नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के कुंडा से विधायक रघुराज प्रताप सिंह के खिलाफ उनकी अलग रह रही पत्नी भानवी सिंह द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोपों के मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुराने और दूरस्थ आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से आपराधिक कानून के तहत मामला आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, विशेषकर तब जब प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद न हों।
अदालत की प्रमुख टिप्पणी
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्वनी पंवार ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत दायर अंतिम रिपोर्ट पर सुनवाई करते हुए कहा कि मामले में अपराध के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होते। अदालत ने यह भी माना कि शिकायत में लगाए गए आरोप समयसीमा से बाहर हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “क्रूर आचरण को साबित करने वाले प्रत्यक्ष कृत्यों के अभाव में पुराने और दूर के आरोपों को पुनर्जीवित करने के लिए आपराधिक कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता।” अदालत के अनुसार, शिकायतकर्ता द्वारा अतीत की घटनाओं को विस्तार से प्रस्तुत करने मात्र से मामला कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
मामले की पृष्ठभूमि
दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव थाना क्षेत्र में मार्च 2025 में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। भानवी सिंह ने अपने पति रघुराज प्रताप सिंह पर वैवाहिक जीवन के दौरान क्रूरता और शारीरिक हिंसा के आरोप लगाए थे। दिल्ली पुलिस ने जांच के बाद आईपीसी की धारा 498ए के तहत आरोपपत्र दाखिल किया। हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री का अवलोकन करते हुए पाया कि दोनों पक्ष वर्ष 2017 से 2025 तक कई वर्षों से अलग रह रहे थे। इसके अतिरिक्त, 2015 से पहले शारीरिक हिंसा का कोई आरोप दर्ज नहीं था।
2015 की घटना पर केंद्रित आरोप
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्राथमिकी को ध्यानपूर्वक पढ़ने से स्पष्ट होता है कि शारीरिक हिंसा और क्रूरता के मुख्य आरोप 2015 में घटी एक घटना से संबंधित हैं। विवाह वर्ष 1995 से लेकर 2015 तक के 20 वर्षों के दौरान किसी प्रकार की शारीरिक क्रूरता का आरोप सामने नहीं आया। कोर्ट ने विशेष रूप से 2015 की कथित घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस रिपोर्ट में दो डॉक्टरों के बयान दर्ज हैं, जिन्होंने स्पष्ट किया कि किसी प्रकार की मारपीट नहीं हुई थी। मेडिकल रिकॉर्ड में भी मारपीट से संबंधित चोट का कोई निशान दर्ज नहीं पाया गया।
समयसीमा और कानूनी पहलू
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कथित घटना और प्राथमिकी दर्ज होने के बीच लंबा अंतराल है। 2015 की घटना के आधार पर 2025 में एफआईआर दर्ज कराई गई, जो समयसीमा के प्रश्न को जन्म देती है। अदालत ने माना कि इतने लंबे समय बाद आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई करना उचित नहीं है, खासकर तब जब प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध न हों। कोर्ट ने यह भी कहा कि 2025 में एफआईआर दर्ज होने से पहले दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ विभिन्न मुकदमों में संलिप्त रहे हैं, जिससे मामले की परिस्थितियों पर अतिरिक्त सवाल खड़े होते हैं।
498ए के तहत आवश्यक तत्वों की कमी
आईपीसी की धारा 498ए पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला पर क्रूरता करने से संबंधित है। इस धारा के तहत अभियोजन के लिए यह आवश्यक है कि क्रूरता के स्पष्ट और प्रत्यक्ष कृत्य स्थापित हों, जो महिला को गंभीर मानसिक या शारीरिक पीड़ा पहुंचाने वाले हों। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर ऐसे आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं होते। इस कारण आरोपपत्र पर संज्ञान लेने का कोई औचित्य नहीं बनता।
कानूनी विशेषज्ञों की नजर में फैसला
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में समयसीमा और साक्ष्य की ठोस उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। केवल आरोपों के आधार पर, विशेषकर तब जब वे कई वर्ष पुराने हों और उनके समर्थन में प्रत्यक्ष साक्ष्य न हों, अदालत संज्ञान नहीं ले सकती।
आदेश को चुनौती देने का विकल्प
हालांकि मजिस्ट्रेट अदालत ने संज्ञान लेने से इनकार कर दिया है, लेकिन शिकायतकर्ता के पास उच्चतर अदालत में आदेश को चुनौती देने का विकल्प उपलब्ध है। फिलहाल, इस आदेश से विधायक रघुराज प्रताप सिंह को कानूनी राहत मिली है।
आगे की कानूनी प्रक्रिया पर नजरें
राउज एवेन्यू अदालत का यह फैसला स्पष्ट करता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ उनके समर्थन में साक्ष्य और समयसीमा का भी समान महत्व है। अदालत ने यह संकेत दिया है कि पुराने और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। फिलहाल इस मामले में अदालत के आदेश के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।