बुलडोजर कार्रवाई पर हाई कोर्ट का सवाल, क्या सरकार को है अपराधी के आवास के विध्वंस का अधिकार

याचियों ने अदालत में आशंका जताई कि उनके आवास और अन्य संपत्तियों पर बुलडोजर चलाया जा सकता है। उनका तर्क है कि अभियुक्त से पारिवारिक संबंध होने के कारण प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका है, जबकि वे स्वयं मामले में आरोपी नहीं हैं।

Update: 2026-02-04 06:49 GMT
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में किसी भी अपराध के बाद तत्काल बुलडोजर कार्रवाई किए जाने की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हमीरपुर निवासी फहीमुद्दीन और दो अन्य को अंतरिम राहत देते हुए न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन की खंडपीठ ने पूछा कि क्या राज्य को किसी अपराधी के आवास को ध्वस्त करने का अधिकार है, या उसका दायित्व नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है?

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अपराध के तुरंत बाद विध्वंस की कार्रवाई क्या कार्यपालक विवेक का विकृत प्रयोग (distorted exercise of executive discretion) है? खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि यदि विध्वंस की ‘उचित आशंका’ भी हो, तो यह नागरिकों को अदालत की शरण लेने का पर्याप्त आधार प्रदान करती है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया और पूछा कि क्या इनका पालन किया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने पहले स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए विध्वंस की कार्रवाई नहीं की जा सकती। दंड निर्धारित करना न्यायपालिका का अधिकार है, न कि कार्यपालिका का। राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने अदालत को आश्वस्त किया कि बिना विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किए और याचियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना कोई विध्वंस नहीं किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई नौ फरवरी को निर्धारित की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि: रिश्तेदार पर गंभीर आरोप

प्रकरण भरुआ सुमेरपुर, जनपद हमीरपुर का है। याचियों के रिश्तेदार अफान के खिलाफ पाक्सो एक्ट की धारा 3/4 और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3/5(1) के तहत सुमेरपुर थाने में मामला दर्ज किया गया है। याचीगण फहीमुद्दीन, मोइनुद्दीन और जैबुन निशा क्रमशः पुत्र, पिता और माता हैं। अभियुक्त अफान रिश्ते में फहीमुद्दीन का चचेरा भाई और अन्य दोनों का भतीजा बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद भीड़ ने उनके मकान को घेर लिया था। तीसरी याची जैबुन निशा के नाम पंजीकृत ‘इंडियन लॉज’ को प्रतिवादियों द्वारा सील कर दिया गया है। वहीं मोइनुद्दीन के नाम पंजीकृत आरा मशीन को 11 फरवरी 2025 को जिलाधिकारी के आदेश पर सील किया गया।

याचियों की आशंका


याचियों ने अदालत में आशंका जताई कि उनके आवास और अन्य संपत्तियों पर बुलडोजर चलाया जा सकता है। उनका तर्क है कि अभियुक्त से पारिवारिक संबंध होने के कारण प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका है, जबकि वे स्वयं मामले में आरोपी नहीं हैं। राज्य सरकार की ओर से याचिका को ‘प्री-मेच्योर’ बताते हुए प्रारंभिक आपत्ति दर्ज की गई। अपर महाधिवक्ता ने कहा कि याचियों को केवल नोटिस जारी किया गया है, जिसका उन्हें जवाब देना है। उन्होंने यह भी कहा कि आवास और लॉज को सील नहीं किया गया है। साथ ही यह तर्क भी दिया गया कि आरा मशीन को प्रतिबंधित लकड़ी नीम और ढाक के भंडारण के कारण सील किया गया था, न कि किसी आपराधिक मामले से संबंधित कार्रवाई के तहत।

हाईकोर्ट की टिप्पणी: संतुलन जरूरी

खंडपीठ ने कहा कि अदालत ने ऐसे कई मामलों को देखा है, जहां अपराध के तुरंत बाद आरोपी के निवास स्थान को ध्वस्त करने का नोटिस जारी किया जाता है और बाद में विधिक प्रक्रिया पूरी कर कार्रवाई की जाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य के विध्वंस संबंधी अधिकार और नागरिकों के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। इस संतुलन के लिए कुछ मूलभूत प्रश्नों का उत्तर आवश्यक है। अदालत ने अंतरिम आदेश में पुलिस को निर्देश दिया कि याचियों की संपत्तियों तक उनकी निर्बाध पहुंच सुनिश्चित की जाए और उनकी सुरक्षा का ध्यान रखा जाए।

कई अधिकारियों को बनाया गया प्रतिवादी

मामले में राज्य सरकार के अतिरिक्त प्रधान सचिव (राजस्व/शहरी विकास), जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, उपजिलाधिकारी, संबंधित थानाध्यक्ष, डीएफओ वन विभाग और नगर पालिका परिषद के कार्यकारी अधिकारी को प्रतिवादी बनाया गया है।

बुलडोजर नीति पर बढ़ती न्यायिक निगरानी

प्रदेश में अपराध के बाद कथित अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर पहले भी न्यायालयों में प्रश्न उठते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने यह स्पष्ट किया है कि विध्वंस की कार्रवाई दंड के रूप में नहीं हो सकती और प्रत्येक मामले में विधिक प्रक्रिया तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणी को इसी व्यापक न्यायिक रुख के संदर्भ में देखा जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया है कि केवल आरोप के आधार पर संपत्ति ध्वस्त करना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत हो सकता है। अब सभी की निगाहें नौ फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत इन महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर आगे विचार करेगी।

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