यात्मिकता का सुंदर मेल दिखाई देता था।
देश-विदेश में गूंजा फराज की आवाज का जादू
ताहिर फ़राज सिर्फ कागज पर लिखे शायर नहीं थे, बल्कि मंच के भी बादशाह थे। उनकी आवाज में एक ऐसी मिठास और असर था कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उन्होंने भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, पाकिस्तान और कुवैत सहित कई देशों में मुशायरों के माध्यम से अपनी शायरी का जादू बिखेरा। 15 नवंबर को दुबई में उर्दू अदब की अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘अंदाज़-ए-बयां’ द्वारा आयोजित मुशायरे में उनकी प्रस्तुति को खासा सराहा गया था। वहां उन्होंने अपनी मशहूर ग़ज़ल “दिन वो भी क्या थे जब हम मिलकर देश में रहते थे…” पढ़ी, जिसे सुनकर श्रोताओं ने देर तक तालियां बजाईं।
रिकॉर्डेड एल्बम और लोकप्रिय रचनाएं
ताहिर फराज की आवाज़ की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि टी-सीरीज़ जैसी नामी संगीत कंपनियों ने उनके गजल और नात के एल्बम रिकॉर्ड किए। उनकी चर्चित रचनाओं में “काश ऐसा कोई मंजर होता”, “दुआएं”, “नात” और “मनक़बत” शामिल हैं, जिन्हें आज भी बड़े चाव से सुना जाता है।
आध्यात्मिक जुड़ाव और साहित्यिक प्रभाव
ताहिर फ़राज का बरेली स्थित खानक़ाह नियाजिया से गहरा आध्यात्मिक संबंध था। उनकी शायरी में सूफ़ियाना रंग और आत्मिक शांति का एहसास इसी जुड़ाव का परिणाम था। इसके अलावा, प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र की शायरी का प्रभाव भी उनके काव्य में साफ दिखाई देता था, हालांकि फ़राज ने अपनी एक अलग और मौलिक पहचान बनाए रखी।
परिवार और उर्दू अदब में शोक
ताहिर फ़राज अपने पीछे पत्नी नाज बी, तीन बेटियां और एक बेटे तारिफ नियाजी को छोड़ गए हैं। उनके निधन पर देश-विदेश के शायरों, साहित्यकारों और प्रशंसकों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। सोशल मीडिया पर भी उनकी ग़ज़लों की पंक्तियों के साथ श्रद्धांजलि दी जा रही है।
एक युग का अवसान
ताहिर फ़राज का जाना सिर्फ एक शायर का जाना नहीं है, बल्कि उर्दू गजल की उस परंपरा का अवसान है, जिसमें संवेदना, तरन्नुम और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम मिलता था। उनकी आवाज़, उनके अल्फाज और उनकी गजलें आने वाली पीढ़ियों तक ज़िंदा रहेंगी। उर्दू अदब का यह चमकता सितारा भले ही अस्त हो गया हो, लेकिन उसकी रोशनी लंबे समय तक शायरी के आसमान को रोशन करती रहेगी।